गुरुवार, 13 सितंबर 2012

मेरी हस्कल के नाम जिब्रान के कुछ पत्रों के अंश…



खलील जिब्रान
मेरी, सबसे बड़े अचरज की बात तो यह है कि ग़ज़ब की खूबसूरत इस दुनिया में, जो दूसरे इंसानों के लिए अनजानी है, हाथ में हाथ डाले हम हमेशा साथ घूमते हैं। एक-दूसरे के हाथ को पूरा खींचकर हम जीवन से रस खींचते हैंऔर नि:संदेह जीवन हमें वह देता है।
 (जिब्रान द्वारा 22 अक्टूबर 1912 को लिखे एक पत्र का अंश)
कोई व्यक्ति बिना महान हुए आज़ाद हो सकता है, लेकिन आज़ाद हुए बिना कोई भी महान नहीं हो सकता।
(जिब्रान द्वारा 16 मई 1913 को मेरी को लिखे एक पत्र का अंश)
सच्चा संन्यासी घने जंगल में खोजने के लिए जाता हैन कि स्वयं को खोने के लिए।
(जिब्रान द्वारा 8 अक्टूबर 1913 को मेरी को लिखे एक पत्र का अंश)

मेरी हस्कल का पेंसिल स्केच
तुम्हारे साथ, मेरी, आज उसने कहा,घास की एक पत्ती-सा बर्ताव करना चाहता हूँ जो वैसे ही नाचती है जैसे हवा उसे नचाती है। इस पल की नज़ाकत के मुताबिक बात करनी चाहिए। वही करूँगा। 
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 10 जनवरी 1914 से)
खुली सड़कों पर पैदल चलते रहने-जैसा बड़ा काम करना चाहता हूँ। जरा सोचो, मेरी, ऐसे में तूफान आ जाए तो क्या होगा! निर्द्वंद्व गति के माध्यम से जीवन देने वाले महाभूतों को देखने से बेहतर भी कोई दृश्य हो सकता है क्या?
(दिनांक 24 मई 1914 को लिखे एक पत्र का अंश)
अब मैं अपने-आप को तुम्हें सौंप सकता हूँ। दरअसल, किसी दूसरे के हाथों में अपने-आप को आप तभी सौंप सकते हैं जब वह जानता हो कि आप कर क्या रहे हैं। जब उसके दिल में आपके लिए आदर और प्यार हो। वह आपको आपकी आज़ादी दे सकता हो।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 20 जून 1914 से)
काव्य क्या है?दृष्टि की व्यापकता; और संगीत?श्रवण की व्यापकता।
(मेरी हस्कल के जर्नल 20 जून 1914 से)
कभी-कभी तुमने बोलना भी शुरू नहीं किया होता कि मैं पूरी बात समझ जाता हूँ।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 28 जुलाई 1917 से)
ज्ञान यानी पंखदार जीवन।
(दिनांक 15 नवंबर 1917 के एक पत्र का अंश)
तुमने मेरे काम में और व्यक्तित्व निर्माण में मेरी मदद की। मैंने तुम्हारे काम में और व्यक्तित्व निर्माण में तुम्हारी मदद की। मैं शुक्रगुजार हूँ परमात्मा का कि उसने मुझे और तुम्हें बनाया। 
(मेरी हस्कल के जर्नल 12 मार्च 1922 से)
अगर मुझे धूप और गरमाहट पसंद है तो बिजली और तूफान के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 12 मार्च 1922 से)
हृदय की आवाज़ सुनो। हर बड़े काम में वह सच्चा सलाहकार है। मन सीमित है। क्या करना चाहिएइसका निश्चय वह दिव्यशक्ति करती है जो हम-सब में विद्यमान है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 12 मार्च 1922 से)
 तुम्हारे और मेरे बीच रिश्ता मेरी ज़िंदगी की खूबसूरत घटना है। इससे पहले मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। यह दिव्य है।
(मेरी हस्कल के जर्नल 11 सितम्बर 1922 से)
बिशेरी स्थित खलील जिब्रान म्यूजियम में मूर्तिशिल्प
तुम्हें खुश देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। खुशी तुम्हारे लिए आज़ादी का रूप है। जितने भी लोगों को मैं जानता हूँ, उनमें सबसे अधिक आज़ाद तुम्हें होना चाहिए। यह खुशी और यह आज़ादी तुमने खुद पायी है। ज़िंदगी तुम्हें सुख और सुविधा देने वाली नहीं थी लेकिन तुम स्वयं ज़िंदगी को सुख और सुविधा देने वाली बन गई हो।
(जिब्रान के पत्र दिनांक 24 जनवरी 1923 से)
मुझे तुम्हारी खुशी की वैसी ही चिंता है जैसी तुम्हें मेरी खुशी की। अगर तुम्हारा मन शांत नहीं है तो मेरा कैसे रह सकता है।
(दिनांक 23 अप्रैल 1923 को लिखित जिब्रान की डायरी से)
बुद्धिमान लोगों के बीच विवाह का उपयुक्त आधार मित्रता यानी एक-दूसरे की रुचि का ख्याल रखना है। विचार-विमर्श करने की क्षमता है। एक-दूसरे के विचारों और आकांक्षाओं को समझना है।
(मेरी हस्कल के जर्नल 26 मई 1923 से)

आप किसी गाँव में रहें या महानगर में, क्या फर्क पड़ता है? असली ज़िंदगी तो आपके-अपने भीतर है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 27 मई 1923 से)
विवाह किसी भी व्यक्ति को वह अधिकार नहीं देता जिन्हें वह दूसरे व्यक्ति में नहीं देखना चाहता; और ना ही उससे अलग कोई आज़ादी देता है जितनी वह दूसरे व्यक्ति को देता है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक  27  मई  1923 से)
पेड़ों पर कलियाँ लदी थीं, चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, घास पर ओस थी, सारी धरती जगमगा रही थी। और एकाएक मैं पेड़ों में, फूलों में, चिड़ियों में और घास में तब्दील हो गया—‘मैं का नामोनिशान न रहा।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 23 मई 1924 से)
मैं जितना बोल नहीं पाता हूँ, तुम उससे कहीं ज्यादा सुन लेती हो। तुम अपनी चेतना से सुनती हो। मेरे साथ तुम वहाँ उतर जाती हो जहाँ मेरे शब्द तुम्हें नहीं लेजा सकते।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 5 जून 1924 से)


कोई भी मानवीय रिश्ता दूसरे पर अधिकार का द्योतक नहीं है। हर दूसरा व्यक्ति भिन्न है। दोस्ती में या प्यार में, दोनों समान रूप से उस ओर हाथ बढ़ाते हैं जिस ओर दूसरा कमजोर पड़ता है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 8 जून 1924 से)


बुधवार, 22 अगस्त 2012

श्रीकृष्ण : पूर्ण पटाक्षेप / बलराम अग्रवाल


श्रीमती कमला देवी
अभी, दस मिनट पहले की बात है। राजेन्द्र जैन जी मिल गये थेश्रीकृष्ण जी के दामाद हैं वे। पहले आँखों ही आँखों में अभिवादन किया, फिर स्कूटर रोककर बोले—“वो भी गईं।
मुझे समझने में देर नहीं लगी कि वह किनके बारे में मुझे बता रहे हैं। चौंककर पूछा,कब?
15 अगस्त को…सुबह साढ़े दस बजे।
सूरज पूरा अस्त हो गया… मेरे मुँह से निकला। यह कहते हुए श्रीमती कमला देवी(धर्मपत्नी श्री श्रीकृष्ण) के हवाले से लिखी मेरी एक टिप्पणी के जवाब में उनके प्रति कहे गए हिन्दी के भद्र(?) समझे जाने वाले एक लेखक के वे अभद्र शब्द भी मेरे जेहन में कड़ुआहट घोल गए जो उन्होंने सिर्फ़ इसलिए कहे थे कि श्रीमती श्रीकृष्ण (यानी श्रीमती कमला देवी) ने कभी उनका कृतघ्न चरित्र उन्हें दिखाने की पहल की थी और आत्ममुग्धताजनित अहंकार के चलते जिस कृतघ्नता को वे आज तक भी नहीं पहचान पाए। श्रीमती श्रीकृष्ण के चले जाने के बाद अपनी ही गाली को वे अब उम्रभर अपने सिर और कंधों पर ढोए फिरने को शापित हो गये हैं।
राजेन्द्र मेरे मन के झंझावात को नहीं जान सकते थे। मेरी बात सुनकर वे कुछ न कह सके, चुप खड़े रहे।
श्रीकृष्णजी को नैतिक सम्बल देते रहने वाली शक्ति भी आखिर चली गई। दु:खित स्वर में मैंने  आगे कहा।
हमारे लिए यह एक युग का अन्त है… वह भी शोकभरे स्वर में बोले।
निश्चित रूप से। मैंने उनकी भावना का समर्थन किया,वे कुशलतापूर्वक घर को न सँभाले रखतीं तो श्रीकृष्णजी अपना ध्यान उत्कृष्ट पुस्तक-उत्पादन में इस गहराई तक केन्द्रित न कर पाते।
इसके बाद कुछ पल हम चुप खड़े रहे, बोलने के लिए दोनों के ही पास जैसे कुछ विशेष न हो। फिर बड़ी मायूसी के साथ राजेन्द्र जी ने कहा,उन्हें दरअसल अपनों ने ही मारा।
उन्हें से उनका तात्पर्य श्रीकृष्ण दम्पति से था, अकेली श्रीमती कमला देवी से नहीं। मैं ‘उन्हें अपनों ने ही मारा में छिपा उनका इशारा भी समझ रहा था लेकिन क्या कहता। हर व्यक्ति का अपना-अपना पक्ष होता है। हमारे यानी अजय जी(मेधा बुक्स) और मेरे साथ अन्तिम मुलाकत में अपनों से संवादहीनता का हल्का-सा संकेत गहरी पीड़ा के साथ श्रीकृष्णजी ने भी किया था; लेकिन असलियत तो यह थी कि उन्हें अपनों ने भी मारा और ग़ैरों ने भी।
दोस्तो, गत 07 दिसम्बर 2011 को अपंजीकृत पराग प्रकाशन के सुप्रतिष्ठा-सम्पन्न संस्थापक तथा बालसाहित्यकार श्रीकृष्ण जी ने नश्वर देह को त्यागा था और गत 15 अगस्त, 2012 को उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमला देवी भी संसार से विदा हो गईं।
शोक-संवेदना व्यक्त करने की इच्छा वाले महानुभावों को मैं उनकी दो पुत्रियों के नाम, पते और फोन नम्बर नीचे लिख रहा हूँ

1॰ Mrs. Nisha Gupta (daughter, Ph. 88oo184598)
Mr. Neeraj Gupta (Son-in-law, Ph. 98103389687)
            G-109, Sector 56,
Near Mother Dairy,
Janta Flats, Noida (UP)

2॰ Mrs. Seema Jain (daughter, Ph. 011-22321612)
Mr. Rajendra Jain (Son-in-law, Ph. 9310962206)
N-10, Gali No. 1, Uldhanpur,
Naveen Shahdara, Delhi-110032

ॐ शान्ति!!!

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

पिज्ज़ा, बर्गर, पास्ता, फ्रेंचफ्राई…


सर्वोत्तम कथन
पिज्ज़ा, पास्ता, बर्गर, फ्रेंच फ्राईज़ के बारे में:

कुछ पल जीभ पर, उम्रभर तोंद और नितम्बों पर…
 
सभी चित्र गूगल इमेज से साभार





सोमवार, 6 अगस्त 2012

पहले से ही ज़ीरो हूँ और आखिर तक ज़ीरो रहूँगा/अन्ना हजारे

दोस्तो, http://news.indiaagainstcorruption.org/annahazaresays लिंक पर अन्ना हजारे के नाम से एक लम्बा लेख प्रकाशित हुआ है। यहाँ प्रस्तुत हैं उस लेख के कुछ अंश:
 इस इंतज़ार में, कि यह मोमबत्ती कब पूरी हो और इन उँगलियों को जलाने लगे आप भी हैं?  फोटो:बलराम अग्रवाल
 ………मैंने संसद में अच्छा उम्मीदवार भेजने का विकल्प देने की बात करते ही कई लोगों ने घोषणा की कि अन्ना ज़ीरो बन गए। मैं तो पहले से ही ज़ीरो हूं, मंदिर में रहता हूं, न धन न दौलत, न कोई पद, अभी भी ज़मीन पर बैठकर सादी सब्जी-रोटी खाता हूं। पहले से ही ज़ीरो हूँ और आखिर तक ज़ीरो रहूँगा। जो पहले से ज़ीरो है उसको ज़ीरो क्या बनाएगे? जिसको कहना है वो कहता रहे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। आजतक 25 साल में मेरी बदनामी करने के लिए कम से कम 5 किताबें लिखी गई। कई अखबार वालों ने बदनामी के लिए अग्रलेख (संपादकीय) लिखे है। लेकिन फक़ीर आदमी की फक़ीरी कम नहीं हुई। इस फक़ीरी का आंनद कितना होता है? यह बदनामी करने वाले लोगों को फक़ीर बनना पड़ेगा तक समझ में आएगा। एक बात अच्छी हुई की जितनी मेरी निंदा हुई। उतनी ही जनता और देश की सेवा करने की शक्ति बढ़ी। आज 75 साल की उम्र में भी उतना ही उत्साह है। जितना 35 साल पहले काम करते वक्त था। देश का भ्रष्टाचार कम करने के लिए जनलोकपाल कानून बनवाने के लिए कई बार आंदोलन हुए। 4 बार अनशन हुए। लेकिन सरकार मानने के लिए तैयार नहीं इसलिए टीम ने निर्णय लिया अनशन रोककर विकल्प देना पड़ेगा।
सरकार से जनलोकपाल की मांग का आंदोलन रुक गया लेकिन आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है। पहले सरकार से जनलोकपाल कानून की मांग करते रहे। सरकार नहीं करती इसलिए जनता से ही अच्छे लोग चुनकर संसद में भेजना और जनलोकपाल बनाने का आंदोलन शुरू करने का निर्णय हो गया। अगर जनता ने पीछे डेढ साल से साथ दिया, वह कायम रहा तो जनता के चुने हुए चरित्रशील लोग संसद में भेजेगे। और जनलोकपाल, राइट टू रिजेक्ट, ग्रामसभा को अधिकार, राइट टू रिकॉल जैसे कानून बनवाएंगे। और आने वाले 5 साल में भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण पक्ष और पार्टी से नहीं जन सहभाग से करेंगे। 2014 का चुनाव भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के लिए जनता के लिए आखिरी मौका है। इस चुनाव के बाद फिर से ऐसा मौका मिलना मुश्किल है। कारण, इस वक्त देश जाग गया है। अभी नहीं तो कभी नहीं। मैंने बार-बार बताया है कि मेरा जीवन समाज और देश सेवा में अर्पण किया है। इस वक्त जनता का साथ नहीं मिला तो नुकसान अन्ना का नहीं जनता का होगा। अन्ना तो एक फक़ीर है और मरते दम तक वो फक़ीर ही रहेगा। मैंने अच्छे लोग चुनकर संसद में भेजने का विकल्प दिया है। लेकिन मैं पक्ष-पार्टी में शामिल नहीं होऊंगा। चुनाव भी नहीं लडूंगा। जनता को जनलोकपाल का कानून देकर मैं महाराष्ट्र में अपने कार्य में फिर से लगूंगा। पार्टी निकालने वाले लोगों को भी मैंने बताया है। पार्टी बनाने के बाद भी यह आंदोलन ही रहे। पहले आंदोलन में सरकार से जनलोकपाल कानून मांग रहे थे। अब आंदोलन जारी रखते हुए जनता के सहयोग से अच्छे लोगों को चुनाव में खड़ा करके संसद में भेजो और कानून बनाओ। दिल और दिमाग में सत्ता न रहे, राज कारण न रहे, यह देश की देशवासियों की सेवा समझकर करो। अगर सत्ता और पैसा दिमाग में आ गया तो दुसरी पक्ष-पार्टी और अपनी पार्टी में कोई फर्क नहीं रहेगा। जिस दिन मुझे दिखाई देगा कि देश की समाज की सेवा दूर गई और सिर्फ सत्ता और पैसा का प्रयास हो रहा है। उसी दिन मैं रुक जाऊंगा। आगे नहीं बढूंगा। क्योंकि मैंने समाज और देश की भलाई के लिए विकल्प देने का सोचा है। मेरा जीवन उन्हीं की भलाई के लिए है।
आज टीम अन्ना का कार्य हम लोगों ने समाप्त किया है। जनलोकपाल के कार्य के लिए टीम अन्ना बनाई गई थी। सरकार से संबंध नहीं रखने का निर्णय लिया है। इस कारण आज से टीम अन्ना नाम से चला हुआ कार्य समाप्त हो गया है और अब टीम अन्ना समिति भी समाप्त हुई है।
भवदीय,
कि. बा. उपनाम अण्णा हज़ारे
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गुरुवार, 2 अगस्त 2012

तानाशाह की बेटी/खलील जिब्रान


खलील जिब्रान
सिंहासन पर सो रही बूढ़ी रानी के आसपास खड़े चार गुलाम पंखा झल रहे थे। वह खर्राटे ले रही थी और उसकी गोद में बैठी बिल्ली म्याऊँ-म्याऊँ करती उनींदी आँखों से गुलामों को घूर रही थी।
पहला गुलाम बोला—“सोते हुए यह बुढ़िया कितनी भद्दी दिखती है। इसका लटका हुआ मुँह देखो; और साँस तो ऐसे लेती हैं जैसे शैतान ने इसका गला दबा रखा हो।
बिल्ली ने म्याऊँ की आवाज़ निकाली—“खुली आँखों इसकी गुलामी करते हुए जितने बदसूरत तुम दिखते हो, सोते हुए यह उससे आधी भी बदसूरत नहीं दिखती है।
दूसरे गुलाम ने कहा—“नींद के दौरान इसकी झुर्रियाँ गहरी होने की बजाय सपाट हो जाती हैं। जरूर किसी साजिश का सपना देख रही होगी।
बिल्ली ने म्याऊँ की—“तुम्हें भी ऐसी नींद लेनी चाहिए और आज़ादी का सपना देखना चाहिए।
तीसरा गुलाम बोला—“इसके द्वारा मारे गये लोग जुलूस की शक्ल में इसके सपनों में आ रहे होंगे।
और बिल्ली ने म्याऊँ की—“ए, जुलूस की शक्ल में यह तुम्हारे पुरखों ही नहीं, आने वाली संतानों को भी देख रही है।
चौथे गुलाम ने कहा—“इसके बारे में बातें करना अच्छा लगता है; लेकिन इससे खड़े होकर पंखा झलने की मेरी थकान पर तो कोई फर्क पड़ता नहीं है।
बिल्ली ने म्याऊँ की—“तुम-जैसे लोगों को तो अनन्त-काल तक पंखा झलते रहना चाहिए; सिर्फ धरती पर ही नहीं, स्वर्ग में भी।
रानी की गरदन एकाएक नीचे को झटकी और उसका मुकुट जमीन पर जा पड़ा।
गुलामों में से एक कह उठा—“यह तो अपशकुन है।
बिल्ली बोली—“एक के लिए अपशकुन दूसरों के लिए शकुन होता है।
दूसरा गुलाम बोला—“जागने पर इसने अगर अपने सिर पर मुकुट नहीं पाया तो हमारी गरदनें उड़वा देगी।
बिल्ली ने कहा—“तुम्हें पता ही नहीं है कि जब से पैदा हुए हो, यह रोजाना तुम्हारी गरदन उड़वाती है।
तीसरे गुलाम ने कहा—“ठीक कहते हो। यह देवताओं को हमारी बलि देने के नाम पर हमारा कत्ल करा देगी।
बिल्ली बोली—“देवताओं के आगे केवल कमजोरों की बलि दी जाती है।
तभी चौथे गुलाम ने सबको चुप हो जाने का इशारा किया। उसने मुकुट को उठाया और इस सफाई के साथ कि रानी की नींद न टूटे, उसे उसके सिर पर टिका दिया।
बिल्ली ने म्याऊँ की—“एक गुलाम ही गिरे हुए मुकुट को पुन: राजा के सिर पर टिका सकता है।
कुछ पल बाद बूढ़ी रानी जाग उठी। इधर-उधर देखते हुए उसने जम्हाई ली और बोली—“लगता है मैंने सपना देखामैंने देखा कि एक बिच्छू चार कीड़ों को बलूत के एक बहुत पुराने पेड़ के तने के चारों ओर दौड़ा रहा है। यह सपना मुझे अच्छा नहीं लगा।
यों कहकर उसने आँखें मूँदीं और दोबारा सो गई। खर्राटे फिर से शुरू हो गये और चारों गुलामों पुन: पंखा झलने लगे।
और बिल्ली घुरघुराई—“झलते रहो, झलते रहो मूर्खो। नहीं जानते कि तुम उस आग की ओर पंखा झल रहे हो जो तुम्हें जलाकर खाक करती है।
(मेधा बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'खलील जिब्रान' से)

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

पाठकों और साथी रचनाकारों से क्या वाकई इतने दूर थे ललित कार्तिकेय?/बलराम अग्रवाल




ललित कार्तिकेय
दोस्तो,
जिन दिनों सुपर स्टार राजेश खन्ना की विदाई पर चैनल्स और अखबार एक से एक उल्लेखनीय समाचार यहाँ-वहाँ से खोदकर दिखा और छाप रहे थे, एकदम उन्हीं दिनों हिन्दी का एक सशक्त रचनाकार और अनुवादक भी हमसे छिन गया। पता चला?
आओ, अपने समय के रचनाकारों की अपने ही प्रति उदासीनता पर कथाकार अमर गोस्वामी के बाद एक बार पुन: विचार करें।
मेधा बुक्स द्वारा 2001 में प्रकाशित ललित कार्तिकेय की एक अवश्य पठनीय किताब
ललित कार्तिकेय के निधन का समाचार भी पहले मेधा बुक्स के अजय जी से मिला जिसे उन्होंने कथाकार-पत्रकार वीरेन्द्र जैन से पुष्ट कराया तथा मेरे पूछने पर कथादेश के संपादक हरिनारायण जी ने भी इसे पुष्ट किया। उसके बाद मैंने इस दु:खद खबर को अपने ब्लॉग अपना दौर में पोस्ट करने के लिए ललित जी की फोटो को इंटरनेट पर तलाशने की कोशिश की और परिणाम वैसा ही निकला जैसा कि अमर गोस्वामी की फोटो वहाँ तलाशने का निकला था। अमर सिंह की तर्ज़ पर ललित मोदी के फोटो तो अनेक मिले, ललित कार्तिकेय का एक भी नहीं। तब, शाम तक अजय जी ने ही अपने खजाने से उनकी एक फोटो तलाश करके मेल द्वारा मुझे भेजी और खबर को ब्लॉग पर लिखकर मैंने फेसबुक से लिंक कर दिया। इसे लिंक करने के अगले ही मिनट अनिल जनविजय ने करीब-करीब यों कमेंट किया—‘चलो, ललित को यह खबर नहीं थी, अब मिल गई। मैंने इसे पढ़कर यही अनुमान लगाया कि अनिल ने इसे पढ़कर ललित जी से बात की होगी और अनेक साथियों से पुष्ट होने के बावजूद एक अप्रिय समाचार मेरे द्वारा फ्लैश हो गया है! मैं घबरा गया और तुरन्त पोस्ट को फेसबुक से हटाकर अनिल जनविजय को अपना स्पष्टीकरण मैसेज किया तथा अजय जी को सारे वाक़ये से अवगत कराया।
आज, भाई रूपसिंह चन्देल के फेसबुक वॉल पर ललित कार्तिकेय के न रहने का समाचार पुन: पढ़कर मैं चौंका (भले ही उन्होंने उसे मेरे ब्लॉग के हवाले से लिखा था)। मैंने चन्देल जी को फोन किया। मालूम हुआ कि यह कुसमाचार ज्ञानप्रकाश विवेक आदि अनेक साहित्यिक मित्रों से पुष्ट करके ही उन्होंने फेसबुक पर डाला है।
मित्रो, तात्कालिक लाभ और हानि का आकलन करके सम्बन्धों को बनाए रखने न बनाए रखने का निर्णय करने वाले साहित्यिक कहे जाने के बावजूद विशुद्ध असाहित्यिक और शुद्ध व्यावसायिक समय में ऐसे हादसे कदम-कदम पर हो सकते हैं। ऐसे में भावुक हृदयों द्वारा सावधानी बरतना जरूरी है।

गुरुवार, 28 जून 2012

चुपचाप चले गए अमर गोस्वामी/बलराम अग्रवाल

दोस्तो,
कथाकार अमर गोस्वामी
साहित्य की दुनिया में अमर गोस्वामी न तो अनजाना नाम है और न ही नजरअन्दाज़ कर देने वाला। फिर भी, हैरान हूँ कि अभी तक किसी सूचना-तंत्र पर उनके चले जाने का समाचार दिखाई-सुनाई नहीं पड़ा। दिनांक 26 जून 2012 को दोपहर 11-30 के लगभग अजय जी (मेधा बुक्स) का फोन आया था। उन्हें उमेश जी ने और उमेश जी को डॉ॰ शेरजंग गर्ग के माध्यम से अमर गोस्वामी का निधन हो जाने और दोपहर 12 बजे के लगभग गाजियाबाद में हिंडन-नदी के तटवर्ती श्मशान में अंतिम संस्कार किए जाने का समाचार मिला था। उस दिन संयोग से 12 बजे से 2 बजे तक के लिए मैं अत्यन्त व्यस्त था इसलिए पहुँच नहीं सकता था; लेकिन उमेश जी व अजय जी ने वह दायित्व निभाया।
उसी दिन शाम को घर लौटने पर मैंने रूपसिंह चंदेल, भारतेन्दु मिश्र, सुभाष नीरव आदि को फोन पर सूचित किया तो वे भी चौंके। गरज यह कि शाम तक भी किसी तक उनके निधन की सूचना नहीं पहुँची था। कल रात अजय जी से पुन: बात हुई। अमर गोस्वामी के बारे में उन्हें जब सूचना-तन्त्र की इस विफलता के बारे में बताया तो उन्होंने सुझाव दिया कि मैं यह समाचार फेस बुक पर दे दूँ। इस हेतु तलाश हुई उनके संक्षिप्त परिचय और फोटो की। तो संक्षिप्त परिचय तो रे माधव की वेव साइट पर उपलब्ध हो गया लेकिन इन्टरनेट पर अमर गोस्वामी का चित्र तलाश करने की जद्दोजहद में अमर सिंह, अमर कुमार, फलाँ-फलाँ गोस्वामी आदि पता नहीं किस-किस के अनेक मुद्राओं में फोटो मिलते रहे, अमर गोस्वामी का एक भी नहीं मिला।  हिन्दी बुक सेन्टर आदि पुस्तक-विक्रेताओं की वेब साइट्स पर भी अमर गोस्वामी की पुस्तकों के विक्रय हेतु टाइटिल तो खूब नजर आए, उनके निधन सम्बन्धी कोई सूचना या उनका फोटो एक भी नजर नहीं आया। जाहिर है कि अमर गोस्वामी फोटो खिंचवाने की लालसा से दूर के व्यक्ति थे।
वे काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। मालूम चला कि गत दिनों वे नोएडा से गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में शिफ्ट कर गए थे।  मैं रेमाधव की वेब साइट से उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। फोटो काफी जद्दोजहद के बाद उमेश जी (आलेख प्रकाशन) के खजाने से मिली है।
निधन वाला अंतिम कॉलम दुर्भाग्यवश मुझे जोड़ना पड़ा है।
आइए, उस श्रमशील व्यक्ति की आत्मा को शान्ति और परिजनों को धैर्य प्रदान करने की प्रार्थना परमपिता से करें।
अमर गोस्वामी
जन्म : 28 नवम्बर 1945 को मुलतान के एक बांग्लाभाषी परिवार में। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर करने के बाद बुढ़ार (शहडोल, म.प्र.) और भरवारी के (इलाहाबाद उ.प्र.) दो महाविद्यालयों में अध्यापन, फिर लम्बे समय से पत्रकारिता में।
सम्प्रति : गाजियाबाद (उ.प्र.) स्थित रेमाधव पब्लिकेशन्स' के मुख्य संपादक के पद पर कार्यरत।
कार्य-अनुभव : कथा-पत्रिकाकथान्तर', बाल पत्रिका सपा और कांग्रेस पार्टी द्वारा संचालित भारती फीचर्स' का संपादन। विकल्प' (सं. शैलेश मटियानी), आगामीकल (सं. नरेश मेहता), ‘मनोरमा' (सं. अमरकान्त), ‘गंगा' (सं. कमलेश्वर) सण्डे आबजर्वर' (सं. उदयन शर्मा), ‘अक्षर भारत' और नया ज्ञानोदय' (सं. प्रभाकर श्रोत्रिय) आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर संपादन सहयोग।
प्रकाशित कृतियां : हिमायती', ‘महुए का पेड़', ‘अरण्य में हम', ‘उदास राधोदास', ‘बूजो बहादुर', ‘धरतीपुत्र', ‘महाबली', ‘इक्कीस कहानियां', ‘अपनी-अपनी दुनिया', ‘कल का भरोसा' तथा भूलभुलैया' (सभी कहानी-संग्रह)इस दौर में हमसफर' उपन्यास किताबघर, नयी दिल्ली से प्रकाशित। बच्चों की कहानियों की 16 पुस्तकें तथा एक बाल उपन्यास शाबाश मुन्नूप्रकाशित। बांग्ला से हिन्दी में साठ से ज्यादा अनूदित पुस्तकें प्रकाशित। 
पुरस्कार-संपादन : केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा हिमायती' कहानी-संग्रह पर अहिन्दी भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कार, 1988, दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन, सनेही मण्डल नोएडा द्वारा नोएडा रत्नसे सम्मानित, 1996 इण्डो रशियन लिटरेरी क्लब, नयी दिल्ली द्वारा बाल लेखन के लिए सम्मानित, 1999 हिन्दी एकेडेमी, दिल्ली द्वारा बाल उपन्यास शाबाश मुन्नू' पुरस्कृत, 2005, उ.प्र. हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा इस दौर में हम सफर' उपन्यास पर प्रेमचन्द पुरस्कार, 2005
निधन : 26 जून, 2012, गाजियाबाद में हिंडन नदी के तटवर्ती श्मशान में उसी दिन पंचतत्त्व में विलीन।