शुक्रवार, 24 फरवरी 2012

पुस्तक, व्यवसाय और श्रीकृष्ण / बलराम अग्रवाल

'रसीदी टिकट' के उत्कृष्ट उत्पादन हेतु राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त श्रीकृष्ण जी जनवरी 2011 में
दिल्ली में कुछ ही घंटों बाद 20वाँ विश्व पुस्तक मेला शुरू होने वाला है।
गत कई दशकों से दिल्ली यों भी पुस्तक व्यवसायियों के लिए ही नहीं, साहित्य व्यवसायियों के लिए भी लाभदायक मंडी है। कितने ही ऐसे लोग, जिनका साहित्य अथवा पत्रकारिता की दुनिया से क्या, पठन-पाठन से भी कोई गम्भीर रिश्ता नहीं है, दिल्ली की कृपा से साहित्य के अनेक विदेशी गलियारों में जाने-घूमने का पारपत्र पाते रहे हैं। अहो रूपम् अहो ध्वनि की तर्ज पर मित्रों के जरिए उनमें से कुछेक फोटो समेत फेसबुक पर प्रचारित भी होते रहते हैं। हम जैसे आलसी और लापरवाह लोग, ऐसे लोग जो घर में पड़े-पड़े यह सोचते रहते हैं कि बुद्धिमत्ता और श्रम का सम्मान ईश्वरीय चमत्कार की तरह एक न एक दिन होगा ही, साहित्य के जौहरियों(!) के इन्तज़ार में पुस्तकों और पत्रिकाओं के पन्ने पलटते हुए पलक पाँवड़े बिछाए खाट-कुर्सी-मूढ़े में धँसे-पड़े रहते हैं। हम वे हैं जो जुगाड़ लगाने में अपनी हेटी समझते हैं और जुगाड़ के खुद-ब-खुद लग जाने का सपना देखते रहते हैं। फेसबुक पर दूसरों का सुसमाचार पढ़कर हम उनके जुगाड़ू होने सम्बन्धी मोटी-मोटी गालियाँ मन में जपते हुए औपचारिकतावश या तो लाइक को क्लिक करके आगे बढ़ चुके होते हैं या बधाई अथवा शुभकामना जैसा कामचलाऊ कमेंट टाइप करके सम्बन्ध और जान-पहचान को बनाए-बढ़ाए रखने का चतुर रवैया अपनाते हैं। 

फेसबुक और ई-मेल, दोनों पर, आजकल ऐसे संदेशों की बहार आई हुई है जिनमें लेखक और प्रकाशक दोनों ही कॉलर खड़े करके उपस्थित नजर आते हैं। लेखक इस संदेश के साथ कि उसकी अमुक किताब पुस्तक मेले में आ रही है और प्रकाशक इस संदेश के साथ कि वह इन-इन लेखकों की कुल इतनी पुस्तकों के साथ विश्व पुस्तक मेले में अवतरित हो रहा है। दोनों की ओर से ऐसे संदेश भी आ रहे हो सकते हैं कि अमुक-अमुक किताबों का लोकार्पण हॉल नं॰ अमुक के अमुक नं॰ स्टाल पर अमुकश्री के कर-कमलों से हो रहा है, आप सादर आमन्त्रित हैं। ऐसा लगता है कि 25 फरवरी से 4 मार्च तक जितनी किताबें लोकार्पित हो जाएँगी, वही पढ़ी जाने लायक समझी जाएँगी। इन तारीखों के आगे-पीछे बाज़ार में आने वाली, लोकार्पण के बहाने चार सजातीय भाइयों का मुँह कड़वा-मीठा कराने की हैसियत न रखने वाले टटपूँजिया लेखकों की किताबें लोकार्पित यानी लोक में पढ़ने योग्य नहीं मानी जाएँगी। यह ऐसा अवसर है जब बड़े-बड़े विचारकों द्वारा लेखक-प्रकाशक-पाठक सम्बन्ध पर एकदम नए सिरे से सोचा जाता है और बातचीत का दूसरा-तीसरा-चौथा सिरा आगामी मेले में विचार के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है।
बातचीत के इस सिरे को यहीं छोड़कर अब हम उस सिरे पर आते हैं जहाँ बात लेखक-प्रकाशक-पाठक सम्बन्ध पर नहीं, प्रकाशक-प्रकाशक सम्बन्ध पर होगी। जितने कद्दावर और
शरीर का बायाँ हिस्सा 2010 में पक्षाघात का शिकार हो चुका है
नामवर लोग लेखकों-आलोचकों की दुनिया में हैं, प्रकाशकों की दुनिया में उससे कई गुना कद्दावर और नामवर मौजूद हैं। दो प्रकाशक मित्र मुस्कराते हुए जब गले मिल रहे हों या हाथ मिला-हिला रहे हों, तब उनके अन्दर उतरकर देखिए। वे आँखें तरेरते हुए एक-दूसरे पर सींग तानते नजर आएँगे।

जनवरी 2012 के हंस में राजेन्द्र यादव ने सम्पादकीय को प्रकाशकों की कलाकारी पर केन्द्रित किया है और उसे संयोजित-नियंत्रित करने को कुछ सुझाव भी दिए हैं। वे चाहें तो उन सुझावों को कार्यान्वित करने-कराने की पहल भी कर सकते हैं, लेकिन यह उनकी प्राथमिकता का अंग नहीं है। उन्होंने रॉयल्टी-फ्री लेखकों की पुस्तकें छापने वाले प्रकाशकों से उनकी 10% धनराशि रॉयल्टी के तौर पर उस कोष-विशेष में जमा कराने का सुझाव दिया है जिससे गरीब लेखकों को आर्थिक मदद दी जा सके। गरीबी का पैमाना क्या होगा और लेखक होने का पैमाना क्या होगाये बातें विस्तार से विचार करने योग्य हैं। वे कौन-से लेखक होंगे जिन्हें गरीबी रेखा के नीचे यानी बीपीएल कार्ड इश्यू किया जा सकेगा और किनके द्वारा? अलग-अलग लेखक संगठनों का पैमाना स्पष्टत: इस बारे में अलग-अलग ही होगा, राजनीतिक संगठनों की तरह।
दास्ताने-ग़म ही नहीं, दास्ताने-खुशी भी हैं उनके पास;    सुनने वाला चाहिए
कई दशक पहले निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोज कुमार ने कहा था कि फिल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा लग रहा है। यह ईमानदार फिल्म निर्माता-निर्देशकों के सिरों पर शनै: शनै: छाते जाते अंडरवर्ल्ड आतंक की ओर इशारा भर था, जिसे शायद ही गम्भीरतापूर्वक सुना-समझा गया हो। विभिन्न प्रकाशक मित्रों के बीच बैठकर इधर-उधर से बहुत-सी बातें सुनाई देती हैं तो आज बल्क पुस्तक खरीद का माहौल लगभग वैसा ही महसूस होता है। किसी दूसरे को क्या, आज स्वयं को भी ईमानदार कहना अपने साथ बेईमानी करने जैसा है लेकिन यह सच है कि भ्रष्टाचार के दलदल में फँसे होने के बावजूद, अधिकतर लोग ईमानदारी से व्यवसाय करने के पक्षधर हैं, बशर्ते वैसा माहौल उपलब्ध कराया जाए। बेईमान माहौल में केवल बेईमान और पूँजीवादी ही पनपते हैं, ईमानदार और मेहनतकश नहीं। यही कारण है कि इन दिनों मेहनतकश और ईमानदार पुस्तक व्यवसायी स्वयं को बेहद विवश महसूस कर या भ्रष्टाचार के दलदल में कूद पड़े हैं या बाज़ार से मालो-असबाब समेटने और बाहर खिसकने के रास्ते पर पड़ चुके हैं। राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर के अनेक पत्रकार, सम्पादक-लेखक-आलोचक और नौकरशाह बल्क पुस्तक खरीद केन्द्रों और प्रकाशकों के बीच कमीशन-एजेंट का लाभकारी धन्धा अपनाए हुए हैं। ऐसे माहौल में लेकिन कितने लेखकों, पत्रकारों, प्रकाशकों और पुस्तक व्यवसायियों को आज पता है कि अमृता प्रीतम की ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कृति रसीदी टिकटकी रूपसज्जा आदि के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, पराग प्रकाशन को समग्र स्तरीयता प्रदान करने वाले तथा बाल नाटककार के रूप में विभिन्न राज्यों की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक बार पुरस्कृत श्रीकृष्ण आज कहाँ हैं और किस हालत में हैं? गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के स्कूल पाठ्य-पुस्तकों में उनके बाल नाटक संकलित होते रहे हैं।
व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो पराग प्रकाशन का डूबना वैसा ही है जैसा व्यावसायिक कूटदृष्टि से हीन किसी भी संस्थान का डूबना होता है। एक व्यवसायी कभी भी दूसरे व्यवसायी की व्यावसायिक मौत पर नहीं रोता। लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा संचालित पराग प्रकाशन का डूबना मेरी दृष्टि में हिन्दी प्रकाशन
अतीत की यादें ही अब इनकी धरोहर हैं
व्यवसाय के एक टाइटेनिक का डूबना है। उसके डूबने पर उसके हर लेखक, संपादक को रोना चाहिए था, परन्तु किसी ने उफ् तक नहीं की। मेधा प्रकाशन ने श्रीकृष्ण जी के कुछ बाल नाटकों का एक संग्रह अभिनेय बाल नाटक शीर्षक से प्रकाशित किया था। तब मुझे साथ लेकर अजय भाई उनके नोएडा स्थित निवास पर गए थे। 2010 में श्रीकृष्ण जी से हम दो बार मिलकर आए थे, उसके बाद जनवरी 2011 में जा पाए; लेकिन अफसोस की बात है कि उसके बाद हम पुन: उनसे मिलने जाने का समय नहीं निकाल पाए जबकि हमें जाते रहना चाहिए था। 11 जनवरी 2011 को हमारे जाने से कुछ ही माह पहले उन्हें पक्षाघात हुआ था और उनके शरीर के बाएँ हाथ-पैर ने काम करना बन्द कर दिया था। सुनने की ताकत तो उनकी काफी समय पहले क्षीण हो गयी थी, अब स्मृति भी क्षीणता की ओर है। शारीरिक रूप से अक्षमता की ऐसी हालत में वे पति-पत्नी समीप ही रह रही अपनी एक बेटी रजनी पर आश्रित हैं। परिवार सहित वही उनकी देखभाल करती है।
श्रीकृष्ण जी पर कथाकार-पत्रकार बलराम और उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल ने अपने-अपने संस्मरण लिखे हैं। इनके अलावा भी कुछ लोगों ने लिखे हो सकते हैं, लेकिन वे मेरी दृष्टि से नहीं गुजरे, क्षमा चाहता हूँ। 15 अक्टूबर, 1934 को जन्मे श्रीकृष्ण जी छ: पुत्रियों के पिता हैं। सभी पुत्रियाँ विवाहित हैं, सुखी हैं। मिलने आने वालों की बात चली तो पति-पत्नी दोनों को मात्र एक नाम याद आयायोगेन्द्र कुमार लल्ला जी। रजनी ने भी कहा कि लल्ला जी अंकल कभी-कभार आते हैं। उनके अलावा तो श्रीकृष्ण जी ने कहा कि—‘जिस-जिस की भी अपने भले दिनों में खूब मदद की थी, उनमें से कोई नहीं मिलने आता है। किसी और की क्या कहूँ, खुद मेरा सगा भाई भी अभी तक मुझे देखने नहीं आया है। ठीक ही कहा है कि जो पेड़ कितने ही परिन्दों को आश्रय और पथिकों को छाया व फल देता है, बुरे वक्त में वे सब उसका साथ छोड़ जाते हैं। आप लोग मिलने आ गये, यह बहुत बड़ी बात है…कौन आता है!…नरेन्द्र कोहली कहते थे कि मेरा नाम पराग प्रकाशन की देन है, लेकिन अब वे भी…।
श्रीकृष्ण जी की धर्मपत्नी                                                      सभी चित्र : बलराम अग्रवाल
प्रकारान्तर से रामकुमार भ्रमर का नाम भी उनकी जुबान पर आया। बहुत तरह से वे पति-पत्नी बहुत लोगों को याद करते हैं। हिमांशु जोशी आदि अनेक प्रतिष्ठित लेखकों के वे प्रथम प्रकाशक रहे हैं। अतीत की बातें सुनाते हुए कभी वे खुश होते हैं, कभी उदास। यहाँ बहुत अधिक न कहकर तभी लिए गए उनके कुछ फोटो दे रहा हूँ। इन्हीं से उनकी स्थिति का किंचित अन्दाज़ा आप लगा सकते हैं।

रविवार, 19 फरवरी 2012

भौंचक है सिर /बलराम अग्रवाल


                                                                                                       चित्र : बलराम अग्रवाल
भौंचक है
सिर
कि रोने के लिए
टिकना चाहता है
जिस पर भी
उसी कंधे से
आने लगती हैं
आवाजें
सिसकने की।









शनिवार, 10 सितम्बर 2011

तानाशाह, तलवार और कुत्ते/बलराम अग्रवाल

                                                                                                      चित्र:आदित्य अग्रवाल
तानाशाह
सिर्फ तलवार नहीं रखता
पालता है
कुत्ते भी

विरोधियों का दमन
और
उनका शिकार
कभी भी
तलवार से नहीं करता वह
कुत्तों से करता है
तलवार तो होती है
डराने-धमकाने भर के लिए।
***

शनिवार, 27 अगस्त 2011

कहाँ गये वो लोग?/बलराम अग्रवाल

दोस्तो,
सबसे पहले तो भाई अनिल जनविजय का आभार कि उन्होंने मुझे फैज़ अहमद फैज़ की आंदोलनकारी नज्म हम देखेंगे सुनने का अवसर प्रदान किया। यह 24 की रात की बात है। तब से अब तक मैं बीसों बार उसे सुन चुका हूँ, लेकिन मन है कि भरता ही नहीं है। मैंने उस नज्म की तीन प्रतिलिपियाँ तैयार कीं और अगली सुबह रामलीला मैदान जा पहुँचा। उनमें से दो को मैंने रामलीला मैदान में प्रारम्भ से ही अन्ना हजारे जी के मंच का संचालन सँभाल रहे कुमार विश्वास व नितिन को भेज दिया। उस समय मुझे मालूम नहीं था कि हम इतनी जल्दी वह दिन देख लेंगे जिसका हमसे वादा था। आप सब देशवासियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे आम आदमी की इस जीत पर शतश: बधाइयाँ।

वृद्धाएँ ही नहीं नवजातों को लेकर युवा माँएँ भी आंदोलन में कूद पड़ीं चित्र:बलराम अग्रवाल

इस जज्बे की अनदेखी करना किसी के लिए सम्भव नहीं                चित्र:बलराम अग्रवाल
दोस्तो, आज यह पूछने का दिन आ गया है कि कहाँ गये वो लोग जो कहते थे कि 10-15 हजार लोगों के इकट्ठा होकर गला फाड़ने से क्या होता है? तथा यह कि सौ करोड़ से ऊपर जनसंख्या वाले इस देश में अन्ना के समर्थक कितने होंगे? ज्यादा से ज्यादा एक करोड़! बाकी 99 करोड़ का समर्थन तो उन्हें नहीं प्राप्त है।

उपर्युक्त दो बातों के अलावा और भी बहुत-सी बातें राजनीतिकों और बुद्धिजीवियों की ओर से सुनने-पढ़ने को मिलीं जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि देश का न केवल राजनीतिक बल्कि बौद्धिक क्षेत्र भी धृतराष्ट्रों के हाथ में खेल रहा है।

आज शाम नोएडा से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका पाखी द्वारा आयोजित जे॰ सी॰ जोशी चतुर्थ शब्द साधक सम्मान समारोह था। कल पत्रिका के कार्यकारी संपादक भाई प्रेम भारद्वाज ने फोन करके आमन्त्रित किया था। मैं समय से करीब आधा घंटा पहले हिन्दी भवन पहुँच गया था। चहल-पहल महसूस न होने के कारण मैंने अन्दर जाने की बजाय बाहर ही बैठना उचित समझा और बस स्टॉप की बैंच पर बैठ गया। पाँच मिनट के अन्तराल पर ही भाई प्रेम भारद्वाज अपने परिवार के साथ आ पहुँचे। मुझे बाहर बैठा देखकर चौंक गये। पूछा,यहाँ क्यों बैठे हैं?

अभी-अभी पहुँचा हूँ,मैंने कहा,सोचा, कुछ देर खुली हवा में बैठ लूँ।

आइए, अन्दर चलते हैं। उन्होंने कहा। दरअसल, उन्हें अन्दर की तैयारियों का जायजा भी लेना था। इसलिए मेरी तरह वह बाहर नहीं बैठ सकते थे। मैं उनके साथ हो लिया। समय-पूर्व पहुँचने के कारण उपस्थिति का न होना स्वाभाविक था। फिर भी, हॉल को खाली देखकर भारद्वाज जी ने आशंका जताई—‘अन्ना जी के आंदोलन के चलते उपस्थिति कम रह सकती है।

मुझे अच्छी तरह मालूम था कि दिल्ली के साहित्यकार कहे जाने वाले जीव गुट विशेष द्वारा प्रायोजित आंदोलन में तो उछल-कूद मचा सकते हैं; वे वर्ग और समुदाय तो बन सकते हैं; देश नहीं बन सकते। ऐसा मैं अपने मन से नहीं कह रहा हूँ, इस दौरान विभिन्न बौद्धिकों के चरित्रों के फेसबुक आदि पर आते रहे बयानों के मद्देनजर कह रहा हूँ। खैर, मैंने भारद्वाज जी की आशंका पर कोई टिप्पणी नहीं की। उनके पास से खिसक लिया, बिना कुछ कहे। चला, तो अपूर्व जोशी से भेंट हो गयी। वह हमेशा ही गले और हृदय से मिलते हैं, हाथ के पोरुओं से नहीं। अपनत्व से भिगो देते हैं। शिकायत की कि मैं इतने लम्बे अंतराल के बाद क्यों मिल रहा हूँ? फिर स्वयं ही बोले,नहीं, आप तो एक-दो बार आये थे कार्यालय, मैं ही नहीं मिल पाया, प्रेम जी ने बताया था। उपस्थिति कम रहने की आशंका उन्होंने भी जताई। कहा,कुमार विश्वास को मंच संचालन करना था, लेकिन वह रामलीला मैदान का मंच सँभालने में व्यस्त हैं। सीताराम येचुरी जी को आना था, लेकिन दोनों संदनों में महत्वपूर्ण बहस चल रही है। उन्होंने बताया है कि अभी 22 वक्ता और बाकी हैं, मैं नहीं आ सकता। तात्पर्य यह कि टीम पाखी टीम अन्ना के आंदोलन से खासी चिंतित नजर आ रही थी। लेकिन यह चिंता अपने कार्यक्रम में आने वाले श्रोताओं और वक्ताओं की कम उपस्थिति के मद्देनजर ही थी। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ, यह बेहद भला लगा।

तय समय पर चाय-पान शुरू हुआ। मैं अपने हिस्से का डिब्बा लेकर विन्डो के किनारे जा खड़ा हुआ। कुछ देर बाद, साहित्यकारों की आमद शुरू हुई। विन्डो में खड़े मुझको सबसे पहले प्रो॰ नामवर सिंह आते दिखाई दिये। उनके बाद तो अशोक मिश्र, प्रदीप पंत, प्रो॰ निर्मला जैन, प्रेमपाल शर्मा, कुसुम कुमार, सुशील सिद्धार्थ, मन्नू भंडारी, गीताश्री, अशोक गुप्ता, रमणिका गुप्ता, राजेन्द्र यादव, प्रो॰ मैनेजर पाण्डे आदि-आदि  दिखाई देते गये। ये केवल कुछ नाम हैं। सभी को न मैं जानता हूँ, न पहचानता हूँ। लब्बोलुआब यह कि कार्यक्रम शुरु होते-होते हॉल लगभग आधा तो भर ही चुका था। मैंने तुरन्त उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल को व्यंजनापरक एक एस॰एम॰एस॰ भेजा—‘इस समय पाखी के कार्यक्रम में आये होते तो आपका यह सन्देह मिट जाता कि हिन्दी के साहित्यकार घर से बाहर नहीं निकलते हैं। उनका जवाब आया—‘मैं इस समय सी॰पी॰ में हूँ। वहाँ तो लेखक होंगे ही। उन्हें अपनी प्राथमिकताएँ मालूम हैं। भाड़ में जायें अन्ना उनके लिए।

देशभर की जनता के हस्ताक्षरों से युक्त अन्ना-समर्थक एक बैनर                                        चित्र:बलराम अग्रवाल
मज़े की बात यह रही कि अपने-अपने तरीके से अपूर्व जोशी, प्रो॰ निर्मला जैन और प्रो॰ नामवर सिंह ने अन्ना के आंदोलन का जिक्र अपने वक्तव्यों में किया लेकिन तीनों के सरोकार अलग-अलग थे। मुझे याद है कि 7 अगस्त को जन्तर-मन्तर पर सरकारी लोकपाल बिल को जलाए जाने वाले कार्यक्रम में जब जन्तर-मन्तर पर ही प्रदर्शन कर रहे रुचि भट्टल के परिजनों ने टीम अन्ना से यह अनुरोध किया था कि वे उनका साथ दें तो अरविन्द केजरीवाल ने मंच से घोषणा की थी कि आप अपने-आप को हमसे अलग न समझें। हम सब आपके साथ हैं और आपके साथ कैंडिल-मार्च करते हुए इंडिया गेट तक जायेंगे। और वे गये भी। हिन्दी भवन में उपस्थित साहित्यकारों ने उस वक्त जब संसद के दोनों सदनों में एक ऐतिहासिक निर्णायक बहस चल रही थी और पूरे देश को मथ डालने वाला एक 74 वर्षीय योद्धा गत 12 दिनों से रामलीला मैदान में भूखा बैठा था, यह आह्वान करने की आवश्यकता नहीं समझी कि साहित्यकारों की यह बिरादरी हर प्रकार के भ्रष्टाचार का विरोध करती है और यहाँ से निबटकर रामलीला मैदान जायेगी। दरअसल, जैसा कि चन्देल जी ने अपने जवाब में लिखा थायह उनकी प्राथमिकता में नहीं था।

संतोष की बात है दोस्तो, कि संसद के दोनों सदनों ने अन्ना जी की माँगों पर गम्भीरतापूर्वक बहस की और उन्हें लगभग मान लिया। माननीय प्रधानमंत्री ने इस आशय का पत्र लिखकर विलासराव देशमुख और संदीप दीक्षित के हाथों रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे अन्ना जी के पास भेजकर अनुरोध किया कि वे कृपया अब अपना अनशन तोड़ दें। विलासराव देशमुख ने स्वयं उस पत्र को पढ़कर सुनाया। उसके जवाब में अन्ना जी ने अनशन तोड़ने की अपनी सहमति दे दी। उन्होंने कहा कि यह वास्तव में भारत की गरीब जनता की जीत है। फिलहाल इतना ही, बाकी कल।




शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

Hum dekhenge by Iqbal bano

बृहस्पतिवार, 25 अगस्त 2011

हम देखेंगे/फैज़ अहमद फैज़


Tanu Chopra  has written on her facebook wall :
 इण्डिया गेट 17अगस्त, 2011                                                                                        चित्र: बलराम अग्रवाल
In 1982, In Singapore, LOKPAL BILL was implemented and 142 Corrupt Ministers & Officers were arrested in one single day.. Today Singapore has only 1% poor people & no taxes are paid by the people to the government, 92% Literacy Rate, Better Medical Facilities, Cheaper Prices, 90% Money is white & Only 1% Unemployment exists...!!!

दोस्तो, इसके साथ ही मैं मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ की एक उद्वेलनकारी यथार्थवादी नज्म आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ:-

॥हम देखेंगे॥

हम देखेंगे, लाज़िम1 है कि हम भी देखेंगे।
वो दिन कि जिसका वादा है, हम देखेंगे॥
जो नौहे-अज़ल2 में लिक्खा है हम देखेंगे।
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, हम देखेंगे॥

जब ज़ुल्मो-सितम के कोहे-गिरां3 रूई की तरह उड़ जायेंगे।
हम महकूमों4 के पाँव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी॥
और अहले-हकम5 के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी॥ हम देखेंगे…

जब अर्ज़े-खुदा के क़ाबे से सब बुत उठवाये जायेंगे।
हम अहले-सफा6 मरदूदे-हरम7 मसनद पे बिठाये जायेंगे॥
सब ताज उछाले जायेंगे सब तख्त गिराये जायेंगे॥ हम देखेंगे…

बस नाम रहेगा अल्ला का जो गायब भी है हाजिर भी।
बस नाम रहेगा अल्ला का जो मंजर भी है नाज़िर भी॥
उट्ठेगा अनल-हक़8 का नारा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।
और राज करेगी खल्के-खुदा9 जो मैं भी हूँ और तुम भी हो॥
हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे।
वो दिन कि जिसका वादा है, हम देखेंगे॥
--फैज़ अहमद फैज़--
1॰ नि:शंक आवश्यक 2॰ आदि-पुस्तक 3॰ भारी-भरकम पहाड़ 4॰ जनता, गुलाम 5॰ सत्ताधारी 6॰ साफ दिल वाले  7॰ दरबार से निष्कासित 8॰ अहं ब्रह्मास्मि 9 ईश्वरीय शक्ति
 

हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे।
वो दिन कि जिसका वादा है, हम देखेंगे॥

नैतिक पतन की पराकाष्ठा/बलराम अग्रवाल

                                                                                                       चित्र : बलराम अग्रवाल
'जन लोकपाल बिल' को संसद में पेश करने और पास कराने की माँग को लेकर 16 अगस्त, 2011 से अनशन पर बैठे अन्ना हजारे की जान और सेहत दोनों की शासक पक्ष और विरोधी पक्ष दोनों के सांसदों को कितनी चिंता है, यह 24 अगस्त, 2011 को प्रधानमंत्री आवास पर संपन्न सर्वदलीय बैठक में साफ हो गया। अनशन पर पहले संसद में गोलबंदी, फिर सर्वदलीय बैठक में मिले सुर मेरा तुम्हारा किस्म की बेशर्म एकजुटता का ही कमाल है कि एक दिन पहले जो कांग्रेसी सरकार के वार्ताकार जन लोकपाल बिल की अधिकांश बातों पर सहमति दिखा रहे थे और टीम अन्ना के साथ सम्मानपूर्ण रवैया अपना रहे थे, ठीक एक दिन बाद उन्होंने उन्हें न केवल टका-सा जवाब दे दिया, बल्कि डाँटा भी। अरविंद केजरीवाल के शब्दों में—“उन्होंने हमसे कह दिया कि जन लोकपाल बिल संसद में प्रस्तुत नहीं किया जाएगा।  न्यूज चैनल के संवाददाता से यह कहते हुए केजरीवाल का चेहरा दयनीय स्थिति तक उतरा हुआ था। उससे यह हताशा टपक रही थी कि इस हद तक गैर-जिम्मेदार सत्तासीनों का क्या किया जाय? तो फिर अन्ना के अनशन का क्या होगा?” अरविंद ने सरकार से पूछा और अरविंद के ही मुख से  सरकार का जवाब सुनिए-अन्ना अनशन करना चाहें तो करते रहें. यह आपकी समस्या है।
सवाल यह पैदा होता है कि इस स्वतंत्र देश में, इस स्वतंत्र गणतांत्रिक देश में जनता के हित की आवाज को अहिंसक अनशन के माध्यम से अगर कोई व्यक्ति सरकार के कानों तक पहुँचाना चाहे तो उसके जीवन और स्वास्थ्य की चिंता से क्या सरकार को इसलिए अलग खड़ी हो जाना चाहिए कि उक्त व्यक्ति या व्यक्ति-समूह उसके मन मुताबिक बर्ताव क्यों नहीं कर रहा है?
दोस्तो, सरकारी वार्ताकारों द्वारा टीम अन्ना से ही नहीं किसी से भी यह कहे गये शब्द कि अन्ना अनशन करना चाहें तो करते रहें. यह आपकी समस्या है। शासक समझे जाने वाले व्यक्तियों के नैतिक पतन की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं। इस वाक्य की जितनी भर्त्सना की जाय कम है।