दोस्तो, गत दिनों आपने बंगलूरु(कर्नाटक) निवासी प्रकाश बेलवाड़ी की टिप्पणी ‘साम्रावाद के बीच’ पढ़ी। इस बार कोटकपूरा(पंजाब) से भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल ने अपना यह अनुभव भेजा है—बलराम अग्रवाल
चित्र:बलराम अग्रवाल
पिछले शुक्रवार को एक मीटिंग में भाग लेने के लिए कोटकपूरा से अमृतसर जा रहा था। बस फरीदकोट से निकलकर बस ज्यादा से ज्यादा पंद्रहकिलोमीटर ही चली होगी कि उसका एक टायर पंक्चर हो गया। ड्राइवर किसी तरह उसको ‘तलवंडी भाई’ गाँवके मोड़ तक ले गया। सुबह के सात ही बजे थे। पंक्चर लगाने वाले ने अपनी खोखानुमा दुकान खोली ही थी।
बस उसके आगे जाकर रुक गई। इधर पंक्चर टायर को निकालने-बदलने का काम शुरू हुआ, उधर सवारियों में से किसी के मुँह से अन्ना हज़ारेऔर सरकार की बात निकली। वह बहुत कम पढ़ा-लिखा पंक्चर लगाने वाला भी इस विषय पर टिप्पणीकरने से नहीं रह सका। उसने कहा—‘करोड़ाँ खान वाले साध नूँ चोर दस्सी जांदे ऐ।’(करोड़ों रुपए खा जानेवाले लोग साधु को चोर बता रहे हैं।) उस का इशारा कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी द्वारा अन्ना हज़ारे को आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा बताया जाने की तरफ था।
पंजाब के एक अंदरूनी गाँव में सड़क किनारे खोखा डालकर रोजी-रोटी कमाने वाले लगभग अनपढ़ ग्रामीण की यहटिप्पणी उन चाटुकारों के मुँह पर करारा तमाचा है जो कह रहे हैं कि अन्ना के आंदोलन का प्रभाव केवल शहरों तथा मध्यम वर्ग तक ही सीमित है।
दोस्तो, फेसबुक से अपने मित्र प्रकाश बेलवाड़ी के एक विचारोत्तेजक लेख का हिन्दी रूपान्तर उसके मूल पाठ के साथ ‘अपना दौर’ के इस अंक में दे रहा हूँ। यह लेख आज के दौर का पूरा आकलन हमारे सामने प्रस्तुत करता है। कृपया इस पर अपने विचार अवश्य जाहिर करें।–बलराम अग्रवाल
साम्राज्यवाद के बीच/ प्रकाश बेलवाड़ी
भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-सैलाब (जन्तर-मन्तर07-8-11 )चित्र : आदित्य अग्रवाल
(अन्ना के लिए उतना नहीं, जितना हममें से उनके लिए जो अन्ना में विश्वास रखना चाहते हैं)
भारत की आज़ादी के वक्त, 14 अगस्त, 1947 की आधी रात को जवाहरलाल नेहरू ने अपने सुप्रसिद्ध भाषण में कहा था—“इस समय, जबकि सारी दुनिया सो रही है, भारत जीवन और आज़ादी का उजाला देख रहा है।”
उनके उद्बोधन पर उँगली उठाने का समय आ गया है। हमें भौगोलिक कल्पनाओं की बात नहीं करनी है। सो कौन रहा था? लंदन में उस समय बीतती गर्मियों की चहल-पहल भरी शाम और न्यूयॉर्क में चिलचिलाती दोपहर थी। जिस उजले जीवन और आजादी का वादा किया गया था—वह कहाँ है?
नेहरू के वंशज और उनके चापलूस अब भ्रष्टाचार के खिलाफ न्याय पाने और एक बेहतर जीवनयापन के लिए—आम आदमी के एकजुट होने की, विरोध दर्ज करने की—आज़ादी को नकार रहे हैं।
नेहरू ने वादा किया था कि “आज के दिन हमारा ध्यान सबसे पहले इस आजादी के चितेरे, हमारे राष्ट्रपिता की ओर जाता है…। आजादी की इस मशाल को हम घनी आँधी या तूफान में कभी भी बुझने नहीं देंगे।”
क्या हुआ? एक आदमी केन्द्र सरकार के घने अंधड़ के खिलाफ राष्ट्रपिता के सिद्धांतों की लड़ाई उनके सिद्धांतों पर चलते हुए लड़ रहा है।
इसका जवाब शायद दूसरे महान् भाषण में है जिसे फ्रेंकलिन डी॰ रूज़वेल्ट ने सन् 1936 में उस वक्त, जब अमरीका गहरे अवसाद से बाहर आ रहा था, दिया था और जिसे ‘प्रारब्ध से मुलाकात’ नाम से जाना जाता है। कुछ पंक्तियाँ देखें—
“हमने सन् 1776 में उस राजनीतिक तानाशाही के चंगुल से, अठारहवीं सदी के उन राजभक्तों से जिन्हें शासकों का वरदहस्त प्राप्त था, छुटकारा पाया। यह तानाशाही शासितों की इच्छा के विरुद्ध उन पर शासन करने का सुख भोग रही थी। यह लोगों को एकजुट होने और अपने विचार प्रकट करने की इजाज़त नहीं देती थी। इसने ईश-पूजा पर रोक लगा दी थी। आम आदमी की सम्पत्ति और आम आदमी की जिन्दगी को इसने शासक-वंश के पंजों की जकड़ में पहुँचाने का धंधा कर रखा था। इसने लोगों को गुलाम बनाया हुआ था।
“इस आधुनिक सभ्यता से अलग अर्थ-पिपासु राजभक्तों ने नये आका गढ़ लिए थे। भौतिक सम्पदा पर नियंत्रण के लिए नये केन्द्र स्थापित किए गये। कार्पोरेशनों, बैंकों और सिक्योरिटियों, इण्डस्ट्री और खेती-बाड़ी की नई मशीनरियों, मजदूरी और पूँजी के नये इस्तेमालों के द्वारा—आकाओं ने अकूत धन कमाया। आधुनिक जीवन का सारा ढाँचा इस राजभक्ति के नीचे दबकर रह गया था।
“यह स्वाभाविक और शायद मानवीय ही था कि इस नये अर्थ-तन्त्र के सुविधाभोगी राजकुमार, जो ताकत के प्यासे थे, सरकार पर नियंत्रण के लिए उसके सामने आ गये।
“आम परिवार की बचत, छोटे व्यवसायियों की पूँजी, बुजुर्गों के लिए निवेश और दूसरे लोगों की पूँजी को एक ओर कर देना—वे कारण थे जिनके चलते नये अर्थ-तन्त्र ने अपनी कब्र आप खोद ली।
“जिन्होंने इस सब की जमीन तैयार की, वे उसका लाभ पाने को, जो उनका अधिकार था, हमारे बीच नहीं हैं। उनकी उपलब्धियों को उनके संघर्ष से अनजान लोगों ने कम आँका।
समूची जनता की सम्पत्ति पर, धन पर, श्रम पर, जीवन पर अधिकार जमाए रखने के लिए अपना ध्यान उन्होंने मुट्ठी-भर लोगों पर केन्द्रित रखा।…
जो बदल चुका है, यह है : हम प्रारब्ध से मुलाकात तय करने को महत्व नहीं दे रहे हैं। या, उससे मुलाकातें—दिल्ली, भुवनेश्वर, हैदराबाद, चेन्नै और बंगलौर के व्यवसाय में, राजनीति में, विलासितापूर्ण क्लबों में, साम्राज्यवादियों के लिए रिजर्व हैं?
यह पुन: संघर्ष का दौर है।
originally posted in english by Mr. Prakash Belawadi on facebook under head 'TRYST WITH DYNASTY':
(Not so much for Anna Hazare, but those of us who need to believe in him)
At India’s hour of birth, towards midnight on Aug 14, 1947, Jawaharlal Nehru said in his famous speech …”when the world sleeps, India will awake to life and freedom.”
The time has come to interrogate his notion. Let’s leave alone the geographical imagination. Who was sleeping? It was a crowded late summer evening in London and bright afternoon in New York. And where is this promised life and freedom?
Nehru’s heirs and their minions are now denying us this – the freedom to assemble, the freedom to protest – against corruption, for justice, for a better life.
Nehru promised in that tryst with destiny – “On this day our first thoughts go to the architect of this freedom, the Father of our Nation… We shall never allow that torch of freedom to be blown out, however high the wind or stormy the tempest.”
So what happened then? Here is a man fighting in the name of the Father of the Nation, adopting the Mahatma’s own tactics against the high wind the Union Government is full of.
“In 1776 we sought freedom from the tyranny of a political autocracy - from the eighteenth-century royalists who held special privileges from the crown. It was to perpetuate their privilege that they governed without the consent of the governed; that they denied the right of free assembly and free speech; that they restricted the worship of God; that they put the average man's property and the average man's life in pawn to the mercenaries of dynastic power; that they regimented the people.
“Out of this modern civilization economic royalists carved new dynasties. New kingdoms were built upon concentration of control over material things. Through new uses of corporations, banks and securities, new machinery of industry and agriculture, of labor and capital - all undreamed of by the Fathers - the whole structure of modern life was impressed into this royal service.
“It was natural and perhaps human that the privileged princes of these new economic dynasties, thirsting for power, reached out for control over government itself.
“The savings of the average family, the capital of the small-businessmen, the investments set aside for old age - other people's money - these were tools which the new economic royalty used to dig itself in.
“Those who tilled the soil no longer reaped the rewards which were their right. The small measure of their gains was decreed by men in distant cities.
“A small group had concentrated into their own hands an almost complete control over other people's property, other people's money, other people's labor - other people's lives. Here is what has changed: we are not keeping appointments and trysts with destiny; rather, the appointments are reserved for dynasties – in businesses, politics and privileged clubs; in Delhi, Bhubaneshwar, Hyderabad, Chennai and Bangalore.
कई माह बाद, यानी कि 23-24 मार्च, 2011 को प्रिय कालीचरण प्रेमी से मिलने जाना शुरू करने के बाद अब अस्पतालों के चक्कर लगाने से मुक्त हुआ हूँ। कभी कोई मित्र तो कभी कोई नाते-रिस्तेदार अस्पतालों में दाखिल होते रहे। कुछ को अस्पताल से छुट्टी मिली, संतोष हुआ; लेकिन कुछ को दुनिया छोड़नी पड़ी, हृदय विलाप कर उठा। कुल मिलाकर मन और तन दोनों अस्वस्थ ही रहे।
15 जुलाई, 2011 के आसपास एस॰एम॰एस॰ आए कि ‘क्या आप पूरे चार दिन—21 से 24 जुलाई तक—अण्णा हजारे के आंदोलन मेंफील्ड सर्वे के लिए वॉलन्टियर कर सकते हैं? मैं उन्हें कोई जवाब नहीं दे सकता था क्योंकि मेरे छोटे साढ़ू नई दिल्ली के ‘सर गंगा राम हॉस्पीटल’ के आई॰सी॰यू॰-4 में मौत से जूझ रहे थे। दुर्भाग्यवश 19 जुलाई को उन्होंने देह त्याग दी।
जलसा शुरू होने से पहले: सर्वश्री डॉ॰ गंगाप्रसाद विमल, राजेन्द्र यादव, डॉ॰ नामवर सिंह और बलराम अग्रवाल
31 जुलाई, 2011 को शाम 5 बजे मेधा प्रकाशन के स्वामी भाई अजय कुमार की कॉल पर मैंने ऐवाने ग़ालिब, नई दिल्ली में ‘हंस’ की 25वीं सालगिरह के जलसे में भाग लिया। वही अपनी गाड़ी में मुझे और मेरे बेटे आदित्य को साथ लेकर गये। काफी उत्सुकता थी, लेकिन वह जलसा अपनी पूर्व-गरिमा के अनुरूप सम्पन्न नहीं हो पाया। अजय नावरिया के मसखरे संचालन ने उसे बहुत ‘चीप’-सा बना दिया। सम्मानित होने वाले व्यक्तियों के बारे में मैंने पहली बार किसी उत्कृष्ट मंच से ऐसी घोषणाएँ सुनीं कि किसको उपहारस्वरूप दो-दो पैंट-कमीज, किसको साड़ी, किसको सूटपीस और किसको शॉल दिया जा रहा है! लोग प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और धनराशि का जिक्र जरूर करते है, लेकिन सम्मान के साथ। आ॰ नामवर जी को भी उन्होंने ‘साहित्यिक पत्रकारिता और हंस’ विषय पर बोलने का उचित माहौल बनाकर नहीं दिया सो वे भी इधर-उधर की हाँकते रहे। कुल मिलाकर निराशा ही हाथ लगी।
दो दिन पूर्व पुन: एस॰एम॰एस॰ था—‘अरविन्द केजरीवाल के साथ सरकारी लोकपाल के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लें। 5 बजे, जन्तर मन्तर। रविवार, 7 अगस्त। जरूर आएँ। सभी को बताएँ।’
दोस्तो, समझ लीजिए कि कई माह बाद पहली बार घर से बाहर 31 जुलाई, 2011 को निकला था और दूसरी बार आज शाम 4 बजे। जन्तर-मन्तर पर माहौल बेहद उत्साहवर्द्धक था। दिल्ली पुलिस केन्द्र सरकार के अन्तर्गत आती है जिसने प्रदर्शन स्थल के दोनों मुहानों को लोहे के भारी-भरकम स्टैंड्स से घेरा हुआ था। जाने-आने के लिए मात्र एक व्यक्ति के योग्य जगह बीच में छोड़ी हुई थी। मैं भीतर गया। जत्थे के जत्थे नौजवान युवक-युवतियाँ हाथों में तिरंगा लहराते हुए गश्त कर रहे थे, बिल्कुल ऐसे जैसे बहुत बड़े पिंजरे में भी शेर अपनी मुक्ति की चाह में चकराता रहता है। 15 अगस्त के दिन पुरानी दिल्ली के सीलमपुर-आकाश में इतनी पतंगे उड़ती नजर नहीं आती होंगी, जितने तिरंगे 7 अगस्त को जन्तर मन्तर के नीले आकाश में अपनी छटा बिखेर रहे थे। ‘वंदे मातरम्’ प्रारम्भ से ही देशभक्तों का प्रिय मंत्र रहा है। वहाँ का सारा वातावरण इस मंत्र अनहद जाप से सराबोर था। उक्त सभा में सर्वश्री अरविन्द केजरीवाल के अलावा रंगनिर्देशक अरविन्द गौड़, केन्द्रीय सूचना आयोग के आयुक्त श्री शैलेश गाँधी, अनेक देशों में भारतीय उच्चायुक्त रह चुकी आ॰ मधु भादुरी एवं अन्य अनेक बुद्धिजीवी व देश और दिल्ली के कोने-कोने से आए जन कार्यकर्ता शामिल थे। शाम को ठीक 7 बजे मशाल जुलूस निकाला गया और संसद में सरकार की ओर से पेश लोकपाल बिल की प्रतियाँ आग के हवाले कर विरोध प्रदर्शन किया गया। उसके पश्चात सभी लोग रुचि भट्टल की हत्या की न्यायिक जाँच के लिए धरने पर बैठे उनके परिजनों के अनुरोध पर ‘कैंडिल मार्च’ में शामिल हुए और इण्डिया गेट तक गये। इतना अनुशासित विरोध प्रदर्शन देखना और अपने-आप को उसका हिस्सा बनते पाना रोमांच प्रदान करता है। अपने अब तक के जीवन में विभागीय हड़तालों में तो कई बार बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। वेतन भी कटवाया। लेकिन किसी राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन में मैंने पहली बार शिरकत की—उम्र के 59वें वर्ष में। अच्छे काम जब शुरू हों तभी अच्छे लगते हैं। ‘अपना दौर’ के इस अंक में प्रस्तुत हैं वहाँ के कुछ चित्र—
मैं अण्णा हजारे हूँ--शक्लो-सूरत से न सही मन और मन्तव्य से पूरी तरह
सरकारी लोकपाल यानी होलिका-दहन
आंदोलन समर्थकों ने तिरंगों से आसमान को जैसे पाट ही डाला हो
'सरकारी लोकपाल धोखा है' और 'वंदे मातरम् ' की उच्च ध्वनि के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराते युवा
अण्णा हजारे की अगुआई में मंचस्थ आंदोलनकर्ता
विरोध प्रदर्शन में स्त्री-पुरुष, विकलांग और वृद्ध सभी शामिल हुए
बेशक, डॉक्टर भी इन्सान ही होता है। वह भी आम आदमी की तरह शारीरिक और मानसिक रुग्णता का शिकार हो सकता है।
चित्र : बलराम अग्रवाल
हुआ यों कि हंस के मई 2011 में छपी एक ‘लघुकथा’ पढ़ी। उसका कथानक लगभग वैसा था जैसे को केन्द्र में रखकर मैं एक कहानी लिखने की योजना कई माह से बना रहा था। यद्यपि ट्रीटमेंट की दृष्टि से भिन्नता थी, फिर भी उक्त लघुकथा को पढ़कर मैंने उसे न लिखना ही तय किया, यह सोचकर कि कहानी पर पूर्व-प्रकाशित किसी रचना से प्रेरित होने का आरोप न लगे। मैं यों भी कहानियाँ लिखता ही कब हूँ!
अब, आप इसे मेरा अव्यावहारिक होना समझिए या जरूरत से ज्यादा मूर्ख या चालाक होना(इस मूर्खता या चालाकी का पता व्यक्ति को स्वयं नहीं चलता है) कि मैंने ‘हंस’ में छपी उक्त लघुकथा के लेखक को फोन पर बधाई दे दी और अपनत्व के नाते यह भी बता दिया कि इसी विषय को केन्द्र में रखकर जिस कहानी की मैं योजना बना रहा था, वह अब नहीं लिखी जा सकेगी। और-भी बहुत-सी बातें, जो एक ही विधा के लेखकों के बीच सामान्यत: होती हैं, हुईं।
इस बातचीत के चार-छ: दिन बाद ‘पहली लघुकथा’, ‘पहला लघुकथाकार’, ‘कहानी व लघुकथा के मध्य विभाजन बिंदु’ आदि जैसे शोधार्थियों द्वारा बार-बार पूछे जाने वाले कुछ सवालों के जवाबों को एक लेख के रूप में व्यक्त कर मैंने उनकी पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज दिया। गलती शायद यह की कि यह पहल मैंने अपनी ओर से कर दी, लेख-आदि माँगने के उनके अनुरोध का इंतज़ार नहीं किया। बहरहाल, लेख मिल जाने पर उन्होंने उसकी प्राप्ति की सूचना देने का मैत्रीभाव निभाया। नमस्कार आदि औपचारिकताओं के बाद बात यों शुरू की:
“लेख कुछ एम॰ए॰-शैम॰ए॰ टाइप का है!” वह बोले। मैं चौंका। मुझे याद आया कि एक बार उन्होंने बात करते-करते यह टिप्पणी भी की थी कि लोग ‘कहानी’ की आलोचना वाले लेखों में ‘लघुकथा’ शब्द फिट करके अपने नाम से नये-नये लेख लिख रहे हैं। बेशक, यह बात तो स्वयं मैंने भी कुछेक लेखों पर सही पाई थी। और यह बात न केवल लघुकथा-आलोचना बल्कि हर विधा की आलोचना के कुछेक लेखों पर लागू हो सकती है क्योंकि पहली बात तो यह कि आलोचना या समीक्षा लिखने वाले सभी लोग मौलिक चिन्तक नहीं होते; दूसरी यह कि मौलिक चिन्तक भी कुछेक बिन्दुओं पर अन्य चिन्तकों से एकरूपता रखते हैं। लेकिन लेख अथवा चिन्तन का अमौलिक होना अलग बात है और स्तरहीन अथवा सामान्य स्तर का होना अलग। सभी जानते हैं कि अकादमिक स्तर के सवाल आम तौर पर फ्रेम-वर्क जैसे होते हैं और उनके उत्तर भी कमोबेश वैसे ही होते हैं।
“इधर आपकी एक लघुकथा छपी है।” वह आगे बोले।
“किसमें?” मैंने पूछा।
“यह पश्चिम बंगाल से छपनेवाला एक आठ-पेजी अखबार-सा है…”
“नई दिशाएँ?”
“हाँ-हाँ।” वह बोले।
“पता नहीं।” मैंने कहा। ‘नई दिशाएँ’ पत्र का उक्त अंक मुझे वस्तुत: तब तक मिला नहीं था। अब तक भी नहीं मिला है।
“इसमें आपकी ‘बीती सदी के चोंचले’ छपी है।” उन्होंने कहा। फिर बजाय यह बताने के कि ‘बीती सदी के चोंचले’ उन्हें कैसी लगी, उन्होंने बताया,“इस सब्जेक्ट पर काफी साल पहले मैंने भी एक लघुकथा लिख रखी है।” यह सुनकर मेरा चौंकना स्वाभाविक था क्योंकि जब से लेखन शुरू किया है, तब से एक भी लघुकथा, कहानी या कविता मैंने उधार के विषय पर नहीं लिखी, हमेशा मौलिक चिन्तन ही किया।
“उसमें क्या था?” मैंने पूछा।
“उसमें कुछ ऐसा था कि एक मन्दिर की सीढ़ियों पर कोई असामाजिक तत्व गाय का खून-मांस डाल गया था। पुजारी जल्दी-जल्दी उस स्थान को धोता है और उपस्थित लोगों से कहता है कि किसी को बताना नहीं।” उन्होंने बताया।
“इस लघुकथा से मेरी लघुकथा का ट्रीटमेंट तो एकदम भिन्न है,” मैंने कहा,“एक-जैसी लगती हैं लेकिन स्थितियाँ भी अलग हैं।”
“हाँ, ट्रीटमेंट भी थोड़ा भिन्न है…” किंचित संकोच के साथ वे बोले,“मैं तो ऐसे ही कह रहा था। दरअसल हम सब एक-जैसे सूचना-तन्त्र में रहते हैं इसलिए विचारों और कथानकों में थोड़ी-बहुत समानता का आ जाना आम बात है।”
अब, अगर मैं यह कहता कि उनकी कही हुई यह बात तो एक दशक पहले अपने एक लेख में मैं कह चुका हूँ, तो कैसा रहता? अभी हाल-फिलहाल की बात है—गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की 150वीं जयन्ती के अवसर पर एक कार्यक्रम में बोलते हुए सुप्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह ने कहा था—“टैगोर को भगवान न बनाएँ, इन्सान ही रहने दें।” उनसे दो दिन पहले ही साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित ‘प्रेमचंद कहानी रचनावली’ के लोकार्पण के अवसर पर उसके संपादक डॉ॰ कमल किशोर गोयनका ने कहा था—“प्रेमचंद को इन्सान ही रहने दें, देवता न बनाएँ।” 1997 में ‘प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ’ की भूमिका मैंने ‘प्रेमचंद निहायत आम आदमी हैं, अवतार नहीं’ शीर्षक से लिखी थी। नि:संदेह उससे पूर्व भी अनेक विचारकों ने ऐसे विचार व्यक्त कर रखे होंगे। तो क्या हम सब के सब एक दूसरे के विचारों की चोरी कर रहे हैं?
“आपकी एक और लघुकथा है…” वह कुछ याद करते-से बोले,“वैसी भी मैंने काफी साल पहले लिखी थी।”
“कौन-सी?” मैं पुन: चौंका।
“वह…जिसमें एक माँ लड़की को थाने ले जाने की बात करती है…” वह बोले।
“बचावघर” मैंने कहा।
“हाँ, यह मेरी एक पुरानी लघुकथा से मिलती है…उसमें…” इससे आगे उन्होंने क्या-क्या कहा मैं सुनकर भी समझ नहीं पाया क्योंकि मेरे लिए यह हैरानी की बात थी कि मैं आज से नहीं कई दशकों से अमौलिक लेखन कर रहा हूँ। हालाँकि मैं आज भी अपनी रचनाओं पर उनके लेखन-प्रकाशन संबंधी नोट नहीं लगा पाता, लगा देता हूँ तो सहेज नहीं पाता। इसलिए पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि मेरी कौन-सी रचना कब लिखी गई और पहले-पहल कहाँ छपी। ‘बचावघर’, जहाँ तक मुझे याद है, मैंने 1984-85 के दौरान लिखी होगी।
हालाँकि अन्य लेखकों की भी अनेक लघुकथाओं को वे अपनी पूर्व-प्रकाशित रचना से प्रभावित होकर लिखने की बात बताते रहते थे। पुस्तक-समीक्षा के मामले में भी मित्र-विशेष के बारे में उनका यह कहना कि ‘आठ-दस पत्रिकाओं से मैटर उठाकर समीक्षा लिख मारता है’ मैं कई बार सुन चुका था। इस बार हमला मुझ पर था, वह भी पीठ-पीछे नहीं, सीधे मुझी से। मुझे लगता है कि ‘हंस’ में छपी उनकी रचना को देखकर प्रशंसा करने और निरुद्देश्य ही स्पष्ट कहने की जो दरियादिली मैंने दिखाई थी, उसने उनको कुछ ‘सच’ उगलने के लिए प्रोत्साहित कर दिया। सोचा होगा कि जब यह एक अनलिखी रचना के बारे में स्वयं अपना स्पष्टीकरण दे रहा है तो इसकी कुछ लिखित और प्रकाशित रचनाओं के बारे में अपनी ओर से क्यों न बता दिया जाए?
जब से मित्रवर से बात हुई है, अपने लेखन और चिन्तन की अमौलिकता व स्तरहीनता को लेकर चिन्तित हो गया हूँ।
कालीचरण प्रेमी : विभागीय संवेदनहीनता ने जिन्हें असमय ही मार डाला
भारतीय समाज का यह अजीबोगरीब सच है। कल, रविवार 24 अप्रैल, 2011 की सुबह 07बजकर 40मिनट पर कर्नाटक के पुट्टपर्णी में हर प्रकार से सेवित परमपूज्य सत्य साईं बाबा ने शरीर त्यागा और इधर, उनके ठीक 18 घंटे बाद, रात 01बजकर 40मिनट पर उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद में ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी कालीचरण प्रेमी अपने विभाग से अनुमोदित होकर आने वाली मेडिकल सहायता राशि की फाइल का 33 दिनों तक इन्तजार करके अन्त्तत: स्वर्ग सिधार गये। गाजियाबाद में हिण्डन नदी के तटवर्ती मोक्षधाम श्मशान घाट में आज 25 अप्रैल, 2011 को सुबह लगभग 11बजे अग्नि को समर्पित उनका शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो गया। उनकी अन्तिम यात्रा में नगर के अनेक डाक-कर्मियों के अलावा सुप्रसिद्ध गीतकार डॉ॰ कुँअर बेचैन, वरिष्ठ उपन्यासकार राकेश भारती, व्यंग्यकार सुभाष चन्दर, कथा-सागर के संपादक सुरंजन, कथाकार ओमप्रकाश कश्यप, महेश सक्सेना, सुरेन्द्र अरोड़ा, सुरेन्द्र गुप्ता, बलराम अग्रवाल आदि अनेक लेखक व पत्रकार शामिल थे। रुड़की से ‘अविराम’ के संपादक उमेश महादोषी, इन्दौर से उपन्यासकार नन्दलाल भारती व कथाकार सुरेश शर्मा, दिल्ली से लघुकथा डॉट कॉम के सम्पादक व वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, ‘नुक्कड़’ व अनेक हिंदी ब्लॉग्स के सम्पादक अविनाश वाचस्पति, ‘सेतु साहित्य’ के सम्पादक सुभाष नीरव व अनेक साहित्यकारों ने कालीचरण प्रेमी के देहांत पर शोक जताया है तथा अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए हैं। ईश्वर श्री कालीचरण प्रेमी की पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करे व शोक-संतप्त परिवार को यह वज्रपात सहने की शक्ति प्रदान करे।
कालीचरण प्रेमी पुन: आई॰सी॰यू॰ में शिफ्ट कर दिये गये हैं। उनके शरीर का दायाँ हिस्सा पक्षाघात का शिकार हो चुका है। नाक से खून बहने लगा है। उनका जीवन बचाने की डॉक्टरों की कोशिशें जारी हैं। उन्हें कितने ही यूनिट पैलेट्स और चढ़ाए जा चुके हैं और डाक-विभाग से उनको मेडिकल सहायता-राशि अभी तक भी नहीं मिल पाई है। इस दुष्कर्म की किन शब्दों में भर्त्स्ना की जाय--समझ में नहीं आ रहा।
आज(दिनांक 20-4-2011) शाम करीब आठ बजे भाई सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा का फोन आया था। प्रेमी जी की पत्नी के हवाले से उन्होंने मुझे बताया कि ‘वह अब पहचान भी नहीं रहे हैं।’ अरोड़ा जी ने मुझसे कहा कि वे अपने घर से हॉस्पिटल के लिए निकल रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि आप पहुँचिए, मैं भी आता हूँ।
रोगी की हालत की गम्भीरता के मद्देनजर आई॰सी॰यू॰ स्टाफ ने पाँच मिनट के लिए उनके निकट जाने की अनुमति मुझे दे दी। मैं लगभग 8॰55 पर आई॰सी॰यू॰ में कालीचरण के बिस्तर तक पहुँचा। वह बेहाल थे और गहरी साँसें ले रहे थे। मैं उनके बायीं ओर जा खड़ा हुआ। उस बेहाली में ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे पहचानकर पलंग की रेलिंग पर रखे मेरे हाथ पर अपना बायाँ हाथ रख दिया। मैंने तुरन्त अपनी दोनों हथेलियों में उनके हाथ को थाम लिया और नौ बजे तक यों ही खड़ा रहा। कालीचरण को नि:संदेह आत्मीय स्पर्श की आवश्यकता थी। मित्रों, परिवार जनों के इस आत्मीय स्पर्श और लिखते व पढ़ते रहने की जिजीविषा के बल पर ही कालीचरण करीब चार साल तक अपने-आप को ब्लड कैंसर से लड़ने योग्य बनाए रह सके; लेकिन—‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:…’। सही नौ बजे स्टाफ नर्स ने मिलने का मेरा समय समाप्त होने का ध्यान दिलाते हुए आई॰सी॰यू॰ से बाहर चले जाने को कह दिया। मैं कालीचरण से कुछ कह नहीं सका, जबकि इशारे से कुछ कहना अवश्य चाहिए था। उस इशारे का तात्पर्य कालीचरण समझ अवश्य जाते क्योंकि पहले इस बारे में हम विमर्श कर चुके थे। मुझे दु:ख है कि मैं उन्हें कुछ समझाए बिना चुपचाप बाहर निकल आया।
उसी दौरान सुरेन्द्र अरोड़ा जी भी पहुँच गये और 9॰30 के लगभग वे भी कालीचरण को देखकर आये। इस बीच कालीचरण प्रेमी की हालत में कुछ-और गिरावट आ चुकी थी—उनके कथन से मुझे ऐसा लगा।
दोस्तो, कालीचरण प्रेमी की शारीरिक स्थिति के मद्देनजर हॉस्पिटल प्रशासन उनके परिवार पर दबाव बना रहा है कि वे उनके इलाज की रकम तुरन्त जमा कराएँ। जैसाकि दिनांक 14 अप्रैल 2011 की पोस्ट में हमने लिखा था—केन्द्रीय डाककर्मी होने के नाते कालीचरण प्रेमी का इलाज सी॰जी॰एच॰एस॰ के पैनल में दर्ज शान्ति मुकुन्द हॉस्पिटल, दिल्ली में चल रहा है। और उनके डॉक्टरों द्वारा उनके इलाज में खर्च होने वाली अनुमानित राशि की माँग वाली फाइल(जिसका नम्बर E/Kalicharan Premi/Medical Advance/2010-11 है) दिनांक 23 मार्च, 2011 से यानी गत लगभग एक माह से गाजियाबाद, नोएडा, लखनऊ और दिल्ली के चक्कर काट रही है। सम्बन्धित अधिकारी कितने संवेदनहीन हो चुके है, यह इसका घिनौना और क्रूरतम उदाहरण है।
शान्ति मुकुन्द हॉस्पीटल, दिल्ली के कैंसर वार्ड में हताश-निराश कालीचरण प्रेमी
श्रीयुत कालीचरण प्रेमीपिछ्ले चार वर्षों से ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और इन दिनों शान्ति मुकुन्द अस्पताल, दिल्ली में तृतीय तल स्थित कैंसर वार्ड के कमरा नं॰ 3029 में पड़े हैं। वह भारतीय डाक-विभाग में सेवारत हैं और इन दिनों प्रधान डाकघर गाजियाबाद के एक उपडाकघर ‘कविनगर’ में बतौर डाक-सहायक कार्यरत हैं।
स्वास्थ्य में अचानक आई गिरावट के कारण गत 22 मार्च, 2011 को उन्हें दिल्ली में प्रीत विहार चौराहे
शा॰मु॰ हॉस्पीटल द्वारा जारी भर्ती-कार्ड
के निकट(प्र॰ डा॰ कृष्णनगर, दिल्ली के सामने दीपक मेमोरियल अस्पताल के बराबर में) स्थित शान्ति मुकुन्द हॉस्पिटल के कैंसर वार्ड में लाया गया, जो कि सी॰जी॰एच॰एस॰ के पैनल में है। उनका इलाज कर रहे डॉ॰ समीर खत्री ने उन्हें तुरन्त आई॰सी॰यू॰ में भर्ती किया और लगातार गिर रहे उनके पैलेट्स पर काबू पाया।
ध्यातव्य है कि कालीचरण प्रेमी अत्यन्त गरीब परिवार के व्यक्ति हैं। तिस पर ब्लड कैंसर जैसी मँहगे इलाज वाली जानलेवा बीमारी ने न केवल उनके स्वास्थ्य बल्कि बचे-खुचे आर्थिक आधार को भी समाप्त कर दिया है और वे कर्ज में गहरे डूब गये हैं।
उनका कहना है कि गाजियाबाद के साहित्यिक मित्रों से ही नहीं, स्थानीय विभागीय मित्रों व अधिकारियों से भी उन्हें लगातार यथोचित मानसिक सहयोग मिलता रहा है; लेकिन इस बार जब से, यानी 23 मार्च 2011 को उनके इलाज हेतु शान्ति मुकुन्द अस्पताल द्वारा माँगी गई अग्रिम राशि की फाइल (जिसका नम्बर E/Kalicharan Premi/Medical Advance/2010-11 है,) अनुमोदन हेतु विभाग के उच्चाधिकारियों को भेजी गई है तब से यहाँ-वहाँ चक्कर काट रही है और किसी भी तरह का कोई सन्तोषजनक उत्तर उन्हें या उनका इलाज कर रहे अस्पताल को नहीं मिला है। यों शान्ति मुकुन्द अस्पताल प्रशासन भी उनका इलाज कर ही रहा है, लेकिन अग्रिम राशि के अनुमोदन की सूचना यह समाचार लिखे जाने तक भी न मिलने की चिन्तास्वरूप इस दौरान कई बार अस्पताल में ही उनके पैलेट्स गिर चुके हैं तथा आनन-फानन में उनके लिए आवश्यक पैलेट्स का इन्तजाम करके उन्हें चढ़ाया जा चुका है। यह सब खर्चा उनके निर्धन परिवार को किसी न किसी तरह कर्जा लेकर करना पड़ रहा है। साहित्यिक और विभागीय मित्रों की सान्त्वना तथा परिवारजनों के श्रम की बदौलत कालीचरण प्रेमी का मनोबल बढ़ा हुआ है, लेकिन ब्लड कैंसर के इलाज के लिए अग्रिम राशि का अनुमोदन प्राप्त होने में हो चुकी अपरिहार्य देरी ने उनके मनोबल को तोड़ डाला है। वह कहने लगे हैं कि उन्हें कैंसर तो जब मारेगा तब मारेगा ही, इलाज के लिए विभाग से समय पर न मिलने वाला आर्थिक अनुमोदन दिन-ब-दिन अभी से मार रहा है।
कालीचरण प्रेमी का ही नहीं हमारा भी कहना है कि यदि ब्लड कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के रोगी के इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन हेतु डाक विभाग का यह रूप और रवैया है तो आम बीमारी से त्रस्त रोगियों को मिलने वाली सहायता का क्या हाल होता होगा, इसका अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि मृदुल स्वभाव के कालीचरण प्रेमी डाक-विभाग की सेवा के साथ-साथ हिंदी-साहित्य की सेवा भी पिछले 30-32 वर्षों से लगातार कर रहे हैं। वे अनेक पत्रिकाओं के अवैतनिक साहित्य
कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित लघुकथा संकलन 'अंधा मोड़'
संपादक रहे हैं। उनकी लघुकथाओं का पहला लघुकथा संग्रह ‘कीलें’ सन् 2002 में आया था तथा दूसरा लघुकथा संग्रह ‘तवा’ जिसे उन्होंने विश्वभर के कैंसर पीड़ितों को समर्पित किया है, शीघ्र प्रकाश्य है। ‘तवा’ के प्रकाशन हेतु आर्थिक सहायता ‘सुलभ इंटरनेशनल’ ने प्रदान की है। सन् 2010 में प्रकाशित उनके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन ‘अंधा मोड़’ खासा चर्चित रहा है। संदर्भ हेतु लिंक करें—http://jangatha.blogspot.com दिसम्बर 2010)
इस समाचार के माध्यम से अपील की जा रही है कि केन्द्र सरकार का कर्मचारी होने के नाते डाक-कर्मी व लघुकथाकार श्री कालीचरण प्रेमी की जो भी सम्भव सहायता उनके इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन की दिशा में हो सकती हो, कृपया वह करें।
'जनगाथा', 'कथायात्रा' एवं 'लघुकथा-वार्ता' के माध्यम से लघुकथा-साहित्य आप तक पहुँचाने का प्रयास है। 'अपना दौर' कथा-साहित्य से इतर चिन्तन व अनुभवों को अभिव्यक्ति देने का प्रयास है। 'हिन्दी लेखक' साहित्य एवं कलाओं में रचनात्मक योगदान देनेवाले हस्ताक्षरों का सचित्र परिचय।
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