शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

प्रगति मैदान, नई दिल्ली की यात्रा


दोस्तो,

नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला,2010 दिनांक 30 जनवरी, 2010 से जारी है और 7 फरवरी, 2010 तक चलेगा। अनेक बोलियों, भाषाओं और लिपियों के जानकार इस मेले में आ-जा चुके होंगे और आगे भी आयेंगे। प्रगति मैदान के एक हॉल के बाहर जब से यह बोर्ड लटकाया गया है तब से अब तक हिन्दी-साहित्य के अमिताभ बच्चन कहे जाने वाले…से लेकर विदूषक कहे जाने वाले…नहीं, यहाँ मैं किसी का नामोल्लेख नहीं करूँगा, बस यह कहूँगा कि हर वर्ष हिन्दी-पखवाड़ा और हिन्दी-सप्ताह मनाने के नाम पर लाखों रुपए लुटा डालने वालों से लेकर लूट ले जाने वालों तक, हर स्तर का विद्वान यहाँ से अवश्य ही गुजरा होगा। मैं आपसे सिर्फ यह जानना चाहता हूँ फोटो में दर्शाया गया यह शब्द किस भाषा का है? इसी क्रम में कुछ-और फोटो भी मैं आगे प्रकाशित करने की अनुमति आपसे चाहूँगा।

--बलराम अग्रवाल

14 टिप्‍पणियां:

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

इंटरनेट पर तो आप इसको
वांछित रूप में लिख ही नहीं सकते!

--
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ"

pran ने कहा…

SHABDKOSH DEKHA.YAH SHABD NAHIN
MILAA.SHRINGAR THEATRE KE
DIRECTOR SE POOCHHNA PADEGAA.KAHTE
HAIN KI NAATAK KE NIRDESHAK KO
BHASHA KAA POORA GYAAN HOTA HAI.

रूपसिंह चन्देल ने कहा…

भाई

हो सकता है कि डोगरी में ऎसा ही लिखा जाता हो. इसके बारे पद्मा सचदेव जी से पूछा जा सकता है.

चन्देल

सुभाष नीरव ने कहा…

मैंने तो "श्रृंगार" शब्द को ऐसे लिखा अभी तक नहीं देखा, कहीं भी।

सहज साहित्य ने कहा…

यही नहीं भारती भण्डार पटना के स्टाल पर '4 दशक से छप रही पुस्तक ' शुध्द हिन्दी' भी है ; जिसके कवर पेज पर यही वर्तनी छपी है ,जबकि सही रूप है-शुद्ध ।
रामेश्वर काम्बोज

अन्तर सोहिल ने कहा…

यह साईन बोर्ड बनाने वालों की गलती है जी
आगे भी दिखाईयेगा

प्रणाम स्वीकार करें

मसिजीवी ने कहा…

रावेन्‍द्र की बात में दम है, कम से कम इंडिक आईएमई में तो शृंगार के रूप में ही लिखना होता है क्‍योंकि श्रृंगार में स्‍वाभाविक रूप से त्रुटि है।
:
:
और इस क्षृंगार का क्‍या कहें, आईटीपीओ के हिन्‍दी अधिकारी भी हमारे जैसे विश्‍वविद्यालयों से ही निकले होंगे यानि दोष हम अध्‍यापकों का ही है

शशांक शुक्ला ने कहा…

कोटे वालों का कमाल है भाई, कोई मुझसे कह रहा था कि आजकल इसमें भई रिजर्वेशन चल रहा है

shama ने कहा…

Swagat hai!

kshama ने कहा…

Anek shubhkamnayen!

सुरेश यादव ने कहा…

मेरे विचारसे इस गलती के लिए भाषा तलाशने की आवश्यकता नहीं है.ऐसी गलतियाँ हमेशा ही हिंदी के लिए सुरक्षित रहती हैं.उदहारण के लिए आप ने वाहनों के पीछे' कृप्या' लिखा देखा होगा .अंग्रेजी का प्लीज कभी गलत नहीं लिखा देखा होगा.एक प्रवृत्ति है जो जो हिंदी के प्रति रवैये को दर्शाती है.

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } ने कहा…

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,
धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,
कलम के पुजारी अगर सो गये तो
ये धन के पुजारी
वतन बेंच देगें।



हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में प्रोफेशन से मिशन की ओर बढ़ता "जनोक्ति परिवार "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ ,

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छी लगी आपकी रचना .. इस नए चिट्ठे के साथ हिन्‍दी चिट्ठा जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

अजय कुमार ने कहा…

हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें