रविवार, 7 अगस्त 2011

दु:खभरे दिन बीते रे भैया…/बलराम अग्रवाल


कई माह बाद, यानी कि 23-24 मार्च, 2011 को प्रिय कालीचरण प्रेमी से मिलने जाना शुरू करने के बाद अब अस्पतालों के चक्कर लगाने से मुक्त हुआ हूँ। कभी कोई मित्र तो कभी कोई नाते-रिस्तेदार अस्पतालों में दाखिल होते रहे। कुछ को अस्पताल से छुट्टी मिली, संतोष हुआ; लेकिन कुछ को दुनिया छोड़नी पड़ी, हृदय विलाप कर उठा। कुल मिलाकर मन और तन दोनों अस्वस्थ ही रहे।
15 जुलाई, 2011 के आसपास एस॰एम॰एस॰ आए कि क्या आप पूरे चार दिन21 से 24 जुलाई तकअण्णा हजारे के आंदोलन मेंफील्ड सर्वे के लिए वॉलन्टियर कर सकते हैं? मैं उन्हें कोई जवाब नहीं दे सकता था क्योंकि मेरे छोटे साढ़ू नई दिल्ली के सर गंगा राम हॉस्पीटल के आई॰सी॰यू॰-4 में मौत से जूझ रहे थे। दुर्भाग्यवश 19 जुलाई को उन्होंने देह त्याग दी।
जलसा शुरू होने से पहले: सर्वश्री डॉ॰ गंगाप्रसाद विमल, राजेन्द्र यादव, डॉ॰ नामवर सिंह और बलराम अग्रवाल
31 जुलाई, 2011 को शाम 5 बजे मेधा प्रकाशन के स्वामी भाई अजय कुमार की कॉल पर मैंने ऐवाने ग़ालिब, नई दिल्ली में हंस की 25वीं सालगिरह के जलसे में भाग लिया। वही अपनी गाड़ी में मुझे और मेरे बेटे आदित्य को साथ लेकर गये। काफी उत्सुकता थी, लेकिन वह जलसा अपनी पूर्व-गरिमा के अनुरूप सम्पन्न नहीं हो पाया। अजय नावरिया के मसखरे संचालन ने उसे बहुत चीप-सा बना दिया। सम्मानित होने वाले व्यक्तियों के बारे में मैंने पहली बार किसी उत्कृष्ट मंच से ऐसी घोषणाएँ सुनीं कि किसको उपहारस्वरूप दो-दो पैंट-कमीज, किसको साड़ी, किसको सूटपीस और किसको शॉल दिया जा रहा है! लोग प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और धनराशि का जिक्र जरूर करते है, लेकिन सम्मान के साथ। आ॰ नामवर जी को भी उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता और हंस विषय पर बोलने का उचित माहौल बनाकर नहीं दिया सो वे भी इधर-उधर की हाँकते रहे। कुल मिलाकर निराशा ही हाथ लगी।
दो दिन पूर्व पुन: एस॰एम॰एस॰ था—‘अरविन्द केजरीवाल के साथ सरकारी लोकपाल के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लें। 5 बजे, जन्तर मन्तर। रविवार, 7 अगस्त। जरूर आएँ। सभी को बताएँ।
दोस्तो, समझ लीजिए कि कई माह बाद पहली बार घर से बाहर 31 जुलाई, 2011 को निकला था और दूसरी बार आज शाम 4 बजे। जन्तर-मन्तर पर माहौल बेहद उत्साहवर्द्धक था। दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के अन्तर्गत आती है जिसने प्रदर्शन स्थल के दोनों मुहानों को लोहे के भारी-भरकम स्टैंड्स से घेरा हुआ था। जाने-आने के लिए मात्र एक व्यक्ति के योग्य जगह बीच में छोड़ी हुई थी। मैं भीतर गया। जत्थे के जत्थे नौजवान युवक-युवतियाँ हाथों में तिरंगा लहराते हुए गश्त कर रहे थे, बिल्कुल ऐसे जैसे बहुत बड़े पिंजरे में भी शेर अपनी मुक्ति की चाह में चकराता रहता है। 15 अगस्त के दिन पुरानी दिल्ली के सीलमपुर-आकाश में इतनी पतंगे उड़ती नजर नहीं आती होंगी, जितने तिरंगे 7 अगस्त को जन्तर मन्तर के नीले आकाश में अपनी छटा बिखेर रहे थे। वंदे मातरम् प्रारम्भ से ही देशभक्तों का प्रिय मंत्र रहा है। वहाँ का सारा वातावरण इस मंत्र अनहद जाप से सराबोर था। उक्त सभा में सर्वश्री अरविन्द केजरीवाल के अलावा रंगनिर्देशक अरविन्द गौड़, केन्द्रीय सूचना आयोग के आयुक्त श्री शैलेश गाँधी, अनेक देशों में भारतीय उच्चायुक्त रह चुकी आ॰ मधु भादुरी एवं अन्य अनेक बुद्धिजीवी व देश और दिल्ली के कोने-कोने से आए जन कार्यकर्ता शामिल थे। शाम को ठीक 7 बजे मशाल जुलूस निकाला गया और संसद में सरकार की ओर से पेश लोकपाल बिल की प्रतियाँ आग के हवाले कर विरोध प्रदर्शन किया गया। उसके पश्चात सभी लोग रुचि भट्टल की हत्या की न्यायिक जाँच के लिए धरने पर बैठे उनके परिजनों के अनुरोध पर कैंडिल मार्च में शामिल हुए और इण्डिया गेट तक गये। इतना अनुशासित विरोध प्रदर्शन देखना और अपने-आप को उसका हिस्सा बनते पाना रोमांच प्रदान करता है। अपने अब तक के जीवन में विभागीय हड़तालों में तो कई बार बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। वेतन भी कटवाया। लेकिन किसी राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन में मैंने पहली बार शिरकत कीउम्र के 59वें वर्ष में। अच्छे काम जब शुरू हों तभी अच्छे लगते हैं। अपना दौर के इस अंक में प्रस्तुत हैं वहाँ के कुछ चित्र
मैं अण्णा हजारे हूँ--शक्लो-सूरत से न सही मन और मन्तव्य से पूरी तरह

सरकारी लोकपाल यानी होलिका-दहन

आंदोलन समर्थकों ने तिरंगों से आसमान को जैसे पाट ही डाला हो

'सरकारी लोकपाल धोखा है' और 'वंदे मातरम् ' की उच्च ध्वनि के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराते युवा

अण्णा हजारे की अगुआई में मंचस्थ आंदोलनकर्ता

विरोध प्रदर्शन में स्त्री-पुरुष, विकलांग और वृद्ध सभी शामिल हुए

शुक्रवार, 27 मई 2011

शाह लेखक, चोर लेखक/बलराम अग्रवाल


बेशक, डॉक्टर भी इन्सान ही होता है। वह भी आम आदमी की तरह शारीरिक और मानसिक रुग्णता का शिकार हो सकता है।
                                 चित्र : बलराम अग्रवाल
हुआ यों कि हंस के मई 2011 में छपी एक लघुकथा पढ़ी। उसका कथानक लगभग वैसा था जैसे को केन्द्र में रखकर मैं एक कहानी लिखने की योजना कई माह से बना रहा था। यद्यपि ट्रीटमेंट की दृष्टि से भिन्नता थी, फिर भी उक्त लघुकथा को पढ़कर मैंने उसे न लिखना ही तय किया, यह सोचकर कि कहानी पर पूर्व-प्रकाशित किसी रचना से प्रेरित होने का आरोप न लगे। मैं यों भी कहानियाँ लिखता ही कब हूँ!
अब, आप इसे मेरा अव्यावहारिक होना समझिए या जरूरत से ज्यादा मूर्ख या चालाक होना(इस मूर्खता या चालाकी का पता व्यक्ति को स्वयं नहीं चलता है) कि मैंने हंस में छपी उक्त लघुकथा के लेखक को फोन पर बधाई दे दी और अपनत्व के नाते यह भी बता दिया कि इसी विषय को केन्द्र में रखकर जिस कहानी की मैं योजना बना रहा था, वह अब नहीं लिखी जा सकेगी। और-भी बहुत-सी बातें, जो एक ही विधा के लेखकों के बीच सामान्यत: होती हैं, हुईं।
इस बातचीत के चार-छ: दिन बाद पहली लघुकथा, पहला लघुकथाकार, कहानी व लघुकथा के मध्य विभाजन बिंदु आदि जैसे शोधार्थियों द्वारा  बार-बार पूछे जाने वाले कुछ सवालों के जवाबों को एक लेख के रूप में व्यक्त कर मैंने उनकी पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया। गलती शायद यह की कि यह पहल मैंने अपनी ओर से कर दी, लेख-आदि माँगने के उनके अनुरोध का इंतज़ार नहीं किया। बहरहाल, लेख मिल जाने पर उन्होंने उसकी प्राप्ति की सूचना देने का मैत्रीभाव निभाया। नमस्कार आदि औपचारिकताओं के बाद बात यों शुरू की:
लेख कुछ एम॰ए॰-शैम॰ए॰ टाइप का है! वह बोले। मैं चौंका। मुझे याद आया कि एक बार उन्होंने बात करते-करते यह टिप्पणी भी की थी कि लोग कहानी की आलोचना वाले लेखों में लघुकथा शब्द फिट करके अपने नाम से नये-नये लेख लिख रहे हैं। बेशक, यह बात तो स्वयं मैंने भी कुछेक लेखों पर सही पाई थी। और यह बात न केवल लघुकथा-आलोचना बल्कि हर विधा की आलोचना के कुछेक लेखों पर लागू हो सकती है क्योंकि पहली बात तो यह कि आलोचना या समीक्षा लिखने वाले सभी लोग मौलिक चिन्तक नहीं होते; दूसरी यह कि मौलिक चिन्तक भी कुछेक बिन्दुओं पर अन्य चिन्तकों से एकरूपता रखते हैं। लेकिन लेख अथवा चिन्तन का अमौलिक होना अलग बात है और स्तरहीन अथवा सामान्य स्तर का होना अलग। सभी जानते हैं कि अकादमिक स्तर के सवाल आम तौर पर फ्रेम-वर्क जैसे होते हैं और उनके उत्तर भी कमोबेश वैसे ही होते हैं।
इधर आपकी एक लघुकथा छपी है। वह आगे बोले।
किसमें? मैंने पूछा।
यह पश्चिम बंगाल से छपनेवाला एक आठ-पेजी अखबार-सा है…
नई दिशाएँ?
हाँ-हाँ। वह बोले।
पता नहीं। मैंने कहा। नई दिशाएँ पत्र का उक्त अंक मुझे वस्तुत: तब तक मिला नहीं था। अब तक भी नहीं मिला है।
इसमें आपकी बीती सदी के चोंचले छपी है। उन्होंने कहा। फिर बजाय यह बताने के कि बीती सदी के चोंचले उन्हें कैसी लगी, उन्होंने बताया,इस सब्जेक्ट पर काफी साल पहले मैंने भी एक लघुकथा लिख रखी है। यह सुनकर मेरा चौंकना स्वाभाविक था क्योंकि जब से लेखन शुरू किया है, तब से एक भी लघुकथा, कहानी या कविता मैंने उधार के विषय पर नहीं लिखी, हमेशा मौलिक चिन्तन ही किया।
उसमें क्या था? मैंने पूछा।
उसमें कुछ ऐसा था कि एक मन्दिर की सीढ़ियों पर कोई असामाजिक तत्व गाय का खून-मांस डाल गया था। पुजारी जल्दी-जल्दी उस स्थान को धोता है और उपस्थित लोगों से कहता है कि किसी को बताना नहीं। उन्होंने बताया।
इस लघुकथा से मेरी लघुकथा का ट्रीटमेंट तो एकदम भिन्न है, मैंने कहा,एक-जैसी लगती हैं लेकिन स्थितियाँ भी अलग हैं।
हाँ, ट्रीटमेंट भी थोड़ा भिन्न है… किंचित संकोच के साथ वे बोले,मैं तो ऐसे ही कह रहा था। दरअसल हम सब एक-जैसे सूचना-तन्त्र में रहते हैं इसलिए विचारों और कथानकों में थोड़ी-बहुत समानता का आ जाना आम बात है।
अब, अगर मैं यह कहता कि उनकी कही हुई यह बात तो एक दशक पहले अपने एक लेख में मैं कह चुका हूँ, तो कैसा रहता? अभी हाल-फिलहाल की बात हैगुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती के अवसर पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने कहा था—“टैगोर को भगवान न बनाएँ, इन्सान ही रहने दें। उनसे दो दिन पहले ही साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित प्रेमचंद कहानी रचनावली के लोकार्पण के अवसर पर उसके संपादक डॉ॰ कमल किशोर गोयनका ने कहा था—“प्रेमचंद को इन्सान ही रहने दें, देवता न बनाएँ। 1997 में प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ की भूमिका मैंने प्रेमचंद निहायत आम आदमी हैं, अवतार नहीं शीर्षक से लिखी थी। नि:संदेह उससे पूर्व भी अनेक विचारकों ने ऐसे विचार व्यक्त कर रखे होंगे। तो क्या हम सब के सब एक दूसरे के विचारों की चोरी कर रहे हैं?
आपकी एक और लघुकथा है… वह कुछ याद करते-से बोले,वैसी भी मैंने काफी साल पहले लिखी थी।
कौन-सी? मैं पुन: चौंका।
वह…जिसमें एक माँ लड़की को थाने ले जाने की बात करती है… वह बोले।
बचावघर मैंने कहा।
हाँ, यह मेरी एक पुरानी लघुकथा से मिलती है…उसमें… इससे आगे उन्होंने क्या-क्या कहा मैं सुनकर भी समझ नहीं पाया क्योंकि मेरे लिए यह हैरानी की बात थी कि मैं आज से नहीं कई दशकों से अमौलिक लेखन कर रहा हूँ। हालाँकि मैं आज भी अपनी रचनाओं पर उनके लेखन-प्रकाशन संबंधी नोट नहीं लगा पाता, लगा देता हूँ तो सहेज नहीं पाता। इसलिए पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि मेरी कौन-सी रचना कब लिखी गई और पहले-पहल कहाँ छपी। बचावघर, जहाँ तक मुझे याद है, मैंने 1984-85 के दौरान लिखी होगी।
हालाँकि अन्य लेखकों की भी अनेक लघुकथाओं को वे अपनी पूर्व-प्रकाशित रचना से प्रभावित होकर लिखने की बात बताते रहते थे। पुस्तक-समीक्षा के मामले में भी मित्र-विशेष के बारे में उनका यह कहना कि आठ-दस पत्रिकाओं से मैटर उठाकर समीक्षा लिख मारता है मैं कई बार सुन चुका था। इस बार हमला मुझ पर था, वह भी पीठ-पीछे नहीं, सीधे मुझी से। मुझे लगता है कि हंस में छपी उनकी रचना को देखकर प्रशंसा करने और निरुद्देश्य ही स्पष्ट कहने की जो दरियादिली मैंने दिखाई थी, उसने उनको कुछ सच उगलने के लिए प्रोत्साहित कर दिया। सोचा होगा कि जब यह एक अनलिखी रचना के बारे में स्वयं अपना स्पष्टीकरण दे रहा है तो इसकी कुछ लिखित और प्रकाशित रचनाओं के बारे में अपनी ओर से क्यों न बता दिया जाए?
जब से मित्रवर से बात हुई है, अपने लेखन और चिन्तन की अमौलिकता व स्तरहीनता को लेकर चिन्तित हो गया हूँ।

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

खत्म हुई जद्दोजहद : स्वर्ग सिधार गये कालीचरण प्रेमी


कालीचरण प्रेमी : विभागीय संवेदनहीनता ने जिन्हें असमय ही मार डाला
भारतीय समाज का यह अजीबोगरीब सच है। कल, रविवार 24 अप्रैल, 2011 की सुबह 07बजकर 40मिनट पर कर्नाटक के पुट्टपर्णी में हर प्रकार से सेवित परमपूज्य सत्य साईं बाबा ने शरीर त्यागा और इधर, उनके ठीक 18 घंटे बाद, रात 01बजकर 40मिनट पर उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद में ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी कालीचरण प्रेमी अपने विभाग से अनुमोदित होकर आने वाली मेडिकल सहायता राशि की फाइल का 33 दिनों तक इन्तजार करके अन्त्तत: स्वर्ग सिधार गये। गाजियाबाद में हिण्डन नदी के तटवर्ती मोक्षधाम श्मशान घाट में आज 25 अप्रैल, 2011 को सुबह लगभग 11बजे अग्नि को समर्पित उनका शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो गया। उनकी अन्तिम यात्रा में नगर के अनेक डाक-कर्मियों के अलावा सुप्रसिद्ध गीतकार डॉ॰ कुँअर बेचैन, वरिष्ठ उपन्यासकार राकेश भारती, व्यंग्यकार सुभाष चन्दर, कथा-सागर के संपादक सुरंजन, कथाकार ओमप्रकाश कश्यप, महेश सक्सेना, सुरेन्द्र अरोड़ा, सुरेन्द्र गुप्ता, बलराम अग्रवाल आदि अनेक लेखक व पत्रकार शामिल थे। रुड़की से अविराम के संपादक उमेश महादोषी, इन्दौर से उपन्यासकार नन्दलाल भारती व कथाकार सुरेश शर्मा, दिल्ली से लघुकथा डॉट कॉम के सम्पादक व वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, नुक्कड़ व अनेक हिंदी ब्लॉग्स के सम्पादक अविनाश वाचस्पति, सेतु साहित्य के सम्पादक सुभाष नीरव व अनेक साहित्यकारों ने कालीचरण प्रेमी के देहांत पर शोक जताया है तथा अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए हैं। ईश्वर श्री कालीचरण प्रेमी की पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करे व शोक-संतप्त परिवार को यह वज्रपात सहने की शक्ति प्रदान करे।

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी व साहित्यकार कालीचरण प्रेमी की जीवन हेतु जद्दोजहद : पुन: आई॰सी॰यू॰ में भर्ती


यह लगभग हृदय-विदारक समाचार है।

कैंसर वार्ड के बिस्तर पर असहाय कालीचरण प्रेमी

कालीचरण प्रेमी पुन: आई॰सी॰यू॰ में शिफ्ट कर दिये गये हैं। उनके शरीर का दायाँ हिस्सा पक्षाघात का शिकार हो चुका है। नाक से खून बहने लगा है। उनका जीवन बचाने की डॉक्टरों की कोशिशें जारी हैं। उन्हें कितने ही यूनिट पैलेट्स और चढ़ाए जा चुके हैं और डाक-विभाग से उनको मेडिकल सहायता-राशि अभी तक भी नहीं मिल पाई है। इस दुष्कर्म की किन शब्दों में भर्त्स्ना की जाय--समझ में नहीं आ रहा।
आज(दिनांक 20-4-2011) शाम करीब आठ बजे भाई सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा का फोन आया था। प्रेमी जी की पत्नी के हवाले से उन्होंने मुझे बताया कि वह अब पहचान भी नहीं रहे हैं। अरोड़ा जी ने मुझसे कहा कि वे अपने घर से हॉस्पिटल के लिए निकल रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि आप पहुँचिए, मैं भी आता हूँ।
रोगी की हालत की गम्भीरता के मद्देनजर आई॰सी॰यू॰ स्टाफ ने पाँच मिनट के लिए उनके निकट जाने की अनुमति मुझे दे दी। मैं लगभग 8॰55 पर आई॰सी॰यू॰ में कालीचरण के बिस्तर तक पहुँचा। वह बेहाल थे और गहरी साँसें ले रहे थे। मैं उनके बायीं ओर जा खड़ा हुआ। उस बेहाली में ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे पहचानकर पलंग की रेलिंग पर रखे मेरे हाथ पर अपना बायाँ हाथ रख दिया। मैंने तुरन्त अपनी दोनों हथेलियों में उनके हाथ को थाम लिया और नौ बजे तक यों ही खड़ा रहा। कालीचरण को नि:संदेह आत्मीय स्पर्श की आवश्यकता थी। मित्रों, परिवार जनों के इस आत्मीय स्पर्श और लिखते व पढ़ते रहने की जिजीविषा के बल पर ही कालीचरण करीब चार साल तक अपने-आप को ब्लड कैंसर से लड़ने योग्य बनाए रह सके; लेकिन—‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:…। सही नौ बजे स्टाफ नर्स ने मिलने का मेरा समय समाप्त होने का ध्यान दिलाते हुए आई॰सी॰यू॰ से बाहर चले जाने को कह दिया। मैं कालीचरण से कुछ कह नहीं सका, जबकि इशारे से कुछ कहना अवश्य चाहिए था। उस इशारे का तात्पर्य कालीचरण समझ अवश्य जाते क्योंकि पहले इस बारे में हम विमर्श कर चुके थे। मुझे दु:ख है कि मैं उन्हें कुछ समझाए बिना चुपचाप बाहर निकल आया।
उसी दौरान सुरेन्द्र अरोड़ा जी भी पहुँच गये और 9॰30 के लगभग वे भी कालीचरण को देखकर आये। इस बीच कालीचरण प्रेमी की हालत में कुछ-और गिरावट आ चुकी थीउनके कथन से मुझे ऐसा लगा।
दोस्तो, कालीचरण प्रेमी की शारीरिक स्थिति के मद्देनजर हॉस्पिटल प्रशासन उनके परिवार पर दबाव बना रहा है कि वे उनके इलाज की रकम तुरन्त जमा कराएँ। जैसाकि दिनांक 14 अप्रैल 2011 की पोस्ट में हमने लिखा थाकेन्द्रीय डाककर्मी होने के नाते कालीचरण प्रेमी का इलाज सी॰जी॰एच॰एस॰ के पैनल में दर्ज शान्ति मुकुन्द हॉस्पिटल, दिल्ली में चल रहा है। और उनके डॉक्टरों द्वारा उनके इलाज में खर्च होने वाली अनुमानित राशि की माँग वाली फाइल(जिसका नम्बर E/Kalicharan Premi/Medical Advance/2010-11 है) दिनांक 23 मार्च, 2011 से यानी गत लगभग एक माह से गाजियाबाद, नोएडा, लखनऊ और दिल्ली के चक्कर काट रही है। सम्बन्धित अधिकारी कितने संवेदनहीन हो चुके है, यह इसका घिनौना और क्रूरतम उदाहरण है।
--बलराम अग्रवाल
साथ में अपीलकर्त्ता:सुभाष नीरव
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
ओमप्रकाश कश्यप
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
अविनाश वाचस्पति
नन्दलाल भारती
एवं अन्य साहित्यिक मित्र

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी व साहित्यकार कालीचरण प्रेमी की जीवन हेतु जद्दोजहद


शान्ति मुकुन्द हॉस्पीटल, दिल्ली के कैंसर वार्ड में हताश-निराश कालीचरण प्रेमी 

श्रीयुत कालीचरण प्रेमी पिछ्ले चार वर्षों से ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और इन दिनों शान्ति मुकुन्द अस्पताल, दिल्ली में तृतीय तल स्थित कैंसर वार्ड के कमरा नं॰ 3029 में पड़े हैं। वह भारतीय डाक-विभाग में सेवारत हैं और इन दिनों प्रधान डाकघर गाजियाबाद के एक उपडाकघर कविनगर में बतौर डाक-सहायक कार्यरत हैं।
स्वास्थ्य में अचानक आई गिरावट के कारण गत 22 मार्च, 2011 को उन्हें दिल्ली में प्रीत विहार चौराहे

शा॰मु॰ हॉस्पीटल द्वारा जारी भर्ती-कार्ड

के निकट(प्र॰ डा॰ कृष्णनगर, दिल्ली के सामने दीपक मेमोरियल अस्पताल के बराबर में) स्थित शान्ति मुकुन्द हॉस्पिटल के कैंसर वार्ड में लाया गया, जो कि सी॰जी॰एच॰एस॰ के पैनल में है। उनका इलाज कर रहे डॉ॰ समीर खत्री ने उन्हें तुरन्त आई॰सी॰यू॰ में भर्ती किया और लगातार गिर रहे उनके पैलेट्स पर काबू पाया।
ध्यातव्य है कि कालीचरण प्रेमी अत्यन्त गरीब परिवार के व्यक्ति हैं। तिस पर ब्लड कैंसर जैसी मँहगे इलाज वाली जानलेवा बीमारी ने न केवल उनके स्वास्थ्य बल्कि बचे-खुचे आर्थिक आधार को भी समाप्त कर दिया है और वे कर्ज में गहरे डूब गये हैं।
उनका कहना है कि गाजियाबाद के साहित्यिक मित्रों से ही नहीं, स्थानीय विभागीय मित्रों व अधिकारियों से भी उन्हें लगातार यथोचित मानसिक सहयोग मिलता रहा है; लेकिन इस बार जब से, यानी 23 मार्च 2011 को उनके इलाज हेतु शान्ति मुकुन्द अस्पताल द्वारा माँगी गई अग्रिम राशि की फाइल (जिसका नम्बर E/Kalicharan Premi/Medical Advance/2010-11 है,) अनुमोदन हेतु विभाग के उच्चाधिकारियों को भेजी गई है तब से यहाँ-वहाँ चक्कर काट रही है और किसी भी तरह का कोई सन्तोषजनक उत्तर उन्हें या उनका इलाज कर रहे अस्पताल को नहीं मिला है। यों शान्ति मुकुन्द अस्पताल प्रशासन भी उनका इलाज कर ही रहा है, लेकिन अग्रिम राशि के अनुमोदन की सूचना यह समाचार लिखे जाने तक भी न मिलने की चिन्तास्वरूप इस दौरान कई बार अस्पताल में ही उनके पैलेट्स गिर चुके हैं तथा आनन-फानन में उनके लिए आवश्यक पैलेट्स का इन्तजाम करके उन्हें चढ़ाया जा चुका है। यह सब खर्चा उनके निर्धन परिवार को किसी न किसी तरह कर्जा लेकर करना पड़ रहा है। साहित्यिक और विभागीय मित्रों की सान्त्वना तथा परिवारजनों के श्रम की बदौलत कालीचरण प्रेमी का मनोबल बढ़ा हुआ है, लेकिन ब्लड कैंसर के इलाज के लिए अग्रिम राशि का अनुमोदन प्राप्त होने में हो चुकी अपरिहार्य देरी ने उनके मनोबल को तोड़ डाला है। वह कहने लगे हैं कि उन्हें कैंसर तो जब मारेगा तब मारेगा ही, इलाज के लिए विभाग से समय पर न मिलने वाला आर्थिक अनुमोदन दिन-ब-दिन अभी से मार रहा है।
कालीचरण प्रेमी का ही नहीं हमारा भी कहना है कि यदि ब्लड कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के रोगी के इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन हेतु डाक विभाग का यह रूप और रवैया है तो आम बीमारी से त्रस्त रोगियों को मिलने वाली सहायता का क्या हाल होता होगा, इसका अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है। 
उल्लेखनीय है कि मृदुल स्वभाव के कालीचरण प्रेमी डाक-विभाग की सेवा के साथ-साथ हिंदी-साहित्य की सेवा भी पिछले 30-32 वर्षों से लगातार कर रहे हैं। वे अनेक पत्रिकाओं के अवैतनिक साहित्य

कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित लघुकथा संकलन 'अंधा मोड़'

संपादक रहे हैं। उनकी लघुकथाओं का पहला लघुकथा संग्रह कीलें सन् 2002 में आया था तथा दूसरा लघुकथा संग्रह तवा जिसे उन्होंने विश्वभर के कैंसर पीड़ितों को समर्पित किया है, शीघ्र प्रकाश्य है। तवा के प्रकाशन हेतु आर्थिक सहायता सुलभ इंटरनेशनल ने प्रदान की है। सन् 2010 में प्रकाशित उनके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन अंधा मोड़ खासा चर्चित रहा है। संदर्भ हेतु लिंक करें—http://jangatha.blogspot.com  दिसम्बर 2010)
इस समाचार के माध्यम से अपील की जा रही है कि केन्द्र सरकार का कर्मचारी होने के नाते डाक-कर्मी व लघुकथाकार श्री कालीचरण प्रेमी की जो भी सम्भव सहायता उनके इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन की दिशा में हो सकती हो, कृपया वह करें।
बलराम अग्रवाल
सुभाष नीरव
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
ओमप्रकाश कश्यप
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
एवं अन्य साहित्यिक मित्र

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

क्रिकेट का महायुद्ध यानी ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ का नया संस्करण/ बलराम अग्रवाल

दोस्तो, इस लेख को मैं क्रिकेट विश्वकप 2011 के फाइनल से दो घंटे से भी कम समय पहले पोस्ट कर रहा हूँ। मैच का परिणाम जो भी हो, हमारी मानसिकता में इस विश्वकप के दौरान एक नकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया गया है जो अत्यन्त घिनौना और पीड़ादायक है।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा। मात्र इसलिए राष्ट्रगीत की दौड़ से बाहर हो गया बताते हैं कि इसमें विश्वविजय का सपना था जो हमारे न सिर्फ कायिक बल्कि वैचारिक अहिंसक चरित्र और पंचशील सिद्धांत के खिलाफ था। अब, जब से क्रिकेट विश्वकप 2011 का ताप बढ़ने लगा है, राजनीतिक गलियारों में बहुविधि पालित पंचशील सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ती नजर आ रही हैं। वस्तुत: तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जिस आध्यात्मिक सिद्धांत या नैतिक सद्वाक्य की धज्जियाँ न उड़ा दें, उसे परम सौभाग्यशाली ही समझना-मानना चाहिए।
सेमीफाइनल से पहले भारत-पाक टीमों के बीच होने वाले मैच को करगिल युद्ध की पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया। परिणाम जो भी रहा, यह तो तय है कि खेल के मैदान में पाक के साथ हमारा मीडिया हद दर्जे तक नापाक प्रस्तुति वाला है। अन्य खेलों की मैं नहीं जानता, लेकिन क्रिकेट के मामले में देश के दर्शक को उसने असामान्य संवेदना से युक्त कर लगभग मनस्तापी बना डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मुझे कथादेश के एक अंक में कवि व पत्रकार विष्णु खरे द्वारा लिखित फिल्म बॉर्डर की समीक्षा याद है जिसमें उन्होंने संभावना व्यक्त की थी कि इस फिल्म में पाक-कमांडर के खिलाफ प्रयुक्त सनी देओल के गालीभरे संवाद भारत में हिन्दू-मुसलमानों के बीच वैमनस्य का कारण बन सकते हैं। यद्यपि वैसा कुछ हुआ नहीं और उक्त संवादों के साथ बॉर्डर को सैकड़ों बार टी॰वी॰ पर दिखाया जा चुका है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हमें कुछ विषयों की संवेदनशीलता के प्रति लापरवाह नहीं हो जाना चाहिए। खेल में जीत की भावना को बढ़ावा देने का तरीका इतना साफ-सुथरा होना चाहिए कि देश का बच्चा-बच्चा विश्व-नागरिक बनने की ओर अग्रसर हो सके; न कि इतना भद्दा कि वह अपने पड़ोसी से नफरत करने लगे या फिर उससे नजरें चुराने लगे।
आज जिस अखबार, जिस चेनल को देखो, वह जुनून से भरा है। दु:खी करने वाली बात यह है कि यह जुनून सकारात्मक और गुणात्मक लेशमात्र भी नजर नहीं आता है। यह सकारात्मक और गुणात्मक हो सकता है यदि जीतने की यह भावना हम सभी खेलों में सभी देशों के विरुद्ध अपने खिलाड़ियों और देशवासियों में समान रूप से पनपायें, लेकिन यह हो नहीं रहा है। हालत यह है कि मीडिया दो देशों ही नहीं, दो सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य बोने का ऐसा आत्मघाती खेल खेल रहा है जिसके परिणाम तुरन्त तो किसी को भी दिखाई दे ही नहीं रहे। जो परिणाम दिखाई दे रहा है वो यह किअमेरिका ने भारत-पाक क्रिकेट कूटनीति की प्रशंसा की है। इस प्रशंसा से ही आभास मिलता है कि कुछेक टुकड़े हमारी ओर फेंकते रहकर साम्राज्यवादी अमेरिका हमें किस कीचड़ की ओर धकेल रहा है! अभी कुछ वर्षों पहले उसने हमें—‘गर्व से कहो हम हिन्दू(यह उद्बोधन देते समय स्वामी विवेकानन्द ने इस शब्द का प्रयोग समस्त भारतवासियों के लिए किया था) हैं की ओर धकेला था, जिसकी ओर चलते हुए हमने कितनी सामाजिक समरसता खोई, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
मोहाली के पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम के क्लब हाउस में उस वक्त, जब पाक दो  विकेट गँवा चुका था, पाक के प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी, भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी आदि राजनयिक गोश्त बर्रा, तंदूरी पिंक सालम, मुर्ग लजीज़,गोश्त पालक साग, चाँप बिरयानी, तवे की मछली, भरवाँ मीट, शाही इडली, गाजर का सूप और कई अन्य व्यंजनों का आनन्द ले रहे थे। बकौल अकबर इलाहाबादी:
क़ौम के ग़म में डिनर करते हैं हुक्काम के साथ।
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ॥
जो भी हो, देश के मीडिया से यही दरख्वास्त है कि वहखेल को खेल ही रहने दे कोई नाम न दे।
फोटो साभार:नई दुनिया,दिल्ली 31 मार्च 2011



गुरुवार, 25 नवंबर 2010

बंगलौर:इस बार/बलराम अग्रवाल


लाल बाग, बंगलौर में एक मनोहारी दृश्य                 चित्र:बलराम अग्रवाल
डायरी/25-11-2010
दिन अभी शुरू नहीं हुआ। रात के 12/45 हुए हैं। कुछ देर दिन में सो लेने की वजह से नींद जल्दी नहीं आ सकती। मैं और आदित्य जाग रहे हैं। वह एनीमेशन का अपना काम कर रहा है, लेखन-संबंधी मैं अपना।
आज गुरुवार है। रविवार को लाल बाग की सैर की मैंनेराजेश के साथ। साथ घूमने की तो बात ही अलग है, यह बात लिखते हुए भी मुझे प्रेम और अपनेपन की जिस दिव्य गंध का आभास हो रहा है, उसे मैं सिर्फ महसूस कर सकता हूँ, लिख नहीं सकता। लाल बाग की सैर का प्रस्ताव राजेश ने ही मेरे सामने रखा, मैंने उनके सामने नहीं। इस बारे में दो बातें हैंपहली यह कि मुझे यहाँ, बंगलौर के भ्रमण-योग्य इलाकों के बारे में यानी ऐसे इलाकों के बारे में जो निवास से बहुत ज्यादा दूर न हों और प्राकृतिक सुषमा से भरपूर हों, कुछ भी नहीं मालूम; दूसरी यह कि मैं किसी को साथ लेकर घूमने की योजना बनाने के बारे में शुरू से ही दोयम हूँ। गरज यह कि पता भी नहीं है और दब्बूपन भी है। मालूम नहीं क्या बात है कि जब भी राजेश का विचार जेहन में आता है, मन में यह गीत अनायास ही सुनाई-सा देने लगता है:
दोनों जवानी की मस्ती में चूर/
तेरा कुसूर न मेरा कुसूर/
ना तूने सिग्नल देखा/
न मैंने सिग्नल देखा/
एक्सीडेंट हो गया रब्बा-रब्बा…।
नितान्त भोगवादी चरित्र का यह गीत क्यों सुनाई देता है? जबकि जितना मैंने उन्हें समझा है, राजेश को सांसारिक भोग से कोई लगाव नहीं है। अभी तक का अपना जीवन उन्होंने श्रम और विश्वास के साथ बिताया है। अपने जीवन के सुनहरे सतरह वर्ष उन्होंने 'चकमक' के संपादन को सौंपकर एक तरह से भारत की बाल-मेधा को दिशा देने में बिताए हैं। मुझे लगता है कि मैंने भी मात्र स्वार्थ-लाभ हेतु कभी वाहियात चरित्रों या मात्र सिक्कों के पीछे भागने की कोशिश नहीं की। लगभग उन्हीं की तरह का  या सामान्य से भी नीचे का जीवन जिया है। हाँ, साहित्यिक-श्रम अवश्य उनसे कम किया है। पारिवारिक जिम्मेदारियों ने मुझे कभी आज़ाद नहीं रहने दिया। उनके-अपने बीच मैं लेकिन साहित्यिक-लगाव अवश्य महसूस करने लगा हूँ। यह लगाव इकतरफा भी हो सकता है और दोतरफा भी। प्रेम और लगाव हो तो कोई कहाँ-से-कहाँ मिलने को जा सकता है। राजेश का वर्तमान-निवास दक्षिण-बंगलौर के अत्याधुनिक सोसाइटियों से भरपूर सरजापुर रोड स्थित विप्रो से दो-ढाई किमी अन्दर गाँव में है और मैं सीवी रमन नगर के निकट कगदासपुरा में हूँ यानी करीब-करीब पूर्वी-बंगलौर की एक विकासशील कालोनी में। दोनों के बीच कोई सीधी बस सेवा उपलब्ध नहीं है। कम-से-कम तीन बसें बदलकर पहुँचना होता है, दो-ढाई किलोमीटर पैदल चलना अलग। गत 30 अक्टूबर, 2010 को उनसे मिलने के लिए आदित्य की बाइक पर बैठकर पहली बार जब मैं उधर पहुँचा था तो आदित्य ने कहापापा, हम पिछले वर्ष जहाँ आए थे, वहीं पर पहुँच गये हैं।
पिछले वर्ष, यानी अक्टूबर-नवम्बर, 2009 में भी हम इधर आये थे। भाई श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु ने तब सुश्री सुधा भार्गव का फोन नम्बर मुझे लिखवाया था। इस बार भी उन्होंने ही फोन लिखवाया था और उस समय हम उन्हीं से मिलने को जा रहे थेश्रीयुत राजेश उत्साही जी से। ऊपर की पंक्तियों में केवल कुछ रहस्य बुनने की नीयत से मैंने उन्हें राजेश सम्बोधित किया है। वस्तुत: तो पहले दिन से ही मैं उन्हें उत्साही जी सम्बोधित करता हूँ। इस कथा में रहस्य बुनने की नीयत से उन्हें राजेश सम्बोधित करने की अपनी अशिष्टता के लिए मैं क्षमा याचना करता हूँ।