गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी व साहित्यकार कालीचरण प्रेमी की जीवन हेतु जद्दोजहद


शान्ति मुकुन्द हॉस्पीटल, दिल्ली के कैंसर वार्ड में हताश-निराश कालीचरण प्रेमी 

श्रीयुत कालीचरण प्रेमी पिछ्ले चार वर्षों से ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और इन दिनों शान्ति मुकुन्द अस्पताल, दिल्ली में तृतीय तल स्थित कैंसर वार्ड के कमरा नं॰ 3029 में पड़े हैं। वह भारतीय डाक-विभाग में सेवारत हैं और इन दिनों प्रधान डाकघर गाजियाबाद के एक उपडाकघर कविनगर में बतौर डाक-सहायक कार्यरत हैं।
स्वास्थ्य में अचानक आई गिरावट के कारण गत 22 मार्च, 2011 को उन्हें दिल्ली में प्रीत विहार चौराहे

शा॰मु॰ हॉस्पीटल द्वारा जारी भर्ती-कार्ड

के निकट(प्र॰ डा॰ कृष्णनगर, दिल्ली के सामने दीपक मेमोरियल अस्पताल के बराबर में) स्थित शान्ति मुकुन्द हॉस्पिटल के कैंसर वार्ड में लाया गया, जो कि सी॰जी॰एच॰एस॰ के पैनल में है। उनका इलाज कर रहे डॉ॰ समीर खत्री ने उन्हें तुरन्त आई॰सी॰यू॰ में भर्ती किया और लगातार गिर रहे उनके पैलेट्स पर काबू पाया।
ध्यातव्य है कि कालीचरण प्रेमी अत्यन्त गरीब परिवार के व्यक्ति हैं। तिस पर ब्लड कैंसर जैसी मँहगे इलाज वाली जानलेवा बीमारी ने न केवल उनके स्वास्थ्य बल्कि बचे-खुचे आर्थिक आधार को भी समाप्त कर दिया है और वे कर्ज में गहरे डूब गये हैं।
उनका कहना है कि गाजियाबाद के साहित्यिक मित्रों से ही नहीं, स्थानीय विभागीय मित्रों व अधिकारियों से भी उन्हें लगातार यथोचित मानसिक सहयोग मिलता रहा है; लेकिन इस बार जब से, यानी 23 मार्च 2011 को उनके इलाज हेतु शान्ति मुकुन्द अस्पताल द्वारा माँगी गई अग्रिम राशि की फाइल (जिसका नम्बर E/Kalicharan Premi/Medical Advance/2010-11 है,) अनुमोदन हेतु विभाग के उच्चाधिकारियों को भेजी गई है तब से यहाँ-वहाँ चक्कर काट रही है और किसी भी तरह का कोई सन्तोषजनक उत्तर उन्हें या उनका इलाज कर रहे अस्पताल को नहीं मिला है। यों शान्ति मुकुन्द अस्पताल प्रशासन भी उनका इलाज कर ही रहा है, लेकिन अग्रिम राशि के अनुमोदन की सूचना यह समाचार लिखे जाने तक भी न मिलने की चिन्तास्वरूप इस दौरान कई बार अस्पताल में ही उनके पैलेट्स गिर चुके हैं तथा आनन-फानन में उनके लिए आवश्यक पैलेट्स का इन्तजाम करके उन्हें चढ़ाया जा चुका है। यह सब खर्चा उनके निर्धन परिवार को किसी न किसी तरह कर्जा लेकर करना पड़ रहा है। साहित्यिक और विभागीय मित्रों की सान्त्वना तथा परिवारजनों के श्रम की बदौलत कालीचरण प्रेमी का मनोबल बढ़ा हुआ है, लेकिन ब्लड कैंसर के इलाज के लिए अग्रिम राशि का अनुमोदन प्राप्त होने में हो चुकी अपरिहार्य देरी ने उनके मनोबल को तोड़ डाला है। वह कहने लगे हैं कि उन्हें कैंसर तो जब मारेगा तब मारेगा ही, इलाज के लिए विभाग से समय पर न मिलने वाला आर्थिक अनुमोदन दिन-ब-दिन अभी से मार रहा है।
कालीचरण प्रेमी का ही नहीं हमारा भी कहना है कि यदि ब्लड कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के रोगी के इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन हेतु डाक विभाग का यह रूप और रवैया है तो आम बीमारी से त्रस्त रोगियों को मिलने वाली सहायता का क्या हाल होता होगा, इसका अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है। 
उल्लेखनीय है कि मृदुल स्वभाव के कालीचरण प्रेमी डाक-विभाग की सेवा के साथ-साथ हिंदी-साहित्य की सेवा भी पिछले 30-32 वर्षों से लगातार कर रहे हैं। वे अनेक पत्रिकाओं के अवैतनिक साहित्य

कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित लघुकथा संकलन 'अंधा मोड़'

संपादक रहे हैं। उनकी लघुकथाओं का पहला लघुकथा संग्रह कीलें सन् 2002 में आया था तथा दूसरा लघुकथा संग्रह तवा जिसे उन्होंने विश्वभर के कैंसर पीड़ितों को समर्पित किया है, शीघ्र प्रकाश्य है। तवा के प्रकाशन हेतु आर्थिक सहायता सुलभ इंटरनेशनल ने प्रदान की है। सन् 2010 में प्रकाशित उनके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन अंधा मोड़ खासा चर्चित रहा है। संदर्भ हेतु लिंक करें—http://jangatha.blogspot.com  दिसम्बर 2010)
इस समाचार के माध्यम से अपील की जा रही है कि केन्द्र सरकार का कर्मचारी होने के नाते डाक-कर्मी व लघुकथाकार श्री कालीचरण प्रेमी की जो भी सम्भव सहायता उनके इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन की दिशा में हो सकती हो, कृपया वह करें।
बलराम अग्रवाल
सुभाष नीरव
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
ओमप्रकाश कश्यप
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
एवं अन्य साहित्यिक मित्र

1 टिप्पणी:

Pawan Kumar ने कहा…

साहितिय्क मित्रों के लिए हम अपने स्तर से जितना भी कर सकें करना चाहिए...... अग्रवाल साहब आपका प्रयास उत्कृष्ट है.agrwal ji कृपया मुझसे मेरे मोबाइल पर बात करें 9412290079