सोमवार, 25 अप्रैल 2011

खत्म हुई जद्दोजहद : स्वर्ग सिधार गये कालीचरण प्रेमी


कालीचरण प्रेमी : विभागीय संवेदनहीनता ने जिन्हें असमय ही मार डाला
भारतीय समाज का यह अजीबोगरीब सच है। कल, रविवार 24 अप्रैल, 2011 की सुबह 07बजकर 40मिनट पर कर्नाटक के पुट्टपर्णी में हर प्रकार से सेवित परमपूज्य सत्य साईं बाबा ने शरीर त्यागा और इधर, उनके ठीक 18 घंटे बाद, रात 01बजकर 40मिनट पर उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद में ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी कालीचरण प्रेमी अपने विभाग से अनुमोदित होकर आने वाली मेडिकल सहायता राशि की फाइल का 33 दिनों तक इन्तजार करके अन्त्तत: स्वर्ग सिधार गये। गाजियाबाद में हिण्डन नदी के तटवर्ती मोक्षधाम श्मशान घाट में आज 25 अप्रैल, 2011 को सुबह लगभग 11बजे अग्नि को समर्पित उनका शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो गया। उनकी अन्तिम यात्रा में नगर के अनेक डाक-कर्मियों के अलावा सुप्रसिद्ध गीतकार डॉ॰ कुँअर बेचैन, वरिष्ठ उपन्यासकार राकेश भारती, व्यंग्यकार सुभाष चन्दर, कथा-सागर के संपादक सुरंजन, कथाकार ओमप्रकाश कश्यप, महेश सक्सेना, सुरेन्द्र अरोड़ा, सुरेन्द्र गुप्ता, बलराम अग्रवाल आदि अनेक लेखक व पत्रकार शामिल थे। रुड़की से अविराम के संपादक उमेश महादोषी, इन्दौर से उपन्यासकार नन्दलाल भारती व कथाकार सुरेश शर्मा, दिल्ली से लघुकथा डॉट कॉम के सम्पादक व वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, नुक्कड़ व अनेक हिंदी ब्लॉग्स के सम्पादक अविनाश वाचस्पति, सेतु साहित्य के सम्पादक सुभाष नीरव व अनेक साहित्यकारों ने कालीचरण प्रेमी के देहांत पर शोक जताया है तथा अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए हैं। ईश्वर श्री कालीचरण प्रेमी की पवित्र आत्मा को शांति प्रदान करे व शोक-संतप्त परिवार को यह वज्रपात सहने की शक्ति प्रदान करे।

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी व साहित्यकार कालीचरण प्रेमी की जीवन हेतु जद्दोजहद : पुन: आई॰सी॰यू॰ में भर्ती


यह लगभग हृदय-विदारक समाचार है।

कैंसर वार्ड के बिस्तर पर असहाय कालीचरण प्रेमी

कालीचरण प्रेमी पुन: आई॰सी॰यू॰ में शिफ्ट कर दिये गये हैं। उनके शरीर का दायाँ हिस्सा पक्षाघात का शिकार हो चुका है। नाक से खून बहने लगा है। उनका जीवन बचाने की डॉक्टरों की कोशिशें जारी हैं। उन्हें कितने ही यूनिट पैलेट्स और चढ़ाए जा चुके हैं और डाक-विभाग से उनको मेडिकल सहायता-राशि अभी तक भी नहीं मिल पाई है। इस दुष्कर्म की किन शब्दों में भर्त्स्ना की जाय--समझ में नहीं आ रहा।
आज(दिनांक 20-4-2011) शाम करीब आठ बजे भाई सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा का फोन आया था। प्रेमी जी की पत्नी के हवाले से उन्होंने मुझे बताया कि वह अब पहचान भी नहीं रहे हैं। अरोड़ा जी ने मुझसे कहा कि वे अपने घर से हॉस्पिटल के लिए निकल रहे हैं। मैंने उनसे कहा कि आप पहुँचिए, मैं भी आता हूँ।
रोगी की हालत की गम्भीरता के मद्देनजर आई॰सी॰यू॰ स्टाफ ने पाँच मिनट के लिए उनके निकट जाने की अनुमति मुझे दे दी। मैं लगभग 8॰55 पर आई॰सी॰यू॰ में कालीचरण के बिस्तर तक पहुँचा। वह बेहाल थे और गहरी साँसें ले रहे थे। मैं उनके बायीं ओर जा खड़ा हुआ। उस बेहाली में ही उनकी नजर मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे पहचानकर पलंग की रेलिंग पर रखे मेरे हाथ पर अपना बायाँ हाथ रख दिया। मैंने तुरन्त अपनी दोनों हथेलियों में उनके हाथ को थाम लिया और नौ बजे तक यों ही खड़ा रहा। कालीचरण को नि:संदेह आत्मीय स्पर्श की आवश्यकता थी। मित्रों, परिवार जनों के इस आत्मीय स्पर्श और लिखते व पढ़ते रहने की जिजीविषा के बल पर ही कालीचरण करीब चार साल तक अपने-आप को ब्लड कैंसर से लड़ने योग्य बनाए रह सके; लेकिन—‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:…। सही नौ बजे स्टाफ नर्स ने मिलने का मेरा समय समाप्त होने का ध्यान दिलाते हुए आई॰सी॰यू॰ से बाहर चले जाने को कह दिया। मैं कालीचरण से कुछ कह नहीं सका, जबकि इशारे से कुछ कहना अवश्य चाहिए था। उस इशारे का तात्पर्य कालीचरण समझ अवश्य जाते क्योंकि पहले इस बारे में हम विमर्श कर चुके थे। मुझे दु:ख है कि मैं उन्हें कुछ समझाए बिना चुपचाप बाहर निकल आया।
उसी दौरान सुरेन्द्र अरोड़ा जी भी पहुँच गये और 9॰30 के लगभग वे भी कालीचरण को देखकर आये। इस बीच कालीचरण प्रेमी की हालत में कुछ-और गिरावट आ चुकी थीउनके कथन से मुझे ऐसा लगा।
दोस्तो, कालीचरण प्रेमी की शारीरिक स्थिति के मद्देनजर हॉस्पिटल प्रशासन उनके परिवार पर दबाव बना रहा है कि वे उनके इलाज की रकम तुरन्त जमा कराएँ। जैसाकि दिनांक 14 अप्रैल 2011 की पोस्ट में हमने लिखा थाकेन्द्रीय डाककर्मी होने के नाते कालीचरण प्रेमी का इलाज सी॰जी॰एच॰एस॰ के पैनल में दर्ज शान्ति मुकुन्द हॉस्पिटल, दिल्ली में चल रहा है। और उनके डॉक्टरों द्वारा उनके इलाज में खर्च होने वाली अनुमानित राशि की माँग वाली फाइल(जिसका नम्बर E/Kalicharan Premi/Medical Advance/2010-11 है) दिनांक 23 मार्च, 2011 से यानी गत लगभग एक माह से गाजियाबाद, नोएडा, लखनऊ और दिल्ली के चक्कर काट रही है। सम्बन्धित अधिकारी कितने संवेदनहीन हो चुके है, यह इसका घिनौना और क्रूरतम उदाहरण है।
--बलराम अग्रवाल
साथ में अपीलकर्त्ता:सुभाष नीरव
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
ओमप्रकाश कश्यप
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
अविनाश वाचस्पति
नन्दलाल भारती
एवं अन्य साहित्यिक मित्र

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

ब्लड कैंसर से पीड़ित डाक-कर्मी व साहित्यकार कालीचरण प्रेमी की जीवन हेतु जद्दोजहद


शान्ति मुकुन्द हॉस्पीटल, दिल्ली के कैंसर वार्ड में हताश-निराश कालीचरण प्रेमी 

श्रीयुत कालीचरण प्रेमी पिछ्ले चार वर्षों से ब्लड कैंसर से पीड़ित हैं और इन दिनों शान्ति मुकुन्द अस्पताल, दिल्ली में तृतीय तल स्थित कैंसर वार्ड के कमरा नं॰ 3029 में पड़े हैं। वह भारतीय डाक-विभाग में सेवारत हैं और इन दिनों प्रधान डाकघर गाजियाबाद के एक उपडाकघर कविनगर में बतौर डाक-सहायक कार्यरत हैं।
स्वास्थ्य में अचानक आई गिरावट के कारण गत 22 मार्च, 2011 को उन्हें दिल्ली में प्रीत विहार चौराहे

शा॰मु॰ हॉस्पीटल द्वारा जारी भर्ती-कार्ड

के निकट(प्र॰ डा॰ कृष्णनगर, दिल्ली के सामने दीपक मेमोरियल अस्पताल के बराबर में) स्थित शान्ति मुकुन्द हॉस्पिटल के कैंसर वार्ड में लाया गया, जो कि सी॰जी॰एच॰एस॰ के पैनल में है। उनका इलाज कर रहे डॉ॰ समीर खत्री ने उन्हें तुरन्त आई॰सी॰यू॰ में भर्ती किया और लगातार गिर रहे उनके पैलेट्स पर काबू पाया।
ध्यातव्य है कि कालीचरण प्रेमी अत्यन्त गरीब परिवार के व्यक्ति हैं। तिस पर ब्लड कैंसर जैसी मँहगे इलाज वाली जानलेवा बीमारी ने न केवल उनके स्वास्थ्य बल्कि बचे-खुचे आर्थिक आधार को भी समाप्त कर दिया है और वे कर्ज में गहरे डूब गये हैं।
उनका कहना है कि गाजियाबाद के साहित्यिक मित्रों से ही नहीं, स्थानीय विभागीय मित्रों व अधिकारियों से भी उन्हें लगातार यथोचित मानसिक सहयोग मिलता रहा है; लेकिन इस बार जब से, यानी 23 मार्च 2011 को उनके इलाज हेतु शान्ति मुकुन्द अस्पताल द्वारा माँगी गई अग्रिम राशि की फाइल (जिसका नम्बर E/Kalicharan Premi/Medical Advance/2010-11 है,) अनुमोदन हेतु विभाग के उच्चाधिकारियों को भेजी गई है तब से यहाँ-वहाँ चक्कर काट रही है और किसी भी तरह का कोई सन्तोषजनक उत्तर उन्हें या उनका इलाज कर रहे अस्पताल को नहीं मिला है। यों शान्ति मुकुन्द अस्पताल प्रशासन भी उनका इलाज कर ही रहा है, लेकिन अग्रिम राशि के अनुमोदन की सूचना यह समाचार लिखे जाने तक भी न मिलने की चिन्तास्वरूप इस दौरान कई बार अस्पताल में ही उनके पैलेट्स गिर चुके हैं तथा आनन-फानन में उनके लिए आवश्यक पैलेट्स का इन्तजाम करके उन्हें चढ़ाया जा चुका है। यह सब खर्चा उनके निर्धन परिवार को किसी न किसी तरह कर्जा लेकर करना पड़ रहा है। साहित्यिक और विभागीय मित्रों की सान्त्वना तथा परिवारजनों के श्रम की बदौलत कालीचरण प्रेमी का मनोबल बढ़ा हुआ है, लेकिन ब्लड कैंसर के इलाज के लिए अग्रिम राशि का अनुमोदन प्राप्त होने में हो चुकी अपरिहार्य देरी ने उनके मनोबल को तोड़ डाला है। वह कहने लगे हैं कि उन्हें कैंसर तो जब मारेगा तब मारेगा ही, इलाज के लिए विभाग से समय पर न मिलने वाला आर्थिक अनुमोदन दिन-ब-दिन अभी से मार रहा है।
कालीचरण प्रेमी का ही नहीं हमारा भी कहना है कि यदि ब्लड कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के रोगी के इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन हेतु डाक विभाग का यह रूप और रवैया है तो आम बीमारी से त्रस्त रोगियों को मिलने वाली सहायता का क्या हाल होता होगा, इसका अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है। 
उल्लेखनीय है कि मृदुल स्वभाव के कालीचरण प्रेमी डाक-विभाग की सेवा के साथ-साथ हिंदी-साहित्य की सेवा भी पिछले 30-32 वर्षों से लगातार कर रहे हैं। वे अनेक पत्रिकाओं के अवैतनिक साहित्य

कालीचरण प्रेमी द्वारा संपादित लघुकथा संकलन 'अंधा मोड़'

संपादक रहे हैं। उनकी लघुकथाओं का पहला लघुकथा संग्रह कीलें सन् 2002 में आया था तथा दूसरा लघुकथा संग्रह तवा जिसे उन्होंने विश्वभर के कैंसर पीड़ितों को समर्पित किया है, शीघ्र प्रकाश्य है। तवा के प्रकाशन हेतु आर्थिक सहायता सुलभ इंटरनेशनल ने प्रदान की है। सन् 2010 में प्रकाशित उनके द्वारा संपादित लघुकथा संकलन अंधा मोड़ खासा चर्चित रहा है। संदर्भ हेतु लिंक करें—http://jangatha.blogspot.com  दिसम्बर 2010)
इस समाचार के माध्यम से अपील की जा रही है कि केन्द्र सरकार का कर्मचारी होने के नाते डाक-कर्मी व लघुकथाकार श्री कालीचरण प्रेमी की जो भी सम्भव सहायता उनके इलाज हेतु अग्रिम राशि के अनुमोदन की दिशा में हो सकती हो, कृपया वह करें।
बलराम अग्रवाल
सुभाष नीरव
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
ओमप्रकाश कश्यप
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
एवं अन्य साहित्यिक मित्र

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

क्रिकेट का महायुद्ध यानी ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ का नया संस्करण/ बलराम अग्रवाल

दोस्तो, इस लेख को मैं क्रिकेट विश्वकप 2011 के फाइनल से दो घंटे से भी कम समय पहले पोस्ट कर रहा हूँ। मैच का परिणाम जो भी हो, हमारी मानसिकता में इस विश्वकप के दौरान एक नकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया गया है जो अत्यन्त घिनौना और पीड़ादायक है।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा। मात्र इसलिए राष्ट्रगीत की दौड़ से बाहर हो गया बताते हैं कि इसमें विश्वविजय का सपना था जो हमारे न सिर्फ कायिक बल्कि वैचारिक अहिंसक चरित्र और पंचशील सिद्धांत के खिलाफ था। अब, जब से क्रिकेट विश्वकप 2011 का ताप बढ़ने लगा है, राजनीतिक गलियारों में बहुविधि पालित पंचशील सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ती नजर आ रही हैं। वस्तुत: तो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जिस आध्यात्मिक सिद्धांत या नैतिक सद्वाक्य की धज्जियाँ न उड़ा दें, उसे परम सौभाग्यशाली ही समझना-मानना चाहिए।
सेमीफाइनल से पहले भारत-पाक टीमों के बीच होने वाले मैच को करगिल युद्ध की पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया। परिणाम जो भी रहा, यह तो तय है कि खेल के मैदान में पाक के साथ हमारा मीडिया हद दर्जे तक नापाक प्रस्तुति वाला है। अन्य खेलों की मैं नहीं जानता, लेकिन क्रिकेट के मामले में देश के दर्शक को उसने असामान्य संवेदना से युक्त कर लगभग मनस्तापी बना डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। मुझे कथादेश के एक अंक में कवि व पत्रकार विष्णु खरे द्वारा लिखित फिल्म बॉर्डर की समीक्षा याद है जिसमें उन्होंने संभावना व्यक्त की थी कि इस फिल्म में पाक-कमांडर के खिलाफ प्रयुक्त सनी देओल के गालीभरे संवाद भारत में हिन्दू-मुसलमानों के बीच वैमनस्य का कारण बन सकते हैं। यद्यपि वैसा कुछ हुआ नहीं और उक्त संवादों के साथ बॉर्डर को सैकड़ों बार टी॰वी॰ पर दिखाया जा चुका है। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि हमें कुछ विषयों की संवेदनशीलता के प्रति लापरवाह नहीं हो जाना चाहिए। खेल में जीत की भावना को बढ़ावा देने का तरीका इतना साफ-सुथरा होना चाहिए कि देश का बच्चा-बच्चा विश्व-नागरिक बनने की ओर अग्रसर हो सके; न कि इतना भद्दा कि वह अपने पड़ोसी से नफरत करने लगे या फिर उससे नजरें चुराने लगे।
आज जिस अखबार, जिस चेनल को देखो, वह जुनून से भरा है। दु:खी करने वाली बात यह है कि यह जुनून सकारात्मक और गुणात्मक लेशमात्र भी नजर नहीं आता है। यह सकारात्मक और गुणात्मक हो सकता है यदि जीतने की यह भावना हम सभी खेलों में सभी देशों के विरुद्ध अपने खिलाड़ियों और देशवासियों में समान रूप से पनपायें, लेकिन यह हो नहीं रहा है। हालत यह है कि मीडिया दो देशों ही नहीं, दो सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य बोने का ऐसा आत्मघाती खेल खेल रहा है जिसके परिणाम तुरन्त तो किसी को भी दिखाई दे ही नहीं रहे। जो परिणाम दिखाई दे रहा है वो यह किअमेरिका ने भारत-पाक क्रिकेट कूटनीति की प्रशंसा की है। इस प्रशंसा से ही आभास मिलता है कि कुछेक टुकड़े हमारी ओर फेंकते रहकर साम्राज्यवादी अमेरिका हमें किस कीचड़ की ओर धकेल रहा है! अभी कुछ वर्षों पहले उसने हमें—‘गर्व से कहो हम हिन्दू(यह उद्बोधन देते समय स्वामी विवेकानन्द ने इस शब्द का प्रयोग समस्त भारतवासियों के लिए किया था) हैं की ओर धकेला था, जिसकी ओर चलते हुए हमने कितनी सामाजिक समरसता खोई, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
मोहाली के पंजाब क्रिकेट एसोसिएशन स्टेडियम के क्लब हाउस में उस वक्त, जब पाक दो  विकेट गँवा चुका था, पाक के प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी, भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी आदि राजनयिक गोश्त बर्रा, तंदूरी पिंक सालम, मुर्ग लजीज़,गोश्त पालक साग, चाँप बिरयानी, तवे की मछली, भरवाँ मीट, शाही इडली, गाजर का सूप और कई अन्य व्यंजनों का आनन्द ले रहे थे। बकौल अकबर इलाहाबादी:
क़ौम के ग़म में डिनर करते हैं हुक्काम के साथ।
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ॥
जो भी हो, देश के मीडिया से यही दरख्वास्त है कि वहखेल को खेल ही रहने दे कोई नाम न दे।
फोटो साभार:नई दुनिया,दिल्ली 31 मार्च 2011



गुरुवार, 25 नवंबर 2010

बंगलौर:इस बार/बलराम अग्रवाल


लाल बाग, बंगलौर में एक मनोहारी दृश्य                 चित्र:बलराम अग्रवाल
डायरी/25-11-2010
दिन अभी शुरू नहीं हुआ। रात के 12/45 हुए हैं। कुछ देर दिन में सो लेने की वजह से नींद जल्दी नहीं आ सकती। मैं और आदित्य जाग रहे हैं। वह एनीमेशन का अपना काम कर रहा है, लेखन-संबंधी मैं अपना।
आज गुरुवार है। रविवार को लाल बाग की सैर की मैंनेराजेश के साथ। साथ घूमने की तो बात ही अलग है, यह बात लिखते हुए भी मुझे प्रेम और अपनेपन की जिस दिव्य गंध का आभास हो रहा है, उसे मैं सिर्फ महसूस कर सकता हूँ, लिख नहीं सकता। लाल बाग की सैर का प्रस्ताव राजेश ने ही मेरे सामने रखा, मैंने उनके सामने नहीं। इस बारे में दो बातें हैंपहली यह कि मुझे यहाँ, बंगलौर के भ्रमण-योग्य इलाकों के बारे में यानी ऐसे इलाकों के बारे में जो निवास से बहुत ज्यादा दूर न हों और प्राकृतिक सुषमा से भरपूर हों, कुछ भी नहीं मालूम; दूसरी यह कि मैं किसी को साथ लेकर घूमने की योजना बनाने के बारे में शुरू से ही दोयम हूँ। गरज यह कि पता भी नहीं है और दब्बूपन भी है। मालूम नहीं क्या बात है कि जब भी राजेश का विचार जेहन में आता है, मन में यह गीत अनायास ही सुनाई-सा देने लगता है:
दोनों जवानी की मस्ती में चूर/
तेरा कुसूर न मेरा कुसूर/
ना तूने सिग्नल देखा/
न मैंने सिग्नल देखा/
एक्सीडेंट हो गया रब्बा-रब्बा…।
नितान्त भोगवादी चरित्र का यह गीत क्यों सुनाई देता है? जबकि जितना मैंने उन्हें समझा है, राजेश को सांसारिक भोग से कोई लगाव नहीं है। अभी तक का अपना जीवन उन्होंने श्रम और विश्वास के साथ बिताया है। अपने जीवन के सुनहरे सतरह वर्ष उन्होंने 'चकमक' के संपादन को सौंपकर एक तरह से भारत की बाल-मेधा को दिशा देने में बिताए हैं। मुझे लगता है कि मैंने भी मात्र स्वार्थ-लाभ हेतु कभी वाहियात चरित्रों या मात्र सिक्कों के पीछे भागने की कोशिश नहीं की। लगभग उन्हीं की तरह का  या सामान्य से भी नीचे का जीवन जिया है। हाँ, साहित्यिक-श्रम अवश्य उनसे कम किया है। पारिवारिक जिम्मेदारियों ने मुझे कभी आज़ाद नहीं रहने दिया। उनके-अपने बीच मैं लेकिन साहित्यिक-लगाव अवश्य महसूस करने लगा हूँ। यह लगाव इकतरफा भी हो सकता है और दोतरफा भी। प्रेम और लगाव हो तो कोई कहाँ-से-कहाँ मिलने को जा सकता है। राजेश का वर्तमान-निवास दक्षिण-बंगलौर के अत्याधुनिक सोसाइटियों से भरपूर सरजापुर रोड स्थित विप्रो से दो-ढाई किमी अन्दर गाँव में है और मैं सीवी रमन नगर के निकट कगदासपुरा में हूँ यानी करीब-करीब पूर्वी-बंगलौर की एक विकासशील कालोनी में। दोनों के बीच कोई सीधी बस सेवा उपलब्ध नहीं है। कम-से-कम तीन बसें बदलकर पहुँचना होता है, दो-ढाई किलोमीटर पैदल चलना अलग। गत 30 अक्टूबर, 2010 को उनसे मिलने के लिए आदित्य की बाइक पर बैठकर पहली बार जब मैं उधर पहुँचा था तो आदित्य ने कहापापा, हम पिछले वर्ष जहाँ आए थे, वहीं पर पहुँच गये हैं।
पिछले वर्ष, यानी अक्टूबर-नवम्बर, 2009 में भी हम इधर आये थे। भाई श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु ने तब सुश्री सुधा भार्गव का फोन नम्बर मुझे लिखवाया था। इस बार भी उन्होंने ही फोन लिखवाया था और उस समय हम उन्हीं से मिलने को जा रहे थेश्रीयुत राजेश उत्साही जी से। ऊपर की पंक्तियों में केवल कुछ रहस्य बुनने की नीयत से मैंने उन्हें राजेश सम्बोधित किया है। वस्तुत: तो पहले दिन से ही मैं उन्हें उत्साही जी सम्बोधित करता हूँ। इस कथा में रहस्य बुनने की नीयत से उन्हें राजेश सम्बोधित करने की अपनी अशिष्टता के लिए मैं क्षमा याचना करता हूँ।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

संयम के निहित-अर्थ/बलराम अग्रवाल


अयोध्या पर बीच का रास्ता निकालने-जैसा प्रशंसनीय फैसला सुनाया जा चुका है। बेशक सभी फैसले ऐसे होते हैं कि उनसे दोनों पक्षों का शत-प्रतिशत सहमत होना असम्भव रहता है।
मन्दिर-निर्माण के लिए तराशे गये पत्थर
फैसले के समय पक्ष-विपक्ष के सभी समझदार लोगों ने जनता से संयम बरतने की अपील की। यह संयम क्या है?इसे समझना जरूरी है। 6 दिसम्बर, 1992 को जिस समय बाबरी मस्जिद कहे जाने वाले ढाँचे को गिरा दिये जाने की खबर आई, मैं गाजियाबाद के नवयुग मार्केट स्थित प्रधान डाकघर में कार्यरत था। मुझे मालूम चला कि बुलन्दशहर के मेरे मुहल्ले के एक पड़ोसी जिन्हें हम चाचाजी सम्बोधित करते थे, अपनी बेटी के नेहरू नगर स्थित निवास पर थे और गम्भीर रूप से बीमार थे। घर से संदेश आया कि मैं उन्हें देख जरूर आऊँ। संदेश न आता तो भी उनसे इतनी आत्मीयता थी कि उन्हें देखने मैं अवश्य जाता। मैंने अपनी साइकिल उठाई और ऑफिस-प्रांगण से सड़क पर निकल आया। पोस्ट ऑफिस के सामने उन दिनों उर्वशी सिनेमाघर हुआ करता था जो काफी प्रसिद्ध था। सिनेमाघरों में घटती दर्शक-संख्या ने उसे ध्वस्त कर उस स्थान का अन्य व्यापारिक उपयोग करने हेतु उसके स्वामियों को उकसाया और आज वह जगह समतल पड़ी है। उसके पीछे वाली सड़क यानी नगर परिषद के मुख्य-द्वार के सामने से होकर जैसे ही मैं कुछ आगे बढ़ा, मैंने आसपास की दुकानों के कुछ लड़कों-युवकों को सड़क पर पटाखे छोड़ते देखा। यह बाबरी पर विजय का उल्लास था। ये वे लोग थे जो कभी भी अयोध्या नहीं गये थे और जिन्हें राम का अर्थ तक नहीं पता था। असलियत तो यह है कि उन्हें हिन्दु शब्द का भी तात्पर्य नहीं पता था। वे मूढ़ किस्म के ऐसे दोपाये थे जो उच्छृंखलता को उल्लास की संज्ञा देते है। अगर मैं यह कहूँ कि ऐसे अवयव सभी धर्मों में होते हैं, तो यह मेरी मूर्खता होगी क्योंकि धर्म से किसी भी प्रकार का संबंध न तो इनका होता है और न उनका जो इनकी पूँछें उमेठकर इनमें चाबी भरते हैं।
बहरहाल, मैंने सड़क के बीचोंबीच उन्हें पटाखों की लड़ियाँ बिछाते देखा और आराम से समझ गया कि कुछ ही देर में कर्फ्यू लगने वाला है। मैं इतना डर गया कि वहाँ से साइकिल चलाकर नेहरू नगर जाने और चाचाजी के पास आधा घंटा बैठ आने का खतरा मोल लेना मुझे मुनासिब न लगा। मेरे डरे हुए मन ने पता नहीं क्यों यह कल्पना कर ली कि बहुत जल्द पटाखों की ये लड़ियाँ कुछ खास लोगों की दुकानों के छप्परों पर फेंकी जाने लगेंगी और हालात बिना मतलब ही काबू से बाहर हो जाएँगे। पुलिस जब तक आयेगी, तब तक बहुत-कुछ स्वाहा हो चुका होगा। सड़कों पर नौ-नौ बाँस कूद  रहे ये बहादुर अपनी माँ-बहन-पत्नी के पहलू में जा छिपे होंगे इस दर्प के साथ कि इन्होंने बाबर और उसकी पुश्तों से कई सौ साल बाद ही सही, बदला ले लिया है। इन्हें एक बार भी यह याद नहीं आयेगा कि गाजियाबाद से लेकर गढ़ गंगा तक तमाम पट्टी के मुसलमान उनके अपने भाई हैं। उनकी रगों में भी वही गंगाजल बहता है जो इनकी रगों में। यों तों पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान अलग हैं ही नहीं, कुछेक ऐसे सम्भ्रांतों को छोड़कर जो अपने-आप को परिवर्तित न मानकर मूल मानते हैं। यहाँ उद्देश्य उनकी पवित्रता पर बहस करना नहीं हैं। बड़ी-बड़ी लड़ाइयों, लूटों और झगड़ों-फसादों की इस दुनिया में किसका लहू कितना अनछुआ और पवित्र रह गया है इसे बताने वाली माँएँ जब जिन्दा थीं, तभी उनकी किसी ने नहीं सुनी, अब तो वे स्वर्ग सिधार चुकी हैं।
अयोध्या में राम जन्मभूमि मन्दिर हेतु नक्काशी की हुई शिलाओं पर पहरा देता जवान
तात्पर्य यह कि मैं उन उच्छृंखलों की कारगुजारियों से भीतर तक डर गया और ऑफिस लौटकर वापस अपनी सीट पर जा बैठा। यह बताने की जरूरत नहीं है कि मेरी आशंका सच साबित हुई। नौनिहालों ने छप्परों पर पटाखों की लड़ियाँ फेकी और आग के सामने नाच-नाचकर जश्न मनाया। छप्परों के नीचे बोरियों में भुने आलू पहले भुने, फिर राख बन गए, किसी भूखे का निवाला न बन सके। सब्जियाँ, आटा, दाल, चावल… सबका एक ही हश्र थाराख में तब्दील हो जाना। बिहारी कालोनी स्थित कब्रिस्तान की चहारदीवारी ढा दी गई। सालों से वहाँ सोई रूहों को कहाँ पनाह मिली, इस सवाल का जवाब या तो अल्लाताला के पास है या उन रूहों के जिन्हें कुछ शैतानों के कारण कयामत से पहले ही अपनी जगह से उठ जाना पड़ा। नियत वक्त से पहले उन्हें इतना मज़बूर करने की सज़ा क्या होगी?यह भी ऊपर वाला ही जाने। पुलिस चौकी सिहानी गेट के निकट एक दर्ज़ी की दुकान के ताले तोड़कर उसके सिले-अनसिले सारे कपड़े ये बहादुर लोग लूट ले गए। वे सब-के-सब तो हिन्दुओं के ही थे। सब न सही, ज्यादातर सही।
हिन्दुओं की ओर से हो या मुसलमानों की ओर से, सिखों की ओर से हो या ईसाइयों की ओर से, एक सम्प्रदाय द्वारा दूसरे की ईमानदारी पर, उसकी निष्ठा पर सन्देह करना या एक सम्प्रदाय द्वारा कोई भी ऐसा काम करना जिसके कारण दूसरे समुदाय को उस पर, उसकी नीयत अथवा कार्यशैली/चिन्तनशैली पर सन्देह करने की गुंजाइश बनेराष्ट्रद्रोह है। इसे माफ नहीं किया जाना चाहिए। देश की दण्ड-व्यवस्था का इस दुविधा से बाहर आ जाना अति आवश्यक है।
दोस्तो, कुछ सांस्कृतिक संगठनों ने और एकाध राजनीतिक दिवालिये ने भी भड़काऊ बयान जारी किए हैं कि यह फैसला तथ्याधारित नहीं है इसलिए गलत है। तथ्य ठस होते हैं, संवेदना से उनका लेना-देना नहीं होता। तथ्यों के पीछे भागते-भागते कुछ लोग उनके-जैसे ही ठस और संवेदनहीन हो चुके हैं और नहीं चाहते कि भारत के लोग दुविधारहित जीवन जिएँ। इसका यह मतलब बिल्कुल न निकाला जाय कि फैसले से जो बहुसंख्यक आज सन्तुष्ट नजर आ रहे हैं, उन्हें देश और समाज में सन्तुलन की विशेष चिन्ता है। कल, माननीय सुप्रीम कोर्ट यदि वर्तमान फैसले पर अपना कुछ ऐसा दृष्टिकोण पेश कर दे जो उनके आज के मन्तव्य से किंचित भी भिन्न या मान्यता से इतर हो तो वे स्वयं भी भूल जाएँगे कि अभी कुछ ही दिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच का फैसला आने पर उन्होंने जनता से कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए संयम बरतने की अपील की थी।
अंत में, यह बता देना भी आवश्यक ही है कि 6 दिसम्बर, 1992 को उल्लास पर्व मना रहे कुछ उच्छृंखलों से डरकर जिन बीमार चाचाजी को देखने मैं उस समय नहीं जा सका था, फिर कभी भी नहीं जा सका। उच्छृंखलों की इस दुनिया से वे प्रयाण कर गए थे और ग़ज़ब की बात यह रही कि यह सूचना भी वातावरण शान्त हो जाने के बाद ही कभी मिल पाई।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

स्‍वतंत्र सिनेमा के रास्‍ते के संकट कटने चाहिए/संजय झा

(यमुनानगर से अविनाश वाचस्पति द्वारा प्रेषित विशेष रपट)
 अक्टूबर,१ यमुनानगर। सरकार ऐसी नीति बनाए, जिससे नए फिल्मकार के सामने फंड और प्रोड्यूसर की दिक्कतें खत्म हों और स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा मिल सके। यह विचार स्ट्रींग्स बाउंड बाई फेथ के निर्माता संजय झा व बिओंड बॉडर्स की निर्मात्री शर्मिला मैती ने प्रेस कांफे्रंस के दौरान पत्रकारों से कहे।
संजय झा ने कहा कि वे लोग भाग्यशाली होते हैं,जिन्हें आसानी से प्रोड्यूसर व फंड मिल जाता है। स्वतंत्र सिनेमा को बढ़ावा मिलने से फिल्म निर्माण के क्षेत्र में ऐसे लोगों का पदार्पण होगा, जो फिल्म बनाने के इच्छुक हैं। हालांकि आज डिजिटल मीडिया का युग है, जिसमें नित नए प्रयोग किए जा रहे हैं। अब मोबाइल पर भी फिल्में देखी और बनाई जा सकती है। एक अन्य सवाल के जवाब में झा ने कहा कि बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज जैसे छोटे शहर से होने के बावजूद भी उन्होंने लक्ष्य को नहीं भुलाया है। छोटे शहरों से भी अच्छे फिल्मकार सामने आ रहे हैं जिनके मन में इस विधा के प्रति सच्ची चाहत है अपनी फिल्म के बारे में बतलाते हुए उन्होंने कहा कि मेरी फिल्म एक यात्रा वृतांत है। जिसमें कुंभ मेले के माध्यम से आस्था का पर्व दिखाया है। इस फिल्म की कहानी वारेन हास्टिंग नाम के एक ब्रिटिश युवक की है, जो नासिक मेले में एक पुजारी के घर ठहरता है और पुजारी की बेटी कृष्णा से पे्रम कर बैठता है। फिल्म की कहानी इसी विषय पर केंद्रित हो आगे बढ़ती है। उन्होंने बताया कि 2003 में 20 लाख लोगों के बीच जाकर एक महीने में इस फिल्म को फिल्माया गया है। । फिल्म बनाते समय उन्होंने व्यावसायिकता से समझौता नहीं कि और ज्वलंत मुद्दे पर फिल्म बनाई है। यह फिल्म कवि बाबा नागार्जुन को समर्पित है। फिल्म कमर्शियल सिनेमा को छूती है। फिल्म का संगीत आसाम के जुबीन गर्ग का है। इस फिल्म के निर्माता मैथ्यू वर्गीस ने कहा कि रजनल क्षेत्र में बनी फिल्में भी विश्व में ख्याति अर्जित कर रही है। उन्होंने कहा कि कहानी व भाषा में ताकत होनी चाहिए,फिल्म हिट होना लाज़मी है।   
फिल्म निर्मात्री शर्मिला मैती ने बताया उनकी फिल्म बिओड बॉडर्स बंगाल व पूर्वी पाक विभाजन पर आधारित है। इस फिल्म में विभाजन के बाद तीन महिलाएं अपनी अनुभवों को बांटती है। हालांकि यह एक डाक्यूमेंट्री फिल्म है,जिसमें गीता घटक व गीता डे मुख्य किरदारों में है। विभाजन का असर औरतों के जीवन पर क्या प्रभाव डालता है, इस बारे में फिल्म में दिखाया गया है।