गुरुवार, 25 नवंबर 2010

बंगलौर:इस बार/बलराम अग्रवाल


लाल बाग, बंगलौर में एक मनोहारी दृश्य                 चित्र:बलराम अग्रवाल
डायरी/25-11-2010
दिन अभी शुरू नहीं हुआ। रात के 12/45 हुए हैं। कुछ देर दिन में सो लेने की वजह से नींद जल्दी नहीं आ सकती। मैं और आदित्य जाग रहे हैं। वह एनीमेशन का अपना काम कर रहा है, लेखन-संबंधी मैं अपना।
आज गुरुवार है। रविवार को लाल बाग की सैर की मैंनेराजेश के साथ। साथ घूमने की तो बात ही अलग है, यह बात लिखते हुए भी मुझे प्रेम और अपनेपन की जिस दिव्य गंध का आभास हो रहा है, उसे मैं सिर्फ महसूस कर सकता हूँ, लिख नहीं सकता। लाल बाग की सैर का प्रस्ताव राजेश ने ही मेरे सामने रखा, मैंने उनके सामने नहीं। इस बारे में दो बातें हैंपहली यह कि मुझे यहाँ, बंगलौर के भ्रमण-योग्य इलाकों के बारे में यानी ऐसे इलाकों के बारे में जो निवास से बहुत ज्यादा दूर न हों और प्राकृतिक सुषमा से भरपूर हों, कुछ भी नहीं मालूम; दूसरी यह कि मैं किसी को साथ लेकर घूमने की योजना बनाने के बारे में शुरू से ही दोयम हूँ। गरज यह कि पता भी नहीं है और दब्बूपन भी है। मालूम नहीं क्या बात है कि जब भी राजेश का विचार जेहन में आता है, मन में यह गीत अनायास ही सुनाई-सा देने लगता है:
दोनों जवानी की मस्ती में चूर/
तेरा कुसूर न मेरा कुसूर/
ना तूने सिग्नल देखा/
न मैंने सिग्नल देखा/
एक्सीडेंट हो गया रब्बा-रब्बा…।
नितान्त भोगवादी चरित्र का यह गीत क्यों सुनाई देता है? जबकि जितना मैंने उन्हें समझा है, राजेश को सांसारिक भोग से कोई लगाव नहीं है। अभी तक का अपना जीवन उन्होंने श्रम और विश्वास के साथ बिताया है। अपने जीवन के सुनहरे सतरह वर्ष उन्होंने 'चकमक' के संपादन को सौंपकर एक तरह से भारत की बाल-मेधा को दिशा देने में बिताए हैं। मुझे लगता है कि मैंने भी मात्र स्वार्थ-लाभ हेतु कभी वाहियात चरित्रों या मात्र सिक्कों के पीछे भागने की कोशिश नहीं की। लगभग उन्हीं की तरह का  या सामान्य से भी नीचे का जीवन जिया है। हाँ, साहित्यिक-श्रम अवश्य उनसे कम किया है। पारिवारिक जिम्मेदारियों ने मुझे कभी आज़ाद नहीं रहने दिया। उनके-अपने बीच मैं लेकिन साहित्यिक-लगाव अवश्य महसूस करने लगा हूँ। यह लगाव इकतरफा भी हो सकता है और दोतरफा भी। प्रेम और लगाव हो तो कोई कहाँ-से-कहाँ मिलने को जा सकता है। राजेश का वर्तमान-निवास दक्षिण-बंगलौर के अत्याधुनिक सोसाइटियों से भरपूर सरजापुर रोड स्थित विप्रो से दो-ढाई किमी अन्दर गाँव में है और मैं सीवी रमन नगर के निकट कगदासपुरा में हूँ यानी करीब-करीब पूर्वी-बंगलौर की एक विकासशील कालोनी में। दोनों के बीच कोई सीधी बस सेवा उपलब्ध नहीं है। कम-से-कम तीन बसें बदलकर पहुँचना होता है, दो-ढाई किलोमीटर पैदल चलना अलग। गत 30 अक्टूबर, 2010 को उनसे मिलने के लिए आदित्य की बाइक पर बैठकर पहली बार जब मैं उधर पहुँचा था तो आदित्य ने कहापापा, हम पिछले वर्ष जहाँ आए थे, वहीं पर पहुँच गये हैं।
पिछले वर्ष, यानी अक्टूबर-नवम्बर, 2009 में भी हम इधर आये थे। भाई श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु ने तब सुश्री सुधा भार्गव का फोन नम्बर मुझे लिखवाया था। इस बार भी उन्होंने ही फोन लिखवाया था और उस समय हम उन्हीं से मिलने को जा रहे थेश्रीयुत राजेश उत्साही जी से। ऊपर की पंक्तियों में केवल कुछ रहस्य बुनने की नीयत से मैंने उन्हें राजेश सम्बोधित किया है। वस्तुत: तो पहले दिन से ही मैं उन्हें उत्साही जी सम्बोधित करता हूँ। इस कथा में रहस्य बुनने की नीयत से उन्हें राजेश सम्बोधित करने की अपनी अशिष्टता के लिए मैं क्षमा याचना करता हूँ।

शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

संयम के निहित-अर्थ/बलराम अग्रवाल


अयोध्या पर बीच का रास्ता निकालने-जैसा प्रशंसनीय फैसला सुनाया जा चुका है। बेशक सभी फैसले ऐसे होते हैं कि उनसे दोनों पक्षों का शत-प्रतिशत सहमत होना असम्भव रहता है।
मन्दिर-निर्माण के लिए तराशे गये पत्थर
फैसले के समय पक्ष-विपक्ष के सभी समझदार लोगों ने जनता से संयम बरतने की अपील की। यह संयम क्या है?इसे समझना जरूरी है। 6 दिसम्बर, 1992 को जिस समय बाबरी मस्जिद कहे जाने वाले ढाँचे को गिरा दिये जाने की खबर आई, मैं गाजियाबाद के नवयुग मार्केट स्थित प्रधान डाकघर में कार्यरत था। मुझे मालूम चला कि बुलन्दशहर के मेरे मुहल्ले के एक पड़ोसी जिन्हें हम चाचाजी सम्बोधित करते थे, अपनी बेटी के नेहरू नगर स्थित निवास पर थे और गम्भीर रूप से बीमार थे। घर से संदेश आया कि मैं उन्हें देख जरूर आऊँ। संदेश न आता तो भी उनसे इतनी आत्मीयता थी कि उन्हें देखने मैं अवश्य जाता। मैंने अपनी साइकिल उठाई और ऑफिस-प्रांगण से सड़क पर निकल आया। पोस्ट ऑफिस के सामने उन दिनों उर्वशी सिनेमाघर हुआ करता था जो काफी प्रसिद्ध था। सिनेमाघरों में घटती दर्शक-संख्या ने उसे ध्वस्त कर उस स्थान का अन्य व्यापारिक उपयोग करने हेतु उसके स्वामियों को उकसाया और आज वह जगह समतल पड़ी है। उसके पीछे वाली सड़क यानी नगर परिषद के मुख्य-द्वार के सामने से होकर जैसे ही मैं कुछ आगे बढ़ा, मैंने आसपास की दुकानों के कुछ लड़कों-युवकों को सड़क पर पटाखे छोड़ते देखा। यह बाबरी पर विजय का उल्लास था। ये वे लोग थे जो कभी भी अयोध्या नहीं गये थे और जिन्हें राम का अर्थ तक नहीं पता था। असलियत तो यह है कि उन्हें हिन्दु शब्द का भी तात्पर्य नहीं पता था। वे मूढ़ किस्म के ऐसे दोपाये थे जो उच्छृंखलता को उल्लास की संज्ञा देते है। अगर मैं यह कहूँ कि ऐसे अवयव सभी धर्मों में होते हैं, तो यह मेरी मूर्खता होगी क्योंकि धर्म से किसी भी प्रकार का संबंध न तो इनका होता है और न उनका जो इनकी पूँछें उमेठकर इनमें चाबी भरते हैं।
बहरहाल, मैंने सड़क के बीचोंबीच उन्हें पटाखों की लड़ियाँ बिछाते देखा और आराम से समझ गया कि कुछ ही देर में कर्फ्यू लगने वाला है। मैं इतना डर गया कि वहाँ से साइकिल चलाकर नेहरू नगर जाने और चाचाजी के पास आधा घंटा बैठ आने का खतरा मोल लेना मुझे मुनासिब न लगा। मेरे डरे हुए मन ने पता नहीं क्यों यह कल्पना कर ली कि बहुत जल्द पटाखों की ये लड़ियाँ कुछ खास लोगों की दुकानों के छप्परों पर फेंकी जाने लगेंगी और हालात बिना मतलब ही काबू से बाहर हो जाएँगे। पुलिस जब तक आयेगी, तब तक बहुत-कुछ स्वाहा हो चुका होगा। सड़कों पर नौ-नौ बाँस कूद  रहे ये बहादुर अपनी माँ-बहन-पत्नी के पहलू में जा छिपे होंगे इस दर्प के साथ कि इन्होंने बाबर और उसकी पुश्तों से कई सौ साल बाद ही सही, बदला ले लिया है। इन्हें एक बार भी यह याद नहीं आयेगा कि गाजियाबाद से लेकर गढ़ गंगा तक तमाम पट्टी के मुसलमान उनके अपने भाई हैं। उनकी रगों में भी वही गंगाजल बहता है जो इनकी रगों में। यों तों पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान अलग हैं ही नहीं, कुछेक ऐसे सम्भ्रांतों को छोड़कर जो अपने-आप को परिवर्तित न मानकर मूल मानते हैं। यहाँ उद्देश्य उनकी पवित्रता पर बहस करना नहीं हैं। बड़ी-बड़ी लड़ाइयों, लूटों और झगड़ों-फसादों की इस दुनिया में किसका लहू कितना अनछुआ और पवित्र रह गया है इसे बताने वाली माँएँ जब जिन्दा थीं, तभी उनकी किसी ने नहीं सुनी, अब तो वे स्वर्ग सिधार चुकी हैं।
अयोध्या में राम जन्मभूमि मन्दिर हेतु नक्काशी की हुई शिलाओं पर पहरा देता जवान
तात्पर्य यह कि मैं उन उच्छृंखलों की कारगुजारियों से भीतर तक डर गया और ऑफिस लौटकर वापस अपनी सीट पर जा बैठा। यह बताने की जरूरत नहीं है कि मेरी आशंका सच साबित हुई। नौनिहालों ने छप्परों पर पटाखों की लड़ियाँ फेकी और आग के सामने नाच-नाचकर जश्न मनाया। छप्परों के नीचे बोरियों में भुने आलू पहले भुने, फिर राख बन गए, किसी भूखे का निवाला न बन सके। सब्जियाँ, आटा, दाल, चावल… सबका एक ही हश्र थाराख में तब्दील हो जाना। बिहारी कालोनी स्थित कब्रिस्तान की चहारदीवारी ढा दी गई। सालों से वहाँ सोई रूहों को कहाँ पनाह मिली, इस सवाल का जवाब या तो अल्लाताला के पास है या उन रूहों के जिन्हें कुछ शैतानों के कारण कयामत से पहले ही अपनी जगह से उठ जाना पड़ा। नियत वक्त से पहले उन्हें इतना मज़बूर करने की सज़ा क्या होगी?यह भी ऊपर वाला ही जाने। पुलिस चौकी सिहानी गेट के निकट एक दर्ज़ी की दुकान के ताले तोड़कर उसके सिले-अनसिले सारे कपड़े ये बहादुर लोग लूट ले गए। वे सब-के-सब तो हिन्दुओं के ही थे। सब न सही, ज्यादातर सही।
हिन्दुओं की ओर से हो या मुसलमानों की ओर से, सिखों की ओर से हो या ईसाइयों की ओर से, एक सम्प्रदाय द्वारा दूसरे की ईमानदारी पर, उसकी निष्ठा पर सन्देह करना या एक सम्प्रदाय द्वारा कोई भी ऐसा काम करना जिसके कारण दूसरे समुदाय को उस पर, उसकी नीयत अथवा कार्यशैली/चिन्तनशैली पर सन्देह करने की गुंजाइश बनेराष्ट्रद्रोह है। इसे माफ नहीं किया जाना चाहिए। देश की दण्ड-व्यवस्था का इस दुविधा से बाहर आ जाना अति आवश्यक है।
दोस्तो, कुछ सांस्कृतिक संगठनों ने और एकाध राजनीतिक दिवालिये ने भी भड़काऊ बयान जारी किए हैं कि यह फैसला तथ्याधारित नहीं है इसलिए गलत है। तथ्य ठस होते हैं, संवेदना से उनका लेना-देना नहीं होता। तथ्यों के पीछे भागते-भागते कुछ लोग उनके-जैसे ही ठस और संवेदनहीन हो चुके हैं और नहीं चाहते कि भारत के लोग दुविधारहित जीवन जिएँ। इसका यह मतलब बिल्कुल न निकाला जाय कि फैसले से जो बहुसंख्यक आज सन्तुष्ट नजर आ रहे हैं, उन्हें देश और समाज में सन्तुलन की विशेष चिन्ता है। कल, माननीय सुप्रीम कोर्ट यदि वर्तमान फैसले पर अपना कुछ ऐसा दृष्टिकोण पेश कर दे जो उनके आज के मन्तव्य से किंचित भी भिन्न या मान्यता से इतर हो तो वे स्वयं भी भूल जाएँगे कि अभी कुछ ही दिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला आने पर उन्होंने जनता से कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए संयम बरतने की अपील की थी।
अंत में, यह बता देना भी आवश्यक ही है कि 6 दिसम्बर, 1992 को उल्लास पर्व मना रहे कुछ उच्छृंखलों से डरकर जिन बीमार चाचाजी को देखने मैं उस समय नहीं जा सका था, फिर कभी भी नहीं जा सका। उच्छृंखलों की इस दुनिया से वे प्रयाण कर गए थे और ग़ज़ब की बात यह रही कि यह सूचना भी वातावरण शान्त हो जाने के बाद ही कभी मिल पाई।

शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

स्‍वतंत्र सिनेमा के रास्‍ते के संकट कटने चाहिए/संजय झा

(यमुनानगर से अविनाश वाचस्पति द्वारा प्रेषित विशेष रपट)
 अक्टूबर,१ यमुनानगर। सरकार ऐसी नीति बनाए, जिससे नए फिल्मकार के सामने फंड और प्रोड्यूसर की दिक्कतें खत्म हों और स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा मिल सके। यह विचार स्ट्रींग्स बाउंड बाई फेथ के निर्माता संजय झा व बिओंड बॉडर्स की निर्मात्री शर्मिला मैती ने प्रेस कांफे्रंस के दौरान पत्रकारों से कहे।
संजय झा ने कहा कि वे लोग भाग्यशाली होते हैं,जिन्हें आसानी से प्रोड्यूसर व फंड मिल जाता है। स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा मिलने से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में ऐसे लोगों का पदार्पण होगा, जो फिल्म बनाने के इच्छुक हैं। हालांकि आज डिजिटल मीडिया का युग है, जिसमें नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। अब मोबाइल पर भी फिल्में देखी और बनाई जा सकती है। एक अन्य सवाल के जवाब में झा ने कहा कि बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज जैसे छोटे शहर से होने के बावजूद भी उन्होंने लक्ष्य को नहीं भुलाया है। छोटे शहरों से भी अच्छे फिल्मकार सामने आ रहे हैं जिनके मन में इस विधा के प्रति सच्ची चाहत है अपनी फिल्म के बारे में बतलाते हुए उन्होंने कहा कि मेरी फिल्म एक यात्रा वृतांत है। जिसमें कुंभ मेले के माध्यम से आस्था का पर्व दिखाया है। इस फिल्म की कहानी वारेन हास्टिंग नाम के एक ब्रिटिश युवक की है, जो नासिक मेले में एक पुजारी के घर ठहरता है और पुजारी की बेटी कृष्णा से पे्रम कर बैठता है। फिल्म की कहानी इसी विषय पर केंद्रित हो आगे बढ़ती है। उन्होंने बताया कि 2003 में 20 लाख लोगों के बीच जाकर एक महीने में इस फिल्म को फिल्माया गया है। । फिल्म बनाते समय उन्होंने व्यावसायिकता से समझौता नहीं कि और ज्वलंत मुद्दे पर फिल्म बनाई है। यह फिल्म कवि बाबा नागार्जुन को समर्पित है। फिल्म कमर्शियल सिनेमा को छूती है। फिल्म का संगीत आसाम के जुबीन गर्ग का है। इस फिल्म के निर्माता मैथ्यू वर्गीस ने कहा कि रजनल क्षेत्र में बनी फिल्में भी विश्व में ख्याति अर्जित कर रही है। उन्होंने कहा कि कहानी व भाषा में ताकत होनी चाहिए,फिल्म हिट होना लाज़मी है।   
फिल्म निर्मात्री शर्मिला मैती ने बताया उनकी फिल्म बिओड बॉडर्स बंगाल व पूर्वी पाक विभाजन पर आधारित है। इस फिल्म में विभाजन के बाद तीन महिलाएं अपनी अनुभवों को बांटती है। हालांकि यह एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है,जिसमें गीता घटक व गीता डे मुख्य किरदारों में है। विभाजन का असर औरतों के जीवन पर क्या प्रभाव डालता है, इस बारे में फिल्म में दिखाया गया है।

यमुनानगर में अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन अमूल्य उपलब्धि/अडूर गोपालकृष्णन


(यमुनानगर से अविनाश वाचस्पति द्वारा प्रेषित विशेष रपट)
 अक्टूबर-१, यमुनानगर। दादा साहेब फाल्के अवार्ड से सम्मानित मशहूर फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन ने कहा कि बड़े शहरों में सुविधाओं की वजह से फिल्मोत्सव आसानी से आयोजित हो जाते हैं। लेकिन यमुनानगर जैसे शहर में फिल्म फेस्टिवल का आयोजन एक अमूल्य उपलब्धि है। आने वाले वर्षो में यह समारोह अपने और बेहतर स्वरुप में निखरकर सामने आएगा। अडूर ने तीसरे हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म
समारोह के अवसर पर दीप प्रज्वलित करते हुए यह उद्गार प्रकट किए। उन्होंने कहा कि गंभीर सिनेमा लोगों की समझ को परिपक्व करता है। इस भव्य कार्यक्रम की अध्यक्षता कालेज प्रिंसिपल डा. सुषमा आर्य ने की। फिल्मकार के. बिक्रम सिंह विशिष्ठ अतिथि के तौर पर उपस्थित रहे।
अडूर गोपाल कृष्णन ने यह भी कहा कि विश्व सिनेमा को हरियाणा की धरती पर उतारने का प्रयास प्रशंसनीय है। सिनेमा को सर्वाधिक ख्याति मीडिया से मिली है। हालांकि कॉमर्शियल फिल्में इतनी ज्यादा अपील नहीं करती,जितनी कला फिल्में करती हैं।
दुनिया भर में अनेक मीडिया स्कूल फिल्म से जुड़ी हुई विधाओं की ट्रेनिंग दे रहे हैं, जहां से निर्देशक, कैमरामैन और अन्य तकनीकी के जानकार सामने आ रहे हैं।
उन्होंने कहा कि जिसे संस्कृति की समझ होती है। वही अच्छी फिल्म बनाता है। इस समय क्षेत्रीय भाषा में बनी फिल्में देश विदेशों में खूब लोकप्रिय हो रही है।
हरियाणा फिल्म समारोह के डायरेक्टर अजीत राय ने कहा कि सिनेमा लोगों की सोच को सही दिशा देता है, जो समाज को बदलने में सक्षम होते हैं। सिनेमा की असली पहचान भारतीय जन जीवन में गहरे जुड़ी हुई है। जिसके प्रभाव के आगे दुनिया नतमस्तक है।
हमारे लिए गर्व का विषय है कि तीसरे हरियाणा फिल्म समारोह में देश के दो बड़े विश्व प्रसिद्ध फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन व श्याम बेनेगल अपनी फिल्मों के साथ शामिल हुए हैं। फिल्म समारोह को ठोस आकार देने के लिए कोशिशें जारी रहेंगी।
जिसमें श्याम बेनेगल जी का दर्शकों के साथ सीधा संवाद करवाया जाएगा। इसके अतिरिक्त फिल्म अभिनेता ओमपुरी भी लोगों से रू-ब-रू होंगे। फिल्मोत्सव में श्याम बेनेगल की दो और मूल रुप से हरियाणा के कलाकार यशपाल शर्मा की चार फिल्में इस महोत्सव में प्रदर्शित की जाएंगी।
उन्होंने बताया कि यमुनानगर में आयोजित फिल्म फेस्टिवल आम आदमी का फेस्टिवल है। बड़े शहरों में फिल्मोत्सव पर 250 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं, जबकि यहां पर पांच लाख रुपए में ही इस समारोह का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अच्छे सिनेमा खुद ब खुद लोगों के दिलों में जगह बना लेता है। उन्होंने सभागार में उपस्थित लोगों से आह्वान किया कि वे सिनेमा का जश्न मनाएं। इस फिल्म
फेस्टिवल से सभी को यादगार अनुभव मिलेंगे।
कालेज प्रिंसिपल डा. सुषमा आर्य ने कहा कि तीसरे हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के दौरान उच्च क्वालिटी का सिनेमा लोगों को दिखाया जाएगा। 10 देशों की फिल्में समारोह के दौरान दिखाई जाएंगी। समारोह में नौ फिल्मों का हरियाणा प्रीमियर होगा। जबकि 30 शॉर्ट फिल्म भी दिखाई जाएगी। समारोह में चाइल्ड फिल्म व डाक्यूमेंट्ररी फिल्म सेक्शन को भी शामिल किया गया है। समारोह में उन फिल्मों
को दिखाया जा रहा है, जिसमें आम आदमी के जन जीवन को उकेरा गया है। कालेज प्रिंसिपल ने अडूर गोपालकृष्णन व के. बिक्रम सिंह जी को पुष्प गुच्छ व प्रतीक चिंह देकर सम्मानित किया। अडूर गोपालकृष्णन की फिल्म शैडो किल से समारोह में फिल्मों के प्रदर्शन की शुरूआत हुई।

फिल्‍म उद्योग में हिंदू-मुस्लिमों के बीच भाईचारा कायम है/अडूर गोपालकृष्‍णन



[यमुनानगर (हरियाणा) से अविनाश वाचस्पति द्वारा प्रेषित विशेष रपट]
दादा साहेब फाल्के अवार्ड से अलंकृत विश्‍वविख्यात  फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन ने 30 सितम्‍बर की  सांय  डी ए वी गर्ल्‍स  कालेज,  यमुनानगर(हरियाणा) में आयोजित तीसरे हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्‍म समारोह  की पूर्व-संध्या पर विशेष प्रेस  कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा कि  उनके द्वारा निर्देशित फिल्मेंशैडो किल आदि  सत्य-घटना पर आधारित हैं। इस फिल्म में एक जल्लाद की मन:स्थिति को दर्शाया गया  है। जिसमें उन्‍होंने एक जल्लाद के इंटरव्यू से प्रेरित होकर फिल्‍म का निर्माण  किया। 

अपनी फिल्मों के लिए आठ बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित फिल्‍मकार अडूर का मानना है कि हिंदू-मुसलमानों के बीच जितना सौहार्द भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के अंदर है, उतना किसी अन्य क्षेत्र में नहीं है। मुसलमान  होने के बावजूद सुप्रसिद्ध अभिनेता (यूसुफ खान) ने अपना हिन्दू नाम दिलीप कुमार रखा,  इससे उन्हें ख्याति भी खूब मिली और दोनों ही वर्गों द्वारा उन्हें स्वीकार भी किया गया। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में अडूर ने कहा कि वे केरल की जिंदगी को मुंबइया फिल्मों की तुलना में बेहतर तरीके से जानते हैं।  मुंबईया फिल्में भारत की जिंदगी की  असलियत नहीं दिखलातीं। फिल्मों में सिर्फ भाषा ही नहीं, अपितु ऐसी बहुत-सी चीजें होती हैं, जिन्हें समझने की जरुरत है। उन्होंने बतलाया कि कोई फिल्म निर्माता  स्थानीय होने के बाद ही यूनिवर्सल बनने की ओर कदम बढ़ाता है, जिसके जीवंत  उदाहरण सत्यजीत राय व श्याम बेनेगल हैं।
बायें से:सर्वश्री अडूर गोपालकृष्णन,  के बिक्रमसिंह तथा अजित राय
कान, वेनिस व बर्लिन फिल्म समारोह में मिलने पुरस्कारों को  ऑस्कर अवार्ड से कहीं बड़ा बतलाते हुए उन्‍होंने कहा कि ऑस्‍कर  सिर्फ अमेरिकन फिल्म इंडस्ट्री की देन है। अडूर ने छोटे फिल्‍म समारोहों की उपयोगिता को सार्थक बतलाते हुए जोड़ा कि बड़े व छोटे फिल्मोत्सव दोनों ही समान रुप से महत्वपूर्ण होते हैं। छोटे फिल्मोत्सव में फिल्मों के शिल्प व शैली की ओर सदैव अधिक ध्यान दिया जाता है और बड़े उत्सवों में ग्लैमर और चकाचौंध पर फोकस किया जाता है। फिल्मकार को हमेशा  जिन्दगी की असलियत ही दिखानी चाहिए और किसी को भी इसमें शर्म महसूस नहीं करनी चाहिए। लोगों की यह धारणा गलत है कि कला-फिल्में पैसा नहीं कमातीं। इसके प्रमाणस्वरूप उन्होंने सत्यजीत राय की उन फिल्मों के नाम गिनाए, जिन्होंने लागत से अधिक पैसा कमाने का रिकार्ड कायम किया है। प्रेस कांफ्रेंस के दौरान अडूर गोपालकृष्णन ने यह भी बताया कि उन्होंने जितनी भी फीचर फिल्में बनाई हैं, उनकी फिल्म ट्रांसक्राइब करके स्क्रिप्ट तैयार की जा रही है और शीघ्र ही  अंग्रेजी पुस्तक के रूप में प्रकाशित की जा रही है।
प्रेस कान्फ्रेंस में बोलते हुए के बिक्रमसिंह
प्रेस कांफ्रेंस के दौरान फिल्मकार के. बिक्रम सिंह ने  कहा कि आजादी के 60 साल बीत जाने के बाद भी देश में 40 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी नहीं मिल पाती जबकि हम कॉमनवेल्थ गेम्स पर 70 हजार करोड़  रुपए से अधिक की राशि खर्च करने के लिए तैयार हैं।

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

द्वारका(गुजरात) से लौटकर

24 सितम्बर को मैं द्वारका(गुजरात)में था। वहाँ मुसलमानों की संख्या कम नहीं है। 25 सितम्बर को हमने भेंट द्वारका टापू, वहाँ की भाषा में जिसे बेट द्वारका कहा जाता है, की यात्रा की। टूरिस्ट बस में बतौर गाइड चल रहे पंडे ने बताया गया कि 'भेंट द्वारका की कुल आबादी लगभग 7000 है जिसमें मात्र 1000 हिन्दू हैं शेष 6000 मुसलमान।'
भेंट द्वारका में एक संकेतपट के निकट बैठा एक स्थानीय बुजुर्ग
भेंट द्वारका के  मुसलमानों का मुख्य व्यवसाय समुद्र से मछली पकड़ना है। पंडों का मुख्य व्यवसाय जमीन से मछली(यानी श्रद्धालु) पकड़ना है। इन दोनों ही तरह की मछलियों की उक्त क्षेत्र में कोई कमी ईश-कृपा से नहीं है। क्योंकि दोनों का व्यवसाय ठीक चल रहा है शायद इसीलिए दोनों ही स्थानों पर हमने अयोध्या-विवाद का कोई असर नहीं देखा जबकि 23 सितन्बर से ही टीवी पर लगातार लगभग भयावह खबरें आ रही थीं। 25 सितम्बर को दोपहर बारह बजे के आसपास अपने होटल से द्वारका रेलवे स्टेशन तक जिस ऑटो में बैठकर पहुँचे उसे मौहम्मद असलम चला रहे थे। द्वारकाधीश मन्दिर के मुख्य प्रांगण में घूमते हुए आठों याम पान-तम्बाखू-गुटखा गालों में दबाए घूमते और मन्दिर की किसी भी दीवार पर यहाँ तक कि फर्श पर भी जहाँ-तहाँ पीक थूकते पंडों से एकदम उलट उनका मुँह इन 'भगवत प्रसाद' तुल्य खाद्यों से रहित था। वे चार बेटियों के पिता थे। दो बेटियों की शादी कर चुके थे, दो अभी पढ़ रही हैं। मौहम्मद असलम का जन्म भी द्वारका में ही हुआ और पालन पोषण भी। डर अथवा संशय न उनके चेहरे पर था और न बातों में। कहने लगे ऊपर वाले की दुआ से दो रोटी चैन से कमा लेते हैं; बैंक से लोन लेकर ऑटो लिया था--सब चुका दिया, ऑटो अब अपना है। द्वारका से जामनगर पहुँचा। रेलवे प्लेटफॉर्म से ही सुनहरे रंग से सज्जित एक खूबसूरत मस्जिद दिखाई दी। समय काफी था इसलिए प्लेटफॉर्म से बाहर जाकर उसे देखने का लोभ संवरण न कर सका। जाकर देखा। वह थी--'मस्जिदे रोशन'। ज़िन्दगी में पहली बार मुझे मालूम हुआ कि मस्जिदें भी  सुन्नी और शिया में बँटी होती हैं। यह भी हो सकता है कि गुजराती-लिपि का पूर्ण अभ्यस्त न हो पाने के कारण मस्जिद के बाहरी गेट पर लगे सूचनापट का अर्थ मैं न समझ पाया होऊँ। बहरहाल, मुझे क्योंकि अपने सुन्नी या शिया होने का ज्ञान नहीं था इसलिए किसी भी अन्य जानकारी को पाने के लिए मेरी हिम्मत उसके अन्दर बैठे-घूमते लोगों के पास जाने की नहीं हुई। दोपहर के चार-साढ़े चार बजे का समय था। अयोध्या का फैसला आने से डरने या सावधान होने जैसी कोई हलचल मुझे मस्जिद के अन्दर-बाहर महसूस नहीं हुई।
मस्जिद-ए-रौशन, जामनगर
एक अधेड़ फकीर मस्जिद के बाहर अपना जामा फैलाए बैठा था। बेखौफ। स्टेशन के चारों ओर सड़कें बदहाल हैं या कहिए कि हैं ही नहीं। इस साल बारिश ने सड़क-ठेकेदारों का बहुत भला किया है। आगामी पाँच साल तक का प्रोजेक्ट मिल सकता है। दिल्ली हो या गुजरात सड़कें कहीं भी दुरुस्त हालत में नहीं बची हैं। वापसी में मैं मुख्य द्वार से प्लेटफॉर्म में प्रविष्ट नहीं हुआ। साइकिल स्टैंड की तरफ वाले खुले रास्ते से प्लेटफॉर्म पर गया। उस तरफ की सड़क अभी भी ठीक है। ठेकेदारों का दुर्भाग्य! इस तरह मैंने जामनगर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नम्बर एक की जैसे परिक्रमा ही पूरी कर डाली। सब-कुछ सामान्य। रोज़ाना जैसा। गोरखपुर एक्सप्रेस में रात 9 बजकर 45 मिनट पर जामनगर से सवार हुए और सुबह 5 बजकर 10 मिनट पर अहमदाबाद पहुँच गए। निश्चिन्तता इतनी कि टी आई से कहना पड़ा कि 'सर, अहमदाबाद से कुछ पहले जगा देना। ऐसा न हो कि अहमदाबाद निकल जाए और हम सोते ही रह जाएँ।' टी आई हँसमुख व्यक्ति था। हिन्दू था या मुसलमान--यह जानने की हमें जरूरत ही महसूस नहीं हुई। हाँलाकि बैज पढ़कर हम आसानी से यह जान सकते थे।
'चिन्ता न कीजिए।' उसने कहा,'मैं भी अहमदाबाद तक ही जाऊँगा।'
बावजूद इसके हमने अपने मोबाइल सेट में 4 बजकर 30 मिनट का अलार्म सेट किया और सो गए। नींद गहरी आई। पता नहीं कितना बजा था कि उतरने वाली सवारियों की हलचल से आँख खुल गईं। खिड़की से झाँकने पर ट्रेन की स्थिति का कुछ पता नहीं चला।  बाहर, गेट पर खड़े एक सज्जन से पूछा तब पता चला कि अभी साबरमती से गुजर रही है, कुछ ही देर में अहमदाबाद आने वाला है। सुबह 5 बजे के आसपास हम अहमदाबाद के प्लेटफॉर्म नम्बर 6 पर उतर गए थे। वहाँ से चलकर प्लेटफॉर्म नम्बर एक पर स्थित प्रतीक्षालय में पहुँचे और सामान को किनारे लगाकर जैसी भी जिसको सुविधा मिली वह एक-एक सोफा घेरकर सो गया। वहाँ सोते हुए चोर-उचक्कों द्वारा सामान पर हाथ साफ न कर डालने का डर तो मन में था, किसी मुसलमान द्वारा हमला कर देने का विचार तक मन में नहीं था।
दस बजे के आसपास अपने कवि मित्र आईएएस अफसर श्रीयुत प्रवीण गढ़वी को फोन मिलाया। बोले--चले आओ। रेलवे स्टेशन के क्लॉक रूम में सामान जमा करने के बाद वहाँ से बाहर आकर गाँधीनगर जाने वाली लोकल बस के बारे में पूछने से पहले हमने एक भी व्यक्ति से यह नहीं जाना कि वह हिन्दू है या मुसलमान! और न ही बताने वाले ने बताने से पहले हमसे हमारा समुदाय पूछा।
भेंट द्वारका जाते हुए हिन्दू श्रद्धालुओं के साथ नाव पर सवार स्थानीय यात्री
तात्पर्य यह कि द्वारका से जामनगर, जामनगर से अहमदाबाद और अहमदाबाद से यहाँ दिल्ली-शाहदरा आ जाने तक मुझे सब कुछ सामान्य ही लगा। आज 28 सितम्बर है। बेशक आम आदमी, जो पवित्र द्वारका भूमि पर पैदा हुए भाई मौहम्मद असलम की तरह चैन से दो रोटी कमाने-खाने और बच्चों को पालने-पोसने को पहला धर्म समझता और मानता है, को बाबरी-अयोध्या से कोई मतलब नहीं है; लेकिन जिन्हें मतलब है वो असलम-जैसे (या अनिल-अशोक- सुनील जैसे) सीधे-सच्चे इन्सानों के दिमाग को संशय से भर देने का कुकृत्य करने से कभी भी बाज नहीं आयेंगे।
पूरे देश में घूम जाइए। बाबरी-अयोध्या आम आदमी के चिन्तन में नहीं हैं। अस्तित्व न हिन्दू का खतरे में नजर आता है, न मुसलमान का; न हिन्दुत्व का न इस्लाम का। वे और-ही लोग हैं जिनका अस्तित्व खतरे में है। वे न हिन्दू हैं और न मुसलमान।  जो लोग संशयभरी बातें करते हैं वे न तो सही अर्थ में इन्सान हैं न भारतीय।

बुधवार, 1 सितंबर 2010

पत्थर की पुकार*

दोस्तो,नेक बार महसूस होता है कि सैकड़ों अच्छे कामों के बीच एक गलत काम की ओर इंगित करना सठिया जाने से अधिक कुछ नहीं है। बीमारी को किसी ने अगर बिमारि या बिमारी लिख दिया तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा! लेकिन दिल है कि…। दरअसल, वर्तनी की गलतियाँ अगर चालीस-पचास हजार रुपए प्रतिमाह हिन्दी के नाम पर ही घर ले जाने वाली कलमों के नीचे से निकल रही हों तो अफसोस बहुत बढ़ जाता है। हिन्दी के नाम पर सरकारी, अर्द्ध-सरकारी कार्यालयों में कार्यरत हिन्दीप्रेमी नौकरशाहों के झंडेतले सम्पन्न होने वाले हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ों के समापनस्वरूप हिन्दी विरुदावली से लेकर विदूषकस्तर के कवि-सम्मेलनों, कविता एवं निबंध प्रतियोगिताओं के माध्यम से हिन्दी के उन्नयन हेतु प्राप्त होने वाले अनुदान आदि की बंदर-बाँट का माह सितम्बर शुरू हो चुका है।
आइए, इस अवसर पर हिन्दी-सेवा का एक उत्कृष्ट नमूना देखें।
कुतुब मीनार परिसर में स्थित यह पत्थर कितने वर्षों से यहाँ जड़ा है इसका अनुमान लगाने की आवश्यकता नहीं है। बेहद प्रसन्नता की बात यह है कि इसे देवनागरी में लिखने की सदाशयता तत्कालीन अधिकारियों में थी। परन्तु, देखने की बात यह है कि अन्तर्राष्ट्रीय नक्शे पर चिह्नित इस परिसर में इस पत्थर पर खुदे हिन्दी के अनेक शब्द सम्बन्धित हिन्दी-अधिकारियों के मुँह पर इसके लिखे जाने से लेकर अब तक लगातार कालिख-सी पोत रहे हैं। आगामी माह अर्थात् अक्टूबर में राष्ट्रमंडल खेल प्रारम्भ होने जा रहे हैं। उनमें भाग लेने वाले खिलाड़ी और प्रतिनिधि-मंडल के सदस्य आदि कम-से-कम राष्ट्रमंडल देशों के कितने ही भद्रजन इस परिसर में घूमने आयेंगे। तब, गलत हिन्दी वर्तनी जैसी अपनी ही भाषा के प्रति हमारी ऐसी लापरवाहियाँ उनके मन पर क्या प्रभाव डालेंगी? जरा सोचिए।
इसमें हिन्दू शिल्प शब्द से क्या तात्पर्य है? क्या यह भारतीय शिल्प से अलग कोई शिल्प है? कृपया बताएँ।
* जयशंकर प्रसाद की एक लघुकथा का शीर्षक

रविवार, 11 जुलाई 2010

अवशेष एक बुजुर्ग पीपल और हिन्दी-वर्तनी के

सेलुलर जेल, पोर्ट ब्लेयर के प्रांगण में प्रत्येक कार्यदिवस की शाम को हिन्दी व अंग्रेजी भाषा में ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। गुणवत्ता और प्रस्तुतिकरण के स्तर पर इसे नि:संदेह स्तरीय कहा जा सकता है। कुछेक कमियों के बावजूद, देश के प्रति भावुक हृदय रखने वालों में यह रोमांच का संचार करने में पूर्णत: सक्षम है। इसमें राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम से जुड़ी कई ऐसी बातों का उल्लेख होता है जिनका आम-नागरिक को नहीं पता। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इसके प्रांगण में पीपल के एक पेड़ का होना भी बताया जाता है। पीपल का वह पेड़ काला पानी की सजा प्राप्त कैदियों पर जेल के दुष्ट अधिकारी जनरल बारी के प्रत्येक अत्याचार का चश्मदीद गवाह रहा। 1876 के आसपास निर्मित सेलुलर जेल के उन पीपल-बाबा की आयु इस समय कम-से-कम 150 वर्ष होनी चाहिए थी, क्योंकि 15 वर्ष आयु तो उनकी उस समय भी रही ही होगी। हो सकता है कि उक्त प्रांगण में आयु की दृष्टि से उनसे छोटे-बड़े एक नहीं अनेक पीपल-वृक्ष और-भी रहे हों; और इसमें तो दो राय हो ही नहीं सकतीं कि अन्य-भी अनेक प्रजातियों के वृक्ष उस काल में वहाँ रहे होंगे जो तत्कालीन ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा समय-समय पर निर्मित जेल के सौंदर्यीकरण की योजनाओं की भेंट चढ़ते रहे होंगे। खैर, इन दिनों जो पीपल-वृक्ष सेलुलर-प्रांगण में खड़ा है, उसकी आयु 15-20 से अधिक नहीं लगती। ऐसा प्रतीत होता है कि कैदियों पर ब्रिटिश-दानवों के अत्याचारों का एक चश्मदीद गवाह वहाँ खड़ा रखने के व्यापारिक-उद्देश्य से काफी बाद में उसे संरक्षित किया गया है। बहरहाल, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के पोर्ट ब्लेयर स्थित (संभवत:) पुरातत्व संग्रहालय में मूल पीपल-वृक्ष के तने का एक भाग रखा देखकर एकदम ऐसा लगा जैसे अपने किसी पूर्वज की लोहे-सी मजबूत हड्डी का दर्शन हुआ हो। मन श्रद्धा और क्षोभ दोनों से लबरेज हो गया। क्षोभ से क्यों? कई कारण रहे जिनमें एक कारण उसके बारे में सूचना प्रदान करने वाली पट्टिका में लिखित हिन्दी के शब्दों में वर्तनी की अनगिनत अशुद्धियाँ भी हैं। उसे देखकर यह समझते हुए भी कि इसका देवनागरी में लिखा जाना भी एक उपलब्धि कहा जाना चाहिए, पता नहीं क्यों मुझे उक्त पीपल-वृक्ष के साथ-साथ हिन्दी का भी कटा-शरीर वहाँ रखा प्रतीत हुआ। सितम्बर माह में शुरू होने वाले हिन्दी सप्ताह और हिन्दी पखवाड़ा आयोजनों में किस-किस स्रोत से पैसा खींचना है अथवा पैसा बहाकर किन महानुभावों को कृतार्थ करना है, यह सब या तो निश्चित हो चुका होगा या निश्चित होने की प्रक्रिया में होगा। बहरहाल, आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं स्वाधीनता-सैनिकों पर ब्रिटिश अत्याचारों के मूक-गवाहों के कुछ फोटो:




शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

फाँसीघर—सेलुलर जेल, पोर्टब्लेयर

अपना दौर के इस अंक में प्रस्तुत है, अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के पोर्टब्लेयर स्थित सेलुलर जेल का ऐतिहासिक फाँसीघर।

सेलुलर जेल, पोर्ट ब्लेयर के प्रांगण में स्थित इस फाँसीघर का फर्श लकड़ी के तख्तों से दरवाजानुमा बना है जो बायीं ओर दिखने वाले लोहे के लीवर को खींचने पर नीचे को खुल जाता था। इस पर बनी सफेद रंग़ की गोल आकृति पर खड़ा करके, ऊपरी बीम में बँधे फंदों को मृत्युदण्ड प्राप्त देशभक्तों की गरदन में फँसाया जाता था। तत्पश्चात लीवर को खींच दिया जाता था और देशभक्त का शरीर नीचे झूल जाता था।

कितने देशभक्तों ने इन्हें चूमा, उनका सही-सही आँकड़ा हमेशा ही संदिग्ध रहेगा। उन सभी महान आत्माओं को असीम श्रद्धा के साथ नमन।



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रविवार, 4 अप्रैल 2010

भारत में लड़कियाँ


लड़कियों को ऐसे ही नहीं कह दिया जातागाय। नाथद्वारा(जिला राजसमंद, राजस्थान) में अहल्या कुण्ड के एकदम ऊपर बने इस खुले चबूतरे पर खड़ी इस गाय-जैसा निरीह जीवन जीती हैं वे। जहाँ भी खड़ा कर दिया जाय, खड़ी रहती हैंकड़ी धूप में…कड़ी ठंड में…बारिश में। रूखा-सूखा जो भी आगे डाल दिया जाय, चर लेने को विवश हैं। न डाला जाय तो खड़ी-बैठी ऊँघती रहती हैं, जुगाली करती-सी। कहने को कोई रस्सी नहीं है उनके गले में और न ही पैरों को जकड़े है कोई जंजीर। स्वतन्त्र हैं। लेकिन, गहरा कुण्ड है उनके तीन तरफवे जानती हैं और यह भी कि चौथी दिशा को अनखुदा रखा गया है उन्हें दुहने हेतु आते-जाते रहने भर के लिए। जब जी चाहे वे स्वयं और जब जी चाहे मालिक लोग समाप्त कर सकते हैं उनकी इहलीला। दुर्घटनाएँ हमेशा होती ही नहीं, की भी जाती हैं दुनियाभर में। सिर्फ भारत है, जहाँ हर स्तर पर संरक्षण के हजारों-हजार दावों के बावजूद भी बदहाल हैं गायें… बदहाल हैं लड़कियाँ।

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

दूध वाले भैया


दिल्ली में दूध-आपूर्ति इसकी सीमा से सटे उत्तर प्रदेश और हरियाणा के ग्रामीण अंचलों द्वारा की जाती है। कुछ आपूर्ति रेलगाड़ियों द्वारा, कुछ दुग्ध-वाहनों द्वारा, कुछ पैडल-साइकिलों द्वारा, कुछ स्कूटरों और मोटर-साइकिलों आदि के द्वारा भी संपन्न होती है। यह बेहद श्रमसाध्य कार्य है जिसमें लगे लोगों की रातें जागते हुए गुजरती हैं क्योंकि दिल्ली के नौनिहालों को सुबह-सबेरे दूध उपलब्ध कराया जा सके। दूधिया या दूध वाले भैया कहलाने वाले इन लोग की दिनचर्या और जीवनचर्या दोनों पर बहुत सकारात्मक कलम चलाई जानी चाहिए। इनकी पैडल-साइकिलों में हैंड-ब्रेक नहीं होते। जरूरत पड़ने पर उसे ये अपने पैरों के करतब से रोकते हैं। बेशक, इनमें से अनेक दुग्ध-डेयरियों की बजाय दुग्ध-फैक्ट्रियों से माल उठाने और सप्लाई करने वाले हो सकते हैं, लेकिन सब नहीं। इनके चलते ट्रेनों और ट्रकों को कितने-कितने जिरह-बख्तर अपने बदन पर लादने पड़ते हैंउन्हें दर्शाने हेतु प्रस्तुत है यह फोटो:


शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

प्रगति मैदान, नई दिल्ली की यात्रा


दोस्तो,

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला,2010 दिनांक 30 जनवरी, 2010 से जारी है और 7 फरवरी, 2010 तक चलेगा। अनेक बोलियों, भाषाओं और लिपियों के जानकार इस मेले में आ-जा चुके होंगे और आगे भी आयेंगे। प्रगति मैदान के एक हॉल के बाहर जब से यह बोर्ड लटकाया गया है तब से अब तक हिन्दी-साहित्य के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले…से लेकर विदूषक कहे जाने वाले…नहीं, यहाँ मैं किसी का नामोल्लेख नहीं करूँगा, बस यह कहूँगा कि हर वर्ष हिन्दी-पखवाड़ा और हिन्दी-सप्ताह मनाने के नाम पर लाखों रुपए लुटा डालने वालों से लेकर लूट ले जाने वालों तक, हर स्तर का विद्वान यहाँ से अवश्य ही गुजरा होगा। मैं आपसे सिर्फ यह जानना चाहता हूँ फोटो में दर्शाया गया यह शब्द किस भाषा का है? इसी क्रम में कुछ-और फोटो भी मैं आगे प्रकाशित करने की अनुमति आपसे चाहूँगा।

--बलराम अग्रवाल