रविवार, 19 फ़रवरी 2012
शनिवार, 10 सितंबर 2011
शनिवार, 27 अगस्त 2011
कहाँ गये वो लोग?/बलराम अग्रवाल
दोस्तो,
सबसे पहले तो भाई अनिल जनविजय का आभार कि उन्होंने मुझे फैज़ अहमद फैज़ की आंदोलनकारी नज्म ‘हम देखेंगे’ सुनने का अवसर प्रदान किया। यह 24 की रात की बात है। तब से अब तक मैं बीसों बार उसे सुन चुका हूँ, लेकिन मन है कि भरता ही नहीं है। मैंने उस नज्म की तीन प्रतिलिपियाँ तैयार कीं और अगली सुबह रामलीला मैदान जा पहुँचा। उनमें से दो को मैंने रामलीला मैदान में प्रारम्भ से ही अन्ना हजारे जी के मंच का संचालन सँभाल रहे कुमार विश्वास व नितिन को भेज दिया। उस समय मुझे मालूम नहीं था कि हम इतनी जल्दी वह दिन देख लेंगे जिसका हमसे वादा था। आप सब देशवासियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे आम आदमी की इस जीत पर शतश: बधाइयाँ।
| वृद्धाएँ ही नहीं नवजातों को लेकर युवा माँएँ भी आंदोलन में कूद पड़ीं चित्र:बलराम अग्रवाल |
| इस जज्बे की अनदेखी करना किसी के लिए सम्भव नहीं चित्र:बलराम अग्रवाल |
दोस्तो, आज यह पूछने का दिन आ गया है कि कहाँ गये वो लोग जो कहते थे कि ‘10-15 हजार लोगों के इकट्ठा होकर गला फाड़ने से क्या होता है?’ तथा यह कि ‘सौ करोड़ से ऊपर जनसंख्या वाले इस देश में अन्ना के समर्थक कितने होंगे? ज्यादा से ज्यादा एक करोड़! बाकी 99 करोड़ का समर्थन तो उन्हें नहीं प्राप्त है।’
उपर्युक्त दो बातों के अलावा और भी बहुत-सी बातें राजनीतिकों और बुद्धिजीवियों की ओर से सुनने-पढ़ने को मिलीं जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि देश का न केवल राजनीतिक बल्कि बौद्धिक क्षेत्र भी ‘धृतराष्ट्रों’ के हाथ में खेल रहा है।
आज शाम नोएडा से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ द्वारा आयोजित ‘जे॰ सी॰ जोशी चतुर्थ शब्द साधक सम्मान’ समारोह था। कल पत्रिका के कार्यकारी संपादक भाई प्रेम भारद्वाज ने फोन करके आमन्त्रित किया था। मैं समय से करीब आधा घंटा पहले हिन्दी भवन पहुँच गया था। चहल-पहल महसूस न होने के कारण मैंने अन्दर जाने की बजाय बाहर ही बैठना उचित समझा और बस स्टॉप की बैंच पर बैठ गया। पाँच मिनट के अन्तराल पर ही भाई प्रेम भारद्वाज अपने परिवार के साथ आ पहुँचे। मुझे बाहर बैठा देखकर चौंक गये। पूछा,“यहाँ क्यों बैठे हैं?”
“अभी-अभी पहुँचा हूँ,”मैंने कहा,“सोचा, कुछ देर खुली हवा में बैठ लूँ।”
“आइए, अन्दर चलते हैं।” उन्होंने कहा। दरअसल, उन्हें अन्दर की तैयारियों का जायजा भी लेना था। इसलिए मेरी तरह वह बाहर नहीं बैठ सकते थे। मैं उनके साथ हो लिया। समय-पूर्व पहुँचने के कारण उपस्थिति का न होना स्वाभाविक था। फिर भी, हॉल को खाली देखकर भारद्वाज जी ने आशंका जताई—‘अन्ना जी के आंदोलन के चलते उपस्थिति कम रह सकती है।’
मुझे अच्छी तरह मालूम था कि दिल्ली के साहित्यकार कहे जाने वाले जीव गुट विशेष द्वारा प्रायोजित आंदोलन में तो उछल-कूद मचा सकते हैं; वे वर्ग और समुदाय तो बन सकते हैं; देश नहीं बन सकते। ऐसा मैं अपने मन से नहीं कह रहा हूँ, इस दौरान विभिन्न बौद्धिकों के चरित्रों के फेसबुक आदि पर आते रहे बयानों के मद्देनजर कह रहा हूँ। खैर, मैंने भारद्वाज जी की आशंका पर कोई टिप्पणी नहीं की। उनके पास से खिसक लिया, बिना कुछ कहे। चला, तो अपूर्व जोशी से भेंट हो गयी। वह हमेशा ही गले और हृदय से मिलते हैं, हाथ के पोरुओं से नहीं। अपनत्व से भिगो देते हैं। शिकायत की कि मैं इतने लम्बे अंतराल के बाद क्यों मिल रहा हूँ? फिर स्वयं ही बोले,“नहीं, आप तो एक-दो बार आये थे कार्यालय, मैं ही नहीं मिल पाया, प्रेम जी ने बताया था।” उपस्थिति कम रहने की आशंका उन्होंने भी जताई। कहा,“कुमार विश्वास को मंच संचालन करना था, लेकिन वह रामलीला मैदान का मंच सँभालने में व्यस्त हैं। सीताराम येचुरी जी को आना था, लेकिन दोनों संदनों में महत्वपूर्ण बहस चल रही है। उन्होंने बताया है कि अभी 22 वक्ता और बाकी हैं, मैं नहीं आ सकता।” तात्पर्य यह कि टीम ‘पाखी’ टीम ‘अन्ना’ के आंदोलन से खासी चिंतित नजर आ रही थी। लेकिन यह चिंता अपने कार्यक्रम में आने वाले श्रोताओं और वक्ताओं की कम उपस्थिति के मद्देनजर ही थी। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ, यह बेहद भला लगा।
तय समय पर चाय-पान शुरू हुआ। मैं अपने हिस्से का डिब्बा लेकर विन्डो के किनारे जा खड़ा हुआ। कुछ देर बाद, ‘साहित्यकारों’ की आमद शुरू हुई। विन्डो में खड़े मुझको सबसे पहले प्रो॰ नामवर सिंह आते दिखाई दिये। उनके बाद तो अशोक मिश्र, प्रदीप पंत, प्रो॰ निर्मला जैन, प्रेमपाल शर्मा, कुसुम कुमार, सुशील सिद्धार्थ, मन्नू भंडारी, गीताश्री, अशोक गुप्ता, रमणिका गुप्ता, राजेन्द्र यादव, प्रो॰ मैनेजर पाण्डे आदि-आदि दिखाई देते गये। ये केवल कुछ नाम हैं। सभी को न मैं जानता हूँ, न पहचानता हूँ। लब्बोलुआब यह कि कार्यक्रम शुरु होते-होते हॉल लगभग आधा तो भर ही चुका था। मैंने तुरन्त उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल को व्यंजनापरक एक एस॰एम॰एस॰ भेजा—‘इस समय पाखी के कार्यक्रम में आये होते तो आपका यह सन्देह मिट जाता कि हिन्दी के साहित्यकार घर से बाहर नहीं निकलते हैं।’ उनका जवाब आया—‘मैं इस समय सी॰पी॰ में हूँ। वहाँ तो लेखक होंगे ही। उन्हें अपनी प्राथमिकताएँ मालूम हैं। भाड़ में जायें अन्ना उनके लिए।’
| देशभर की जनता के हस्ताक्षरों से युक्त अन्ना-समर्थक एक बैनर चित्र:बलराम अग्रवाल |
मज़े की बात यह रही कि अपने-अपने तरीके से अपूर्व जोशी, प्रो॰ निर्मला जैन और प्रो॰ नामवर सिंह ने अन्ना के आंदोलन का जिक्र अपने वक्तव्यों में किया लेकिन तीनों के सरोकार अलग-अलग थे। मुझे याद है कि 7 अगस्त को जन्तर-मन्तर पर ‘सरकारी लोकपाल बिल’ को जलाए जाने वाले कार्यक्रम में जब जन्तर-मन्तर पर ही प्रदर्शन कर रहे रुचि भट्टल के परिजनों ने टीम अन्ना से यह अनुरोध किया था कि वे उनका साथ दें तो अरविन्द केजरीवाल ने मंच से घोषणा की थी कि ‘आप अपने-आप को हमसे अलग न समझें। हम सब आपके साथ हैं और आपके साथ कैंडिल-मार्च करते हुए इंडिया गेट तक जायेंगे।’ और वे गये भी। हिन्दी भवन में उपस्थित ‘साहित्यकारों’ ने उस वक्त जब संसद के दोनों सदनों में एक ऐतिहासिक निर्णायक बहस चल रही थी और पूरे देश को मथ डालने वाला एक 74 वर्षीय योद्धा गत 12 दिनों से रामलीला मैदान में भूखा बैठा था, यह आह्वान करने की आवश्यकता नहीं समझी कि साहित्यकारों की यह बिरादरी हर प्रकार के ‘भ्रष्टाचार’ का विरोध करती है और यहाँ से निबटकर रामलीला मैदान जायेगी। दरअसल, जैसा कि चन्देल जी ने अपने जवाब में लिखा था—यह उनकी प्राथमिकता में नहीं था।
संतोष की बात है दोस्तो, कि संसद के दोनों सदनों ने अन्ना जी की माँगों पर गम्भीरतापूर्वक बहस की और उन्हें लगभग मान लिया। माननीय प्रधानमंत्री ने इस आशय का पत्र लिखकर विलासराव देशमुख और संदीप दीक्षित के हाथों रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे अन्ना जी के पास भेजकर अनुरोध किया कि वे कृपया अब अपना अनशन तोड़ दें। विलासराव देशमुख ने स्वयं उस पत्र को पढ़कर सुनाया। उसके जवाब में अन्ना जी ने अनशन तोड़ने की अपनी सहमति दे दी। उन्होंने कहा कि यह वास्तव में भारत की गरीब जनता की जीत है। फिलहाल इतना ही, बाकी कल।
शुक्रवार, 26 अगस्त 2011
गुरुवार, 25 अगस्त 2011
हम देखेंगे/फैज़ अहमद फैज़
Tanu Chopra has written on her facebook wall :
| इण्डिया गेट 17अगस्त, 2011 चित्र: बलराम अग्रवाल |
In 1982, In Singapore , LOKPAL BILL was implemented and 142 Corrupt Ministers & Officers were arrested in one single day.. Today Singapore has only 1% poor people & no taxes are paid by the people to the government, 92% Literacy Rate, Better Medical Facilities, Cheaper Prices, 90% Money is white & Only 1% Unemployment exists...!!!
दोस्तो, इसके साथ ही मैं मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ की एक उद्वेलनकारी यथार्थवादी नज्म आपके समक्ष पेश कर रहा हूँ:-

हम देखेंगे, लाज़िम1 है कि हम भी देखेंगे। वो दिन कि जिसका वादा है, हम देखेंगे॥ जो नौहे-अज़ल2 में लिक्खा है हम देखेंगे। लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, हम देखेंगे॥
जब ज़ुल्मो-सितम के कोहे-गिरां3 रूई की तरह उड़ जायेंगे। हम महकूमों4 के पाँव तले ये धरती धड़-धड़ धड़केगी॥ और अहले-हकम5 के सर ऊपर जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी॥ हम देखेंगे…
जब अर्ज़े-खुदा के क़ाबे से सब बुत उठवाये जायेंगे। हम अहले-सफा6 मरदूदे-हरम7 मसनद पे बिठाये जायेंगे॥ सब ताज उछाले जायेंगे सब तख्त गिराये जायेंगे॥ हम देखेंगे…
बस नाम रहेगा अल्ला का जो गायब भी है हाजिर भी। बस नाम रहेगा अल्ला का जो मंजर भी है नाज़िर भी॥ उट्ठेगा अनल-हक़8 का नारा जो मैं भी हूँ और तुम भी हो। और राज करेगी खल्के-खुदा9 जो मैं भी हूँ और तुम भी हो॥ हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे। वो दिन कि जिसका वादा है, हम देखेंगे॥
1॰ नि:शंक आवश्यक 2॰ आदि-पुस्तक 3॰ भारी-भरकम पहाड़ 4॰ जनता, गुलाम 5॰ सत्ताधारी 6॰ साफ दिल वाले 7॰ दरबार से निष्कासित 8॰ अहं ब्रह्मास्मि 9 ईश्वरीय शक्ति


हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे।
वो दिन कि जिसका वादा है, हम देखेंगे॥
नैतिक पतन की पराकाष्ठा/बलराम अग्रवाल
| चित्र : बलराम अग्रवाल |
सवाल यह पैदा होता है कि इस स्वतंत्र देश में, इस स्वतंत्र गणतांत्रिक देश में जनता के हित की आवाज को अहिंसक अनशन के माध्यम से अगर कोई व्यक्ति सरकार के कानों तक पहुँचाना चाहे तो उसके जीवन और स्वास्थ्य की चिंता से क्या सरकार को इसलिए अलग खड़ी हो जाना चाहिए कि उक्त व्यक्ति या व्यक्ति-समूह उसके मन मुताबिक बर्ताव क्यों नहीं कर रहा है?
दोस्तो, सरकारी वार्ताकारों द्वारा टीम अन्ना से ही नहीं किसी से भी यह कहे गये शब्द कि “अन्ना अनशन करना चाहें तो करते रहें. यह आपकी समस्या है।” शासक समझे जाने वाले व्यक्तियों के नैतिक पतन की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं। इस वाक्य की जितनी भर्त्सना की जाय कम है।
सोमवार, 22 अगस्त 2011
अन्नामय है चप्पा-चप्पा/श्यामसुन्दर अग्रवाल
दोस्तो, गत दिनों आपने बंगलूरु(कर्नाटक) निवासी प्रकाश बेलवाड़ी की टिप्पणी ‘साम्रावाद के बीच’ पढ़ी। इस बार कोटकपूरा(पंजाब) से भाई श्यामसुन्दर अग्रवाल ने अपना यह अनुभव भेजा है—बलराम अग्रवाल
| चित्र:बलराम अग्रवाल |
पिछले शुक्रवार को एक मीटिंग में भाग लेने के लिए कोटकपूरा से अमृतसर जा रहा था। बस फरीदकोट से निकलकर बस ज्यादा से ज्यादा पंद्रह किलोमीटर ही चली होगी कि उसका एक टायर पंक्चर हो गया। ड्राइवर किसी तरह उसको ‘तलवंडी भाई’ गाँव के मोड़ तक ले गया। सुबह के सात ही बजे थे। पंक्चर लगाने वाले ने अपनी खोखानुमा दुकान खोली ही थी।
बस उसके आगे जाकर रुक गई। इधर पंक्चर टायर को निकालने-बदलने का काम शुरू हुआ, उधर सवारियों में से किसी के मुँह से अन्ना हज़ारे और सरकार की बात निकली। वह बहुत कम पढ़ा-लिखा पंक्चर लगाने वाला भी इस विषय पर टिप्पणी करने से नहीं रह सका। उसने कहा—‘करोड़ाँ खान वाले साध नूँ चोर दस्सी जांदे ऐ।’(करोड़ों रुपए खा जाने वाले लोग साधु को चोर बता रहे हैं।) उस का इशारा कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी द्वारा अन्ना हज़ारे को आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा बताया जाने की तरफ था।
पंजाब के एक अंदरूनी गाँव में सड़क किनारे खोखा डालकर रोजी-रोटी कमाने वाले लगभग अनपढ़ ग्रामीण की यह टिप्पणी उन चाटुकारों के मुँह पर करारा तमाचा है जो कह रहे हैं कि अन्ना के आंदोलन का प्रभाव केवल शहरों तथा मध्यम वर्ग तक ही सीमित है।
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