शनिवार, 20 जुलाई 2013

जितेन्द्रनाथ दास को याद करते हुए…/हंसराज रहबर


दोस्तो, फेसबुक पर भाई पंकज चतुर्वेदी द्वारा पोस्ट किये गये अमर क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के चित्र देखकर हंसराज रहबर द्वारा लिखित कुछ बातें अनायास ही याद हो आयीं। हंसराज रहबर (जन्म : 9 मार्च, 1913) का यह शताब्दी वर्ष चल रहा है। उन्हें याद करते हुए प्रस्तुत है उनकी आत्मकथा ‘मेरे सात जन्म’ दूसरे भाग से यह उल्लेखनीय अंश:

हंसराज रहबर
जितेन्द्रनाथ का नाम सुनकर अपढ़ से अपढ़ व्यक्ति के भी, जिसने कभी अख़बार छुआ तक नहीं था, कान खड़े हो जाते थे। इसीलिए मैं यह नाम बार-बार दोहरा रहा था और लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। अख़बार, जो बिकने थे, बिक चुके थे। लोग सिर्फ़ चुप खड़े सुन रहे थे और मेरी ओर देख रहे थे। मेरे शरीर में बिजली-सी कौंध गयी और मैं जोश में भरकर चिल्लाया, “हड़ताल का तिरसठवाँ दिन…जितेन्द्रनाथ दास की हालत नाज़ुक।”
      लोग देख रहे थे, सुन रहे थे और मैं उत्साह में भरा बोल रहा था। शायद मेरे अन्तर्मन में यह भाव काम कर रहा था कि अख़बार बिकें न बिकें, पर देशवासियों तक यह ख़बर पहुँच जाय कि हड़ताल तिरसठ दिन से चल रही है और क्रांतिकारी जान पर खेल रहे हैं।
स्टेशन से तीन हॉकर अख़बार लेकर एक-साथ चलते थे और वे तीनों एक अलिखित संधि अथवा परस्पर समझौते के अनुसार अलग-अलग रास्तों से शहर पहुँचते थे और अलग-अलग क्षेत्रों में अख़बार बेचते थे। इस संधि अथवा समझौते के अनुसार, मैं घंटाघर की ओर जाने की बजाय केसरगंज को घूम गया। बस अड्डे से चौक तक फर्लांग-डेढ़ फर्लांग का फासला था और सड़क बिल्कुल सूनी थी। कहीं-कहीं कोई आवारा ख़ारिशज़दा कुत्ता घूम रहा था अथवा कौवे, चिड़ियाँ इत्यादि पंछी उड़ रहे थे। बीच में एक सिनेमाघर था, व्ह भी इस समय बंद पड़ा था। प्राय: सड़क का यह टुकड़ा मैं चुपचाप पार कर लिया करता था; पर जब-से हड़ताल लंबी खिंची थी और जेल में जितेन्द्रनाथ दास और शिव वर्मा की हालत नाज़ुक होती जा रही थी, मुझ पर कुछ ऐसा जुनून-सा सवार हो गया था कि मैं यहाँ भी हाँक लगाता रहता था और आज भी लगा रहा था, “हड़ताल का तिरसठवाँ दिन…जितेन्द्रनाथ दास की हालत नाज़ुक।”
कोलतार की सड़क, सितम्बर का महीना और टीक दोपहरी की चिलचिलाती धूप। गालों से पसीना बहने लगा तो भी बायें बाजू पर अख़बार का बंडल रखे और बायें हाथ से पसीना पोंछते हुए मैं तेज़-तेज़ चल रहा था और हाँक लगा रहा था, “अख़बार! आज का ताज़ा अख़बार!!”  
साबुन बाज़ार पार करके जब मैं बड़े बाज़ार के चौक में आया तो मेरे पास चौदह-पंद्रह अख़बार ही शेष रह गये थे। इस बाज़ार में आठ-दस दुकानदार स्थायी ग्राहक थे। इसलिए चलते-फिरते ग्राहकों की की बजाय मुझे उन्हें अख़बार देना था। लेकिन हड़ताल का तिरेसठवाँ दिन था, जितेन्द्र(नाथ दास) और शिव वर्मा की हालत नाज़ुक थी और लोग क्रांतिकारियों के इस महान उत्सर्ग की कहानी पढ़ने-जानने के लिए उतावले थे। अख़बार का महत्व बढ़ गया था। पढ़ने वाले मेरे पीछे लपक रहे थे।
“अख़बार वाले, एक अख़बार मुझे देना।”
“और मुझे भी देना।”
कोई दस-बारह ग्राहक एक-साथ अख़बार माँग रहे थे। मैं चलते-चलते रुका और विनीत भाव से उत्तर दिया, “अब अख़बार नहीं है।”
“क्यों, ये हैं तो सही!”
“सिर्फ़ दो हैं।” मैंने अलग-अलग करके अख़बार दिखाये और कहा, “ये मुझे स्थायी गाहकों को देने हैं।”
“दुकान पर होंगे?” किसी ने पूछा।
“यह आप वहाँ जाकर मालूम कर लीजिए।” मैंने उत्तर दिया। साथ ही मेरे मन में विचार उठा कि चटपट दुकान पर पहुँचूँ। शायद बेचने के लिए कुछ अख़बार और मिल जायँ। वैसे इसकी संभावना कम थी। बढ़ रही माँग से स्पष्ट था कि अख़बार अब दुकान पर भी नहीं होंगे। तो भी, हाथ के अख़बार स्थायी ग्राहकों को दिये और मैं लंबे-लंबे डग भरता हुआ दुकान की ओर चला। दुकान बाज़ार के अंत में, बाइबिल सोसाइटी के सामने वाली नुक्कड़ पर स्थित थी। उस पर अमरसिंह नाम का अधेड़ व्यक्ति बैठता था।
मैं दुकान पर पहुँचा तो देखा कि वहाँ ग्राहकों की भीड़ लगी है। सभी एक स्वर में चिल्ला रहे थे, “हमें अख़बार दो, हमें अख़बार दो।”
“अख़बार अब नहीं रहे, नहीं रहे।” अमरसिंह के बार-बार समझाने का उन पर कुछ भी असर नहीं हो रहा था। जैसे उन्होंने अख़बार खरीद ले जाने की शपथ ग्रहण कर ली हो।
“तुम्हारे पास अख़बार है?” चार-पाँच व्यक्ति एक-साथ मेरी ओर लपके।
“सब बिक गये।” मैंने हाथ फैला दिये।
एक हफ्ता पहले हालत यह थी कि सारे बाज़ार में घूम जाने के बाद भी अख़बार काफी संख्या में बच जाते थे और मैं उन्हें बस-अड्डे, होटलों और अदालत में घूम-फिरकर बेचा करता था। कोई इक्का-दुक्का ग्राहक मिल जाता था तो बड़ी खुशी होती थी। आम तौर पर लोग मेरी आवाज़ पर कोई ध्यान नहीं देते थे, पास से यों चुपचाप गुज़र जाते थे जैसे अख़बार उनके लिए बेकार की चीज़ हो, अख़बार और देश की राजनीति से उनका कोई संबन्ध न हो! लेकिन यकायक हवा बदली तो ऐसी बदली कि लोगों के पास जाने की बजाय लोग खुद अख़बार खरीदने आते थे। दुकान के सामने भीड़ लगी थी। जानते थे कि अख़बार नहीं है और लाख माँगने पर भी नहीं मिलेगा। फिर भी, समवेत स्वर में चिल्ला रहे थे, “अख़बार दो, अख़बार दो।” और अमरसिंह उसी स्वर में सिर हिलाकर उत्तर दे रहा था, “नहीं है, नहीं है।”
दरअसल, यह देशभक्ति का, भूख हड़ताली क्रांतिकारियों के प्रति स्नेह और लगाव का प्रदर्शन था। जनसमूह की मुद्रा इस समय देखते ही बनती थी।
“देशवासियो!” एक तीखी आवाज़ ने सबको चौंका दिया।
बाईं ओर से एक ताँगा आता दिखाई पड़ा। ताँगे पर लाऊडस्पीकर लगा था और तिरंगा फहरा रहा था।
“देशवासियो! अभी-अभी ख़बर आयी है कि भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथी जितेन्द्रनाथ दास जेल में शहीद हो गये। उनकी भूख हड़ताल का यह तिरसठवाँ दिन था। फिरंगी के अत्याचार ने देश के एक-और सपूत की जान ले ली। इस अत्याचार के विरुद्ध शहर में हड़ताल रहेगी और शाम को रामलीला ग्राउंड में शोकसभा होगी।”
लोगों के चेहरे झुक गये और वे जाने किस सोच में डूब गये।
देखते ही देखते दुकानें बंद हो गयीं।
                                                                                                                             (प्रस्तुति:बलराम अग्रवाल)

बुधवार, 16 जनवरी 2013

बापू कहे जाने के योग्य नहीं है आसाराम/बलराम अग्रवाल

 आज शब्द साधकआदरणीय अरविंद जी का जन्मदिन है। कल उनका एस॰एम॰एस॰ मिला था। लिखा था—‘बापू आसाराम के कहने का मतलब है कि अपहरण करके लंका ले जाते समय सीता रावण को यदि भैय्या कह देतीं तो लंका का युद्ध टल सकता था।
                                                                                                                   गूगल से साभार
दरअसल दिल्ली गैंगरेप के संदर्भ में टीवी पर आसाराम की टिप्पणी को देखकर उसके लिए सम्मान की भावना मन में रह जाने का कोई सवाल ही नहीं रह जाता। मैं उसके और स्त्रीविरोधी उसके समस्त अनुयायियों के अवलोकनार्थ वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड से यह प्रकरण उद्धृत कर रहा हूँ जो तत्कालीन रावण के चरित्र को अंशत: उद्घाटित करता है। मेरा मानना है कि हर बलात्कारी रावण का ही अंश है और उसके लिए मृत्युदण्ड से कम की सज़ा का प्रावधान भारतीय दण्ड संहिता में नहीं होना चाहिए:
                                                                                                                  गूगल से साभार
स्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित निशाचरों की वह विशाल सेना कुछ ही देर में गहरी नींद में सो गई। परंतु महापराक्रमी रावण उस पर्वत के शिखर पर चुपचाप बैठकर चन्द्रमा की चाँदनी से चमकते उस पर्वत के विभिन्न स्थानों की नैसर्गिक छटा को निहारने लगा। इसी बीच समस्त अप्सराओं में श्रेष्ठ सुन्दरी रम्भा उस मार्ग से आ निकली। वह पूरी तरह सजी हुई थी। वह सेना के बीच से होकर जा रही थी, इसलिए रावण ने उसे देख लिया। देखते ही वह काम के अधीन हो गया और खड़ा होकर उसने जाती हुई रम्भा का हाथ पकड़ लिया। वह लाज से गड़ गई, परन्तु रावण मुस्कराता हुआ बोला—“सुन्दरी! किसके भाग्य के उदय का समय आया है, जो तुम स्वयं चलकर जा रही हो? इन्द्र, उपेन्द्र या अश्विनीकुमार ही क्यों न हों, इस समय कौन पुरुष मुझ रावण से बढ़कर है? इस समय तुम रावण को छोड़कर कहीं और जाओ, यह अच्छी बात नहीं है। 
रावण का नाम सुनने मात्र से रम्भा के रोंगटे खड़े हो गए। वह काँप उठी और हाथ जोड़कर बोली—“प्रभो! मुझ पर कृपा कीजिए। आपको ऐसी बात मुँह से नहीं निकालनी चाहिए क्योंकि आप मेरे पिता के समान हैं। यदि कोई दूसरा पुरुष मेरा तिरस्कार करे तो उससे भी आपको मेरी रक्षा करनी चाहिए। मैं धर्मत: आपकी पुत्रवधू हूँयह आपसे सच्ची बात बता रही हूँ।
उसकी बात सुनकर रावण ने उससे कहा—“यदि यह सिद्ध हो जाय कि तुम मेरे पुत्र की पत्नी हो, तभी मेरी पुत्र-वधू हो सकती हो, अन्यथा नहीं।
इस पर रम्भा ने कहा—“राक्षसशिरोमणि! धर्म के अनुसार मैं आपके पुत्र की ही पत्नी हूँ। आपके बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकूबर मेरे प्रियतम हैं। इस समय मैं उन्हीं से मिलने जा रही हूँ।
रम्भा की इस बात पर रावण ने उससे कहा—“रम्भे! पुत्र-वधू वाला नाता उन स्त्रियों पर लागू होता है, जो किसी एक पुरुष की पत्नी हों। तुम्हारे देवलोक की स्थिति ही दूसरी है। वहाँ सदा से यही नियम चला आ रहा है कि अप्सराओं का कोई पति नहीं होता। वहाँ कोई एक स्त्री के साथ विवाह करके नहीं रहता।
यों कहकर राक्षस ने रम्भा को जबर्दस्ती एक शिला पर बैठा लिया और उसके साथ समागम किया। रम्भा के पुष्पहार टूटकर गिर गए, सारे आभूषण अस्त-व्यस्त हो गए। उपभोग के बाद रावण ने रम्भा को छोड़ दिया। वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी। उसके हाथ काँपने लगे। लज्जा और भय से काँपती हुई वह नलकूबर के पास गई और हाथ जोड़कर उसके पैरों पर गिर पड़ी। उसे इस अवस्था में देखकर नलकूबर ने पूछा—“रम्भे! क्या बात है? तुम इस तरह क्यों मेरे पैरों पर पड़ गयीं?
थर-थर काँपती उस अबला ने लंबी साँस खीचकर पुन: हाथ जोड़ लिए और जो कुछ हुआ था, सब ठीक-ठीक बताना शुरू कर दिया—“देव! बहुत बड़ी सेना साथ लेकर दशमुख रावण देवलोक पर आक्रमण करने के लिए आया है। उसने आज की रात यहीं डेरा डाला है। आपके पास आते हुए उसने मुझे देख लिया और मेरा हाथ पकड़कर पूछने लगातुम किसकी स्त्री हो? मैंने सब-कुछ उसे सच-सच बता दिया, लेकिन उसने मेरी वह बात नहीं सुनी। मैं बार-बार कहती रही कि मैं आपकी पुत्र-वधू हूँ; लेकिन मेरी सारी बातें अनसुनी करके उसने बलपूर्वक मेरे साथ अत्याचार किया।

बुधवार, 7 नवंबर 2012

बुजुर्ग तो ‘बी’ सम्बोधन ही देना चहते होंगे/बलराम अग्रवाल

                                                                                                        चित्र:आदित्य अग्रवाल

दोस्तो, बैठे-बैठे एक चर्चा ऐसी कर ली जाय जिसे खाली दिमाग शैतान का घर भी  कह सकते हैं। उर्दू में बेवा शब्द विधवा स्त्री के लिए प्रयुक्त होता है। मुझे इस शब्द में अभिव्यक्ति लाघव नजर आता है। वह यों कि उर्दू में पत्नी के लिए बीवी और सम्मानित अन्य महिलाओं के लिए बी अथवा बीबी शब्द का प्रयोग होता है। मुस्लिम समाज के विद्वान वैयाकरणों और सहृदय शब्दपुरोधाओं ने उस स्त्री के लिए, जो पति की मृत्यु के बाद बीवी कहलाने की हक़दार नहीं रहती, अन्य महिलाओं जैसा सम्मानजनक सम्बोधन देने पर विचार किया होगा। निश्चित रूप से अलग-अलग मत सामने आये होंगे जिनमें उसे पुन: बी सम्बोधन देने जैसा प्रस्ताव भी अवश्य आया होगा। तब विरोध का स्वर इस रूप में उभरा होगा कि अन्य स्त्रियों से इस स्त्री की वैवाहिक स्थिति के अलगाव का कैसे पता चलेगा? तय हुआ होगा कि इस अलगाव को बनाए रखने के लिए उस स्त्री (बीवी) के वाउ को ‘बे-वाउ कर सम्बोधित किया जाये तो कोई दुविधा नहीं रहेगी। इसलिए ऐसी स्त्री के लिए बीबे-वाउ शब्द तय हुआ लेकिन सम्बोधित करने में यह किंचित असुविधाजनक-सा था। अभिव्यक्ति लाघव के कारण इस शब्द में से पहले 'बी' खत्म होकर 'बेवाउ' सामने आया जो आगे चलकर 'बेवा' रह गया। बुजुर्गों ने तो इज्ज़त देने की भरपूर कोशिश की थी, शॉर्टकट की स्वाभाविक मानवीय आदत को क्या कहें!
 

सोमवार, 5 नवंबर 2012

समीक्षा-यादों की लकीरें



उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल के संस्मरणों की पुस्तक 'यादों की लकीरें' की समीक्षा 'अपेक्षा' पत्रिका के अप्रैल-जून २०१२ अंक में प्रकाशित हुई है। समीक्षक हैं कवि अशोक आंद्रे।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

मेरी हस्कल के नाम जिब्रान के कुछ पत्रों के अंश…



खलील जिब्रान
मेरी, सबसे बड़े अचरज की बात तो यह है कि ग़ज़ब की खूबसूरत इस दुनिया में, जो दूसरे इंसानों के लिए अनजानी है, हाथ में हाथ डाले हम हमेशा साथ घूमते हैं। एक-दूसरे के हाथ को पूरा खींचकर हम जीवन से रस खींचते हैंऔर नि:संदेह जीवन हमें वह देता है।
 (जिब्रान द्वारा 22 अक्टूबर 1912 को लिखे एक पत्र का अंश)
कोई व्यक्ति बिना महान हुए आज़ाद हो सकता है, लेकिन आज़ाद हुए बिना कोई भी महान नहीं हो सकता।
(जिब्रान द्वारा 16 मई 1913 को मेरी को लिखे एक पत्र का अंश)
सच्चा संन्यासी घने जंगल में खोजने के लिए जाता हैन कि स्वयं को खोने के लिए।
(जिब्रान द्वारा 8 अक्टूबर 1913 को मेरी को लिखे एक पत्र का अंश)

मेरी हस्कल का पेंसिल स्केच
तुम्हारे साथ, मेरी, आज उसने कहा,घास की एक पत्ती-सा बर्ताव करना चाहता हूँ जो वैसे ही नाचती है जैसे हवा उसे नचाती है। इस पल की नज़ाकत के मुताबिक बात करनी चाहिए। वही करूँगा। 
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 10 जनवरी 1914 से)
खुली सड़कों पर पैदल चलते रहने-जैसा बड़ा काम करना चाहता हूँ। जरा सोचो, मेरी, ऐसे में तूफान आ जाए तो क्या होगा! निर्द्वंद्व गति के माध्यम से जीवन देने वाले महाभूतों को देखने से बेहतर भी कोई दृश्य हो सकता है क्या?
(दिनांक 24 मई 1914 को लिखे एक पत्र का अंश)
अब मैं अपने-आप को तुम्हें सौंप सकता हूँ। दरअसल, किसी दूसरे के हाथों में अपने-आप को आप तभी सौंप सकते हैं जब वह जानता हो कि आप कर क्या रहे हैं। जब उसके दिल में आपके लिए आदर और प्यार हो। वह आपको आपकी आज़ादी दे सकता हो।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 20 जून 1914 से)
काव्य क्या है?दृष्टि की व्यापकता; और संगीत?श्रवण की व्यापकता।
(मेरी हस्कल के जर्नल 20 जून 1914 से)
कभी-कभी तुमने बोलना भी शुरू नहीं किया होता कि मैं पूरी बात समझ जाता हूँ।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 28 जुलाई 1917 से)
ज्ञान यानी पंखदार जीवन।
(दिनांक 15 नवंबर 1917 के एक पत्र का अंश)
तुमने मेरे काम में और व्यक्तित्व निर्माण में मेरी मदद की। मैंने तुम्हारे काम में और व्यक्तित्व निर्माण में तुम्हारी मदद की। मैं शुक्रगुजार हूँ परमात्मा का कि उसने मुझे और तुम्हें बनाया। 
(मेरी हस्कल के जर्नल 12 मार्च 1922 से)
अगर मुझे धूप और गरमाहट पसंद है तो बिजली और तूफान के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 12 मार्च 1922 से)
हृदय की आवाज़ सुनो। हर बड़े काम में वह सच्चा सलाहकार है। मन सीमित है। क्या करना चाहिएइसका निश्चय वह दिव्यशक्ति करती है जो हम-सब में विद्यमान है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 12 मार्च 1922 से)
 तुम्हारे और मेरे बीच रिश्ता मेरी ज़िंदगी की खूबसूरत घटना है। इससे पहले मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। यह दिव्य है।
(मेरी हस्कल के जर्नल 11 सितम्बर 1922 से)
बिशेरी स्थित खलील जिब्रान म्यूजियम में मूर्तिशिल्प
तुम्हें खुश देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। खुशी तुम्हारे लिए आज़ादी का रूप है। जितने भी लोगों को मैं जानता हूँ, उनमें सबसे अधिक आज़ाद तुम्हें होना चाहिए। यह खुशी और यह आज़ादी तुमने खुद पायी है। ज़िंदगी तुम्हें सुख और सुविधा देने वाली नहीं थी लेकिन तुम स्वयं ज़िंदगी को सुख और सुविधा देने वाली बन गई हो।
(जिब्रान के पत्र दिनांक 24 जनवरी 1923 से)
मुझे तुम्हारी खुशी की वैसी ही चिंता है जैसी तुम्हें मेरी खुशी की। अगर तुम्हारा मन शांत नहीं है तो मेरा कैसे रह सकता है।
(दिनांक 23 अप्रैल 1923 को लिखित जिब्रान की डायरी से)
बुद्धिमान लोगों के बीच विवाह का उपयुक्त आधार मित्रता यानी एक-दूसरे की रुचि का ख्याल रखना है। विचार-विमर्श करने की क्षमता है। एक-दूसरे के विचारों और आकांक्षाओं को समझना है।
(मेरी हस्कल के जर्नल 26 मई 1923 से)

आप किसी गाँव में रहें या महानगर में, क्या फर्क पड़ता है? असली ज़िंदगी तो आपके-अपने भीतर है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 27 मई 1923 से)
विवाह किसी भी व्यक्ति को वह अधिकार नहीं देता जिन्हें वह दूसरे व्यक्ति में नहीं देखना चाहता; और ना ही उससे अलग कोई आज़ादी देता है जितनी वह दूसरे व्यक्ति को देता है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक  27  मई  1923 से)
पेड़ों पर कलियाँ लदी थीं, चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, घास पर ओस थी, सारी धरती जगमगा रही थी। और एकाएक मैं पेड़ों में, फूलों में, चिड़ियों में और घास में तब्दील हो गया—‘मैं का नामोनिशान न रहा।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 23 मई 1924 से)
मैं जितना बोल नहीं पाता हूँ, तुम उससे कहीं ज्यादा सुन लेती हो। तुम अपनी चेतना से सुनती हो। मेरे साथ तुम वहाँ उतर जाती हो जहाँ मेरे शब्द तुम्हें नहीं लेजा सकते।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 5 जून 1924 से)


कोई भी मानवीय रिश्ता दूसरे पर अधिकार का द्योतक नहीं है। हर दूसरा व्यक्ति भिन्न है। दोस्ती में या प्यार में, दोनों समान रूप से उस ओर हाथ बढ़ाते हैं जिस ओर दूसरा कमजोर पड़ता है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 8 जून 1924 से)


बुधवार, 22 अगस्त 2012

श्रीकृष्ण : पूर्ण पटाक्षेप / बलराम अग्रवाल


श्रीमती कमला देवी
अभी, दस मिनट पहले की बात है। राजेन्द्र जैन जी मिल गये थेश्रीकृष्ण जी के दामाद हैं वे। पहले आँखों ही आँखों में अभिवादन किया, फिर स्कूटर रोककर बोले—“वो भी गईं।
मुझे समझने में देर नहीं लगी कि वह किनके बारे में मुझे बता रहे हैं। चौंककर पूछा,कब?
15 अगस्त को…सुबह साढ़े दस बजे।
सूरज पूरा अस्त हो गया… मेरे मुँह से निकला। यह कहते हुए श्रीमती कमला देवी(धर्मपत्नी श्री श्रीकृष्ण) के हवाले से लिखी मेरी एक टिप्पणी के जवाब में उनके प्रति कहे गए हिन्दी के भद्र(?) समझे जाने वाले एक लेखक के वे अभद्र शब्द भी मेरे जेहन में कड़ुआहट घोल गए जो उन्होंने सिर्फ़ इसलिए कहे थे कि श्रीमती श्रीकृष्ण (यानी श्रीमती कमला देवी) ने कभी उनका कृतघ्न चरित्र उन्हें दिखाने की पहल की थी और आत्ममुग्धताजनित अहंकार के चलते जिस कृतघ्नता को वे आज तक भी नहीं पहचान पाए। श्रीमती श्रीकृष्ण के चले जाने के बाद अपनी ही गाली को वे अब उम्रभर अपने सिर और कंधों पर ढोए फिरने को शापित हो गये हैं।
राजेन्द्र मेरे मन के झंझावात को नहीं जान सकते थे। मेरी बात सुनकर वे कुछ न कह सके, चुप खड़े रहे।
श्रीकृष्णजी को नैतिक सम्बल देते रहने वाली शक्ति भी आखिर चली गई। दु:खित स्वर में मैंने  आगे कहा।
हमारे लिए यह एक युग का अन्त है… वह भी शोकभरे स्वर में बोले।
निश्चित रूप से। मैंने उनकी भावना का समर्थन किया,वे कुशलतापूर्वक घर को न सँभाले रखतीं तो श्रीकृष्णजी अपना ध्यान उत्कृष्ट पुस्तक-उत्पादन में इस गहराई तक केन्द्रित न कर पाते।
इसके बाद कुछ पल हम चुप खड़े रहे, बोलने के लिए दोनों के ही पास जैसे कुछ विशेष न हो। फिर बड़ी मायूसी के साथ राजेन्द्र जी ने कहा,उन्हें दरअसल अपनों ने ही मारा।
उन्हें से उनका तात्पर्य श्रीकृष्ण दम्पति से था, अकेली श्रीमती कमला देवी से नहीं। मैं ‘उन्हें अपनों ने ही मारा में छिपा उनका इशारा भी समझ रहा था लेकिन क्या कहता। हर व्यक्ति का अपना-अपना पक्ष होता है। हमारे यानी अजय जी(मेधा बुक्स) और मेरे साथ अन्तिम मुलाकत में अपनों से संवादहीनता का हल्का-सा संकेत गहरी पीड़ा के साथ श्रीकृष्णजी ने भी किया था; लेकिन असलियत तो यह थी कि उन्हें अपनों ने भी मारा और ग़ैरों ने भी।
दोस्तो, गत 07 दिसम्बर 2011 को अपंजीकृत पराग प्रकाशन के सुप्रतिष्ठा-सम्पन्न संस्थापक तथा बालसाहित्यकार श्रीकृष्ण जी ने नश्वर देह को त्यागा था और गत 15 अगस्त, 2012 को उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमला देवी भी संसार से विदा हो गईं।
शोक-संवेदना व्यक्त करने की इच्छा वाले महानुभावों को मैं उनकी दो पुत्रियों के नाम, पते और फोन नम्बर नीचे लिख रहा हूँ

1॰ Mrs. Nisha Gupta (daughter, Ph. 88oo184598)
Mr. Neeraj Gupta (Son-in-law, Ph. 98103389687)
            G-109, Sector 56,
Near Mother Dairy,
Janta Flats, Noida (UP)

2॰ Mrs. Seema Jain (daughter, Ph. 011-22321612)
Mr. Rajendra Jain (Son-in-law, Ph. 9310962206)
N-10, Gali No. 1, Uldhanpur,
Naveen Shahdara, Delhi-110032

ॐ शान्ति!!!

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

पिज्ज़ा, बर्गर, पास्ता, फ्रेंचफ्राई…


सर्वोत्तम कथन
पिज्ज़ा, पास्ता, बर्गर, फ्रेंच फ्राईज़ के बारे में:

कुछ पल जीभ पर, उम्रभर तोंद और नितम्बों पर…
 
सभी चित्र गूगल इमेज से साभार