गुरुवार, 28 जून 2012

चुपचाप चले गए अमर गोस्वामी/बलराम अग्रवाल

दोस्तो,
कथाकार अमर गोस्वामी
साहित्य की दुनिया में अमर गोस्वामी न तो अनजाना नाम है और न ही नजरअन्दाज़ कर देने वाला। फिर भी, हैरान हूँ कि अभी तक किसी सूचना-तंत्र पर उनके चले जाने का समाचार दिखाई-सुनाई नहीं पड़ा। दिनांक 26 जून 2012 को दोपहर 11-30 के लगभग अजय जी (मेधा बुक्स) का फोन आया था। उन्हें उमेश जी ने और उमेश जी को डॉ॰ शेरजंग गर्ग के माध्यम से अमर गोस्वामी का निधन हो जाने और दोपहर 12 बजे के लगभग गाजियाबाद में हिंडन-नदी के तटवर्ती श्मशान में अंतिम संस्कार किए जाने का समाचार मिला था। उस दिन संयोग से 12 बजे से 2 बजे तक के लिए मैं अत्यन्त व्यस्त था इसलिए पहुँच नहीं सकता था; लेकिन उमेश जी व अजय जी ने वह दायित्व निभाया।
उसी दिन शाम को घर लौटने पर मैंने रूपसिंह चंदेल, भारतेन्दु मिश्र, सुभाष नीरव आदि को फोन पर सूचित किया तो वे भी चौंके। गरज यह कि शाम तक भी किसी तक उनके निधन की सूचना नहीं पहुँची था। कल रात अजय जी से पुन: बात हुई। अमर गोस्वामी के बारे में उन्हें जब सूचना-तन्त्र की इस विफलता के बारे में बताया तो उन्होंने सुझाव दिया कि मैं यह समाचार फेस बुक पर दे दूँ। इस हेतु तलाश हुई उनके संक्षिप्त परिचय और फोटो की। तो संक्षिप्त परिचय तो रे माधव की वेव साइट पर उपलब्ध हो गया लेकिन इन्टरनेट पर अमर गोस्वामी का चित्र तलाश करने की जद्दोजहद में अमर सिंह, अमर कुमार, फलाँ-फलाँ गोस्वामी आदि पता नहीं किस-किस के अनेक मुद्राओं में फोटो मिलते रहे, अमर गोस्वामी का एक भी नहीं मिला।  हिन्दी बुक सेन्टर आदि पुस्तक-विक्रेताओं की वेब साइट्स पर भी अमर गोस्वामी की पुस्तकों के विक्रय हेतु टाइटिल तो खूब नजर आए, उनके निधन सम्बन्धी कोई सूचना या उनका फोटो एक भी नजर नहीं आया। जाहिर है कि अमर गोस्वामी फोटो खिंचवाने की लालसा से दूर के व्यक्ति थे।
वे काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। मालूम चला कि गत दिनों वे नोएडा से गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में शिफ्ट कर गए थे।  मैं रेमाधव की वेब साइट से उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ। फोटो काफी जद्दोजहद के बाद उमेश जी (आलेख प्रकाशन) के खजाने से मिली है।
निधन वाला अंतिम कॉलम दुर्भाग्यवश मुझे जोड़ना पड़ा है।
आइए, उस श्रमशील व्यक्ति की आत्मा को शान्ति और परिजनों को धैर्य प्रदान करने की प्रार्थना परमपिता से करें।
अमर गोस्वामी
जन्म : 28 नवम्बर 1945 को मुलतान के एक बांग्लाभाषी परिवार में। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर करने के बाद बुढ़ार (शहडोल, म.प्र.) और भरवारी के (इलाहाबाद उ.प्र.) दो महाविद्यालयों में अध्यापन, फिर लम्बे समय से पत्रकारिता में।
सम्प्रति : गाजियाबाद (उ.प्र.) स्थित रेमाधव पब्लिकेशन्स' के मुख्य संपादक के पद पर कार्यरत।
कार्य-अनुभव : कथा-पत्रिकाकथान्तर', बाल पत्रिका सपा और कांग्रेस पार्टी द्वारा संचालित भारती फीचर्स' का संपादन। विकल्प' (सं. शैलेश मटियानी), आगामीकल (सं. नरेश मेहता), ‘मनोरमा' (सं. अमरकान्त), ‘गंगा' (सं. कमलेश्वर) सण्डे आबजर्वर' (सं. उदयन शर्मा), ‘अक्षर भारत' और नया ज्ञानोदय' (सं. प्रभाकर श्रोत्रिय) आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर संपादन सहयोग।
प्रकाशित कृतियां : हिमायती', ‘महुए का पेड़', ‘अरण्य में हम', ‘उदास राधोदास', ‘बूजो बहादुर', ‘धरतीपुत्र', ‘महाबली', ‘इक्कीस कहानियां', ‘अपनी-अपनी दुनिया', ‘कल का भरोसा' तथा भूलभुलैया' (सभी कहानी-संग्रह)इस दौर में हमसफर' उपन्यास किताबघर, नयी दिल्ली से प्रकाशित। बच्चों की कहानियों की 16 पुस्तकें तथा एक बाल उपन्यास शाबाश मुन्नूप्रकाशित। बांग्ला से हिन्दी में साठ से ज्यादा अनूदित पुस्तकें प्रकाशित। 
पुरस्कार-संपादन : केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा हिमायती' कहानी-संग्रह पर अहिन्दी भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कार, 1988, दिल्ली हिन्दी साहित्य सम्मेलन, सनेही मण्डल नोएडा द्वारा नोएडा रत्नसे सम्मानित, 1996 इण्डो रशियन लिटरेरी क्लब, नयी दिल्ली द्वारा बाल लेखन के लिए सम्मानित, 1999 हिन्दी एकेडेमी, दिल्ली द्वारा बाल उपन्यास शाबाश मुन्नू' पुरस्कृत, 2005, उ.प्र. हिन्दी संस्थान लखनऊ द्वारा इस दौर में हम सफर' उपन्यास पर प्रेमचन्द पुरस्कार, 2005
निधन : 26 जून, 2012, गाजियाबाद में हिंडन नदी के तटवर्ती श्मशान में उसी दिन पंचतत्त्व में विलीन।

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

आज असुंदरता, कुरूपता भव से ओझल/बलराम अग्रवाल

किसी समय निरा पथरीला होने के कारण खाण्डवप्रस्थ कहे जाने वाले इस भू-भाग को पाण्डवों के हितैषी इन्द्र की कृपा से सुधरने-सँवरने का मौका मिला और इसे इन्द्रप्रस्थ कहा जाने लगा। तब से, पता नहीं क्या-क्या दिन देखता हुआ यह भूखण्ड कब नगर से नगरी यानी पुरुष से स्त्री बन गया, खुद इसे भी शायद ठीक-ठीक याद न हो। बहरहाल, अब यह दिल्ली’ है और देश का दिल बनी 
      एक ज़माना था जब दिल्ली के मूल निवासी उत्तर प्रदेश की ओर वाले जमुनापारियों को उस निगाह से देखते थे, जिस निगाह से आम तौर पर आज एक प्रदेश विशेष के लोग देखे जाते हैं। मैं जब जामा मस्जिद के नज़दीक मटिया महल में स्थित अपने बड़े मामाजी की ससुराल जाता था तो नानी(मामाजी की सास) लो आ गए पुरबिए कहकर मेरी अगवानी करती थीं। मेरे गृहनगर बुलन्दशहर में, पुरबिया सम्बोधन इटावा-एटा-मैनपुरी-आजमगढ़ आदि उत्तर प्रदेश के धुर पूरबी निवासियों को दिया जाता था और इतने गहरे प्रेम के साथ कि वो बेचारे चिढ़-से जाते थे। इसलिए मैं भी चिढ़ जाता था और नानी से पूछता थाहम पुरबिए कैसे हैं नानी?
जमुना के पार रहने वाले सब पुरबिए हैं। वह एक झटके में सारे तर्क खत्म करते हुए कहती थीं।
           
लाल कनेर
आज नानी नहीं हैं। होतीं, तो देखतीं कि कैसे दिल्लीवाले अब जमनापार आकर पुरबियों के बीच खुशी-खुशी रहते हैं। पुरानी दिल्ली के मकान दिल्लीवालों की सन्ततियों में बँटते-बँटते दरअसल सुविधापूर्वक रहने लायक रह नहीं गए हैं। मात्र ढाई-ढाई, तीन-तीन हाथ चौड़ी गलियाँ जब पैदल आदमी को ही मुश्किल से बर्दाश्त करती थीं तो साइकिलों, मोटर-साइकिलों, स्कूटरों और रिक्शाओं को कैसे बर्दाश्त कर सकती थीं। फिर, आमदनी और जरूरत कितनी भी कम क्यों न हो, दिखावा करने में दिल्लीवाले किसी से पीछे शायद ही कभी रहे हों। कलफदार कपड़े और गले में सोने की चेन डालने का मज़ा ही क्या रहा। अगर किराए की टैक्सी को अपनी खुद की गाड़ी न बताया; और खुद की गाड़ी होने का भी क्या मज़ा रहा, अगर उसे अपने घर के दरवाज़े तक न लाया ले-जाया जा सका। इस लिहाज़ से वे गलियाँ अब उनके रहने लायक रहीं नहीं। सो दिल्लीवाले  
आकाश छूने को बेताब--बोगनबेलिया
पुरबियों में आ मिले। यहाँ की कुछ कालोनियाँ नियोजित ढंग से बसी हैं। मज़े की बात तो यह है कि बावजूद तमाम बदइन्तज़ामियों और प्रशासकीय लापरवाहियों के जमनापार का इलाकां निम्न, निम्न-मध्य और मध्य-मध्य आय-वर्ग के लोगों के रहने लायक बना हुआ है; और इन दिनों तो चारों ओर बहार है।  प्रकृति के चितेरे कवि सुमित्रानन्दन पंत की ग्राम्या में लिखित ये पंक्तियाँ अनायास ही याद आ जाती हैं: 
चिर परिचित माया बल से बन गए अपरिचित,
निखिल वास्तविक जगत कल्पना से ज्यों चित्रित!
आज असुंदरता, कुरूपता भव से ओझल!
सब कुछ सुंदर ही सुंदर, उज्वल ही उज्वल!

आइए, देखते हैं पूर्वी दिल्ली के सीलमपुर-वेलकम से सटे झील वाले पार्क  की कुछ  विशेष छटाएँ
नेवलों, चूहों या ठण्डक की तलाश में कुत्ता

 
जंगल जलेबी भरपूर फूल रही है, फल अगले माह तक
इससे ज्यादा सुलभ शौचालय आसपास नहीं हैसभी चित्र: बलराम अग्रवाल             
 

गुरुवार, 1 मार्च 2012

श्रीकृष्ण : दु:खद पटाक्षेप / बलराम अग्रवाल


खुश रहना देश के प्यारो, अब हम तो सफ़र करते हैं…7 दिसम्बर 2011 को चले भी गए श्रीकृष्ण जी और हमको खबर तक नहीं!!!

मैंने सोचा नहीं था कि मुझे इतनी जल्दी अपनी पूर्व पोस्ट के बारे लिखना पड़ेगा और वह भी दु:खद। वस्तुत: तो मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि मैं किस तरह इस बात को शुरू करूँ। अनेक तरीके दिमाग में आ रहे हैं, लेकिन बेहतर यही है कि मैं खुद पर लानत भेजने से इसकी शुरूआत करूँ। लानत है…! लानत है…!! लानत है…!!!
गत एक वर्ष से ऊपर हो गया। अजय जी (मेधा बुक्स), जब भी मुलाकात होती, 11 जनवरी 2011 को श्रीकृष्ण जी से हुई मुलाकात को कलमबद्ध करके प्रकाशनार्थ किसी पत्र-पत्रिका में भेजने या नेट पर किसी ब्लॉग पर ही डाल देने की याद दिलाते; लेकिन संवेदनहीन दिल्ली में गत 20-22 वर्षों से खाते-पीते, साँस लेते मैं भी अब दिल्लीवाला हो गया हूँ। उनका अनुरोध मेरी संवेदनहीनता और तज्जनित लापरवाही की भेंट चढ़ता रहा, टलता रहा। वर्तमान पुस्तक मेला शुरू होने से दो दिन पहले अन्तत: वे बोले—‘बलराम जी, अगर आपने आज ही श्रीकृष्ण जी वाला मेरा काम नहीं किया तो मैं समझूँगा कि आप भी उन बहुसंख्यक लेखकों की जमात में हैं जो केवल कागजों पर ही संवेदनशीलता की बातें करते हैं।
मुझे उनकी बात लग गई हो, ऐसी बात नहीं थी। फिर भी, न जाने किस ताकत ने काम किया कि घर पहुँचते ही मैंने पुस्तक, व्यवसाय और श्रीकृष्ण को ध्यान में रखकर लिखना शुरू कर दिया। अवसर क्योंकि 20वाँ विश्व पुस्तक मेला शुरू होने का था और श्रीकृष्ण जी पुस्तक व्यवसाय से जुड़ी महान हस्ती थे, इसलिए लेख का पूर्वार्द्ध अनायास ही पुस्तक व्यवसाय पर ही केन्द्रित रहा, श्रीकृष्ण जी का उल्लेख बाद में शुरू हुआ। 25 फरवरी की सुबह (रात लगभग 12॰15 बजे) उसे मैंने अपने ब्लॉग अपना दौर में पोस्ट कर दिया। बावजूद इस कमी के, कि वह पूरी तरह श्रीकृष्ण जी पर केन्द्रित नहीं था, अनेक लेखकों द्वारा उनसे जुड़े प्रसंगों पर चिन्ताएँ व्यक्त की गईं। उन चिन्ताओं को पढ़-सुनकर यह विश्वास मन में जमा कि दिल्ली निरी संवेदनहीन नहीं है और इन्सानियत खुशबू की तरह है जो कब्रिस्तान को भी महकाए रखती है। रूपसिंह चन्देल और सुभाष नीरव ने तो फैसला सुनाया कि मुझे उन्हें लेकर इसी शनिवार यानी 3 मार्च को श्रीकृष्ण जी से मिलाने को जाना है (वह इसलिए कि उनका लिखित पता न उन्हें मालूम था, न मुझे)। बाइत्तफाक यह जिक्र पुस्तक मेले में मेधा बुक्स के स्टाल पर भी हो गया जिसे सुनकर अजय जी ने कहा कि मेला खत्म होने के बाद किसी भी दिन चलो तो मैं भी साथ जाना चाहूँगा। बात मेला समाप्त होने के बाद जाने की तय हो गई। यहाँ तक कि कल फोन पर भी चन्देल ने याद दिलाया कि श्रीकृष्ण जी के यहाँ जाने का कार्यक्रम ज्यादा आगे नहीं खिसकाना है। इसी दौरान वरिष्ठ कथाकार नरेन्द्र कोहली जी का भी फोन आया था। उन्होंने बताया कि विश्वास नगर स्थित अपने आवास को छोड़कर गए श्रीकृष्ण जी का निश्चित पता-ठिकाना उन्हें उपलब्ध नहीं था, इसलिए वे उनकी कोई खैर-खबर नहीं ले पाए। पता मिल जाए तो वे उनसे मिलने जाना चाहते हैं। उनकी बात सही थी। श्रीकृष्ण जी ने अपने डूब जाने का अधिक प्रचार नहीं किया। वास्तविकता तो यह थी कि स्वयं मुझे भी श्रीकृष्ण जी के निवास की केवल लोकेशन ही मालूम थी, उनका लिखित पता या कोई फोन नम्बर नहीं मालूम था। कोहली जी मैंने उन्हें वह बाद में उपलब्ध करा देने का वादा कर दिया। अजय से जिक्र किया तो उन्होंने भी वही कहा कि हमें तो लोकेशन याद है, उसी के सहारे पहुँच जाते हैं। मैं कई दिनों तक इस शर्मिन्दगी को झेलता रहा कि कोहली जी को क्या जवाब दूँ? याद आया कि उनकी एक पुत्री का निवास नवीन शाहदरा में ही है। श्रीकृष्ण जी के आवास का पता और फोन नम्बर लेने के लिए आज सुबह मैं उधर चला गया। मकान की कॉल बेल अभी बजाने ही वाला था कि स्कूटर पर सवार एक नौजवान सज्जन वहाँ आकर रुके।
कहिए। उन्होंने पूछा।    
श्रीकृष्ण जी की बेटी का यही मकान है? मैंने पूछा।
जी हाँ। उन्होंने कहा।
मुझे उनके नोएडा वाले घर का लिखित पता चाहिए। मैं बोला।
बाबूजी तो अब रहे नहीं। उन्होंने कहा। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। अत: पूछा,मैं पराग प्रकाशन वाले श्रीकृष्ण जी की बात कर रहा हूँ।
जी हाँ। उन्होंने कहा,मैं उनका दामाद हूँ। आप अन्दर आइए।
यह सूचना इतनी दु:खद और अप्रत्याशित थी कि मैं भीतर तक हिल गया और मुझे तुरन्त बैठ जाने की जरूरत महसूस हुई। पता लिखवाकर लेने के लिए शायद न बैठना पड़ता; और अगर बैठना भी पड़ता तो उस बैठने और इस बैठने में घोर अन्तर था। बेटी और दामाद से ज्यादा बातें करने का माहौल मुझमें बचा नहीं था। श्रीकृष्ण जी के दामाद प्रिय राजेन्द्र जैन उनके नोएडा स्थित आवास का पता और फोन नम्बर एक कागज पर लिखने लगे।
7 दिसम्बर की सुबह वे चले गए। लिखते-लिखते उन्होंने बताया।
मम्मी जी की हालत भी खराब है। श्रीकृष्ण जी की बेटी सीमा बताने लगी,मैं भी जाती हूँ तो पहचान नहीं पाती हैं। पापाजी के जाने का उनके मन पर इतना गहरा सदमा है कि वे मान ही नहीं रही हैं कि पापाजी  चले गए। कहती हैंवे उधर दूसरी तरफ लेटे हुए हैं…
इस बीच राजेन्द्र जी ने श्रीकृष्ण जी के नोएडा आवास का पता लिखा कागज मेरी ओर बढ़ा दिया। इस पर अपने आवास का पता भी लिख दीजिए। मैं बोला।
जी। कहते हुए उन्होंने अपने आवास का पता भी उस पर लिख दिया।
मैं उक्त दोनों ही पतों और उनके फोन नम्बरों को नीचे लिख रहा हूँ

1.      Mrs. Nisha Gupta (daughter, Ph. 8800184598)
Mr. Neeraj Gupta (Son-in-law, Ph. 9810389687)
            G-109, Sector 56,
Near Mother Dairy,
Janta Flats, Noida (UP)

2.      Mrs. Seema Jain (daughter, Ph. 011-22321612)
Mr. Rajendra Jain (Son-in-law, Ph. 9310962206)
N-10, Gali No. 1, Uldhanpur,
Naveen Shahdara, Delhi-110032

इसके साथ ही पुस्तक, व्यवसाय और श्रीकृष्ण शीर्षक अपने पूर्व लेख के श्रीकृष्ण जी पर केन्द्रित उस हिस्से को पुन: यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ जिसे मैंने एक बदहाल प्रकाशक की कहानी शीर्षक से 25 फरवरी को नुक्कड़ पर पोस्ट किया था।

कई दशक पहले निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोज कुमार ने कहा था कि फिल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा लग रहा है। यह ईमानदार फिल्म निर्माता-निर्देशकों के सिरों पर शनै: शनै: छाते जाते अंडरवर्ल्ड आतंक की ओर इशारा भर था, जिसे शायद ही गम्भीरतापूर्वक सुना-समझा गया हो। विभिन्न प्रकाशक मित्रों के बीच बैठकर इधर-उधर से बहुत-सी बातें सुनाई देती हैं तो आज बल्क पुस्तक खरीद का माहौल लगभग वैसा ही महसूस होता है। किसी दूसरे को क्या, आज स्वयं को भी ईमानदार कहना अपने साथ बेईमानी करने जैसा है लेकिन यह सच है कि भ्रष्टाचार के दलदल में फँसे होने के बावजूद, अधिकतर लोग ईमानदारी से व्यवसाय करने के पक्षधर हैं, बशर्ते वैसा माहौल उपलब्ध कराया जाए। बेईमान माहौल में केवल बेईमान और पूँजीवादी ही पनपते हैं, ईमानदार और मेहनतकश नहीं। यही कारण है कि इन दिनों मेहनतकश और ईमानदार पुस्तक व्यवसायी स्वयं को बेहद विवश महसूस कर या भ्रष्टाचार के दलदल में कूद पड़े हैं या बाज़ार से मालो-असबाब समेटने और बाहर खिसकने के रास्ते पर पड़ चुके हैं। राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर के अनेक पत्रकार, सम्पादक-लेखक-आलोचक और नौकरशाह बल्क पुस्तक खरीद केन्द्रों और प्रकाशकों के बीच कमीशन-एजेंट का लाभकारी धन्धा अपनाए हुए हैं। ऐसे माहौल में लेकिन कितने लेखकों, पत्रकारों, प्रकाशकों और पुस्तक व्यवसायियों को आज पता है कि अमृता प्रीतम की ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कृति रसीदी टिकटकी रूपसज्जा आदि के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, पराग प्रकाशन को समग्र स्तरीयता प्रदान करने वाले तथा बाल नाटककार के रूप में विभिन्न राज्यों की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक बार पुरस्कृत श्रीकृष्ण आज कहाँ हैं और किस हालत में हैं? गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के स्कूल पाठ्य-पुस्तकों में उनके बाल नाटक संकलित होते रहे हैं।
व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो पराग प्रकाशन का डूबना वैसा ही है जैसा व्यावसायिक कूटदृष्टि से हीन किसी भी संस्थान का डूबना होता है। एक व्यवसायी कभी भी दूसरे व्यवसायी की व्यावसायिक मौत पर नहीं रोता। लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा संचालित पराग प्रकाशन का डूबना मेरी दृष्टि में हिन्दी प्रकाशन व्यवसाय के एक टाइटेनिक का डूबना है। उसके डूबने पर उसके हर लेखक, संपादक को रोना चाहिए था, परन्तु किसी ने उफ् तक नहीं की। मेधा प्रकाशन ने श्रीकृष्ण जी के कुछ बाल नाटकों का एक संग्रह अभिनेय बाल नाटक शीर्षक से प्रकाशित किया था। तब मुझे साथ लेकर अजय भाई उनके नोएडा स्थित निवास पर गए थे। 2010 में श्रीकृष्ण जी से हम दो बार मिलकर आए थे, उसके बाद जनवरी 2011 में जा पाए; लेकिन अफसोस की बात है कि उसके बाद हम पुन: उनसे मिलने जाने का समय नहीं निकाल पाए जबकि हमें जाते रहना चाहिए था। 11 जनवरी 2011 को हमारे जाने से कुछ ही माह पहले उन्हें पक्षाघात हुआ था और उनके शरीर के बाएँ हाथ-पैर ने काम करना बन्द कर दिया था। सुनने की ताकत तो उनकी काफी समय पहले क्षीण हो गयी थी, अब स्मृति भी क्षीणता की ओर है। शारीरिक रूप से अक्षमता की ऐसी हालत में वे पति-पत्नी समीप ही रह रही अपनी एक बेटी रजनी पर आश्रित हैं। परिवार सहित वही उनकी देखभाल करती है।
श्रीकृष्ण जी पर कथाकार-पत्रकार बलराम और उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल ने अपने-अपने संस्मरण लिखे हैं। इनके अलावा भी कुछ लोगों ने लिखे हो सकते हैं, लेकिन वे मेरी दृष्टि से नहीं गुजरे, क्षमा चाहता हूँ। 15 अक्टूबर, 1934 को जन्मे श्रीकृष्ण जी छ: पुत्रियों के पिता हैं। सभी पुत्रियाँ विवाहित हैं, सुखी हैं। मिलने आने वालों की बात चली तो पति-पत्नी दोनों को मात्र एक नाम याद आयायोगेन्द्र कुमार लल्ला जी। रजनी ने भी कहा कि लल्ला जी अंकल कभी-कभार आते हैं। उनके अलावा तो श्रीकृष्ण जी ने कहा कि—‘जिस-जिस की भी अपने भले दिनों में खूब मदद की थी, उनमें से कोई नहीं मिलने आता है। किसी और की क्या कहूँ, खुद मेरा सगा भाई भी अभी तक मुझे देखने नहीं आया है। ठीक ही कहा है कि जो पेड़ कितने ही परिन्दों को आश्रय और पथिकों को छाया व फल देता है, बुरे वक्त में वे सब उसका साथ छोड़ जाते हैं। आप लोग मिलने आ गये, यह बहुत बड़ी बात है…कौन आता है!…नरेन्द्र कोहली कहते थे कि मेरा नाम पराग प्रकाशन की देन है, लेकिन अब वे भी…।
प्रकारान्तर से रामकुमार भ्रमर का नाम भी उनकी जुबान पर आया। बहुत तरह से वे पति-पत्नी बहुत लोगों को याद करते हैं। उनके अनुसार, हिमांशु जोशी आदि अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों के वे प्रथम प्रकाशक रहे हैं। अतीत की बातें सुनाते हुए कभी वे खुश होते हैं, कभी उदास। यहाँ बहुत अधिक न कहकर तभी लिए गए उनके कुछ फोटो दे रहा हूँ। इन्हीं से उनकी स्थिति का किंचित अन्दाज़ा आप लगा सकते हैं।

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

पुस्तक, व्यवसाय और श्रीकृष्ण / बलराम अग्रवाल

'रसीदी टिकट' के उत्कृष्ट उत्पादन हेतु राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त श्रीकृष्ण जी जनवरी 2011 में
दिल्ली में कुछ ही घंटों बाद 20वाँ विश्व पुस्तक मेला शुरू होने वाला है।
गत कई दशकों से दिल्ली यों भी पुस्तक व्यवसायियों के लिए ही नहीं, साहित्य व्यवसायियों के लिए भी लाभदायक मंडी है। कितने ही ऐसे लोग, जिनका साहित्य अथवा पत्रकारिता की दुनिया से क्या, पठन-पाठन से भी कोई गम्भीर रिश्ता नहीं है, दिल्ली की कृपा से साहित्य के अनेक विदेशी गलियारों में जाने-घूमने का पारपत्र पाते रहे हैं। अहो रूपम् अहो ध्वनि की तर्ज पर मित्रों के जरिए उनमें से कुछेक फोटो समेत फेसबुक पर प्रचारित भी होते रहते हैं। हम जैसे आलसी और लापरवाह लोग, ऐसे लोग जो घर में पड़े-पड़े यह सोचते रहते हैं कि बुद्धिमत्ता और श्रम का सम्मान ईश्वरीय चमत्कार की तरह एक न एक दिन होगा ही, साहित्य के जौहरियों(!) के इन्तज़ार में पुस्तकों और पत्रिकाओं के पन्ने पलटते हुए पलक पाँवड़े बिछाए खाट-कुर्सी-मूढ़े में धँसे-पड़े रहते हैं। हम वे हैं जो जुगाड़ लगाने में अपनी हेटी समझते हैं और जुगाड़ के खुद-ब-खुद लग जाने का सपना देखते रहते हैं। फेसबुक पर दूसरों का सुसमाचार पढ़कर हम उनके जुगाड़ू होने सम्बन्धी मोटी-मोटी गालियाँ मन में जपते हुए औपचारिकतावश या तो लाइक को क्लिक करके आगे बढ़ चुके होते हैं या बधाई अथवा शुभकामना जैसा कामचलाऊ कमेंट टाइप करके सम्बन्ध और जान-पहचान को बनाए-बढ़ाए रखने का चतुर रवैया अपनाते हैं। 

फेसबुक और ई-मेल, दोनों पर, आजकल ऐसे संदेशों की बहार आई हुई है जिनमें लेखक और प्रकाशक दोनों ही कॉलर खड़े करके उपस्थित नजर आते हैं। लेखक इस संदेश के साथ कि उसकी अमुक किताब पुस्तक मेले में आ रही है और प्रकाशक इस संदेश के साथ कि वह इन-इन लेखकों की कुल इतनी पुस्तकों के साथ विश्व पुस्तक मेले में अवतरित हो रहा है। दोनों की ओर से ऐसे संदेश भी आ रहे हो सकते हैं कि अमुक-अमुक किताबों का लोकार्पण हॉल नं॰ अमुक के अमुक नं॰ स्टाल पर अमुकश्री के कर-कमलों से हो रहा है, आप सादर आमन्त्रित हैं। ऐसा लगता है कि 25 फरवरी से 4 मार्च तक जितनी किताबें लोकार्पित हो जाएँगी, वही पढ़ी जाने लायक समझी जाएँगी। इन तारीखों के आगे-पीछे बाज़ार में आने वाली, लोकार्पण के बहाने चार सजातीय भाइयों का मुँह कड़वा-मीठा कराने की हैसियत न रखने वाले टटपूँजिया लेखकों की किताबें लोकार्पित यानी लोक में पढ़ने योग्य नहीं मानी जाएँगी। यह ऐसा अवसर है जब बड़े-बड़े विचारकों द्वारा लेखक-प्रकाशक-पाठक सम्बन्ध पर एकदम नए सिरे से सोचा जाता है और बातचीत का दूसरा-तीसरा-चौथा सिरा आगामी मेले में विचार के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया जाता है।
बातचीत के इस सिरे को यहीं छोड़कर अब हम उस सिरे पर आते हैं जहाँ बात लेखक-प्रकाशक-पाठक सम्बन्ध पर नहीं, प्रकाशक-प्रकाशक सम्बन्ध पर होगी। जितने कद्दावर और
शरीर का बायाँ हिस्सा 2010 में पक्षाघात का शिकार हो चुका है
नामवर लोग लेखकों-आलोचकों की दुनिया में हैं, प्रकाशकों की दुनिया में उससे कई गुना कद्दावर और नामवर मौजूद हैं। दो प्रकाशक मित्र मुस्कराते हुए जब गले मिल रहे हों या हाथ मिला-हिला रहे हों, तब उनके अन्दर उतरकर देखिए। वे आँखें तरेरते हुए एक-दूसरे पर सींग तानते नजर आएँगे।

जनवरी 2012 के हंस में राजेन्द्र यादव ने सम्पादकीय को प्रकाशकों की कलाकारी पर केन्द्रित किया है और उसे संयोजित-नियंत्रित करने को कुछ सुझाव भी दिए हैं। वे चाहें तो उन सुझावों को कार्यान्वित करने-कराने की पहल भी कर सकते हैं, लेकिन यह उनकी प्राथमिकता का अंग नहीं है। उन्होंने रॉयल्टी-फ्री लेखकों की पुस्तकें छापने वाले प्रकाशकों से उनकी 10% धनराशि रॉयल्टी के तौर पर उस कोष-विशेष में जमा कराने का सुझाव दिया है जिससे गरीब लेखकों को आर्थिक मदद दी जा सके। गरीबी का पैमाना क्या होगा और लेखक होने का पैमाना क्या होगाये बातें विस्तार से विचार करने योग्य हैं। वे कौन-से लेखक होंगे जिन्हें गरीबी रेखा के नीचे यानी बीपीएल कार्ड इश्यू किया जा सकेगा और किनके द्वारा? अलग-अलग लेखक संगठनों का पैमाना स्पष्टत: इस बारे में अलग-अलग ही होगा, राजनीतिक संगठनों की तरह।
दास्ताने-ग़म ही नहीं, दास्ताने-खुशी भी हैं उनके पास;    सुनने वाला चाहिए
कई दशक पहले निर्माता-निर्देशक-अभिनेता मनोज कुमार ने कहा था कि फिल्मों में अंडरवर्ल्ड का पैसा लग रहा है। यह ईमानदार फिल्म निर्माता-निर्देशकों के सिरों पर शनै: शनै: छाते जाते अंडरवर्ल्ड आतंक की ओर इशारा भर था, जिसे शायद ही गम्भीरतापूर्वक सुना-समझा गया हो। विभिन्न प्रकाशक मित्रों के बीच बैठकर इधर-उधर से बहुत-सी बातें सुनाई देती हैं तो आज बल्क पुस्तक खरीद का माहौल लगभग वैसा ही महसूस होता है। किसी दूसरे को क्या, आज स्वयं को भी ईमानदार कहना अपने साथ बेईमानी करने जैसा है लेकिन यह सच है कि भ्रष्टाचार के दलदल में फँसे होने के बावजूद, अधिकतर लोग ईमानदारी से व्यवसाय करने के पक्षधर हैं, बशर्ते वैसा माहौल उपलब्ध कराया जाए। बेईमान माहौल में केवल बेईमान और पूँजीवादी ही पनपते हैं, ईमानदार और मेहनतकश नहीं। यही कारण है कि इन दिनों मेहनतकश और ईमानदार पुस्तक व्यवसायी स्वयं को बेहद विवश महसूस कर या भ्रष्टाचार के दलदल में कूद पड़े हैं या बाज़ार से मालो-असबाब समेटने और बाहर खिसकने के रास्ते पर पड़ चुके हैं। राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर के अनेक पत्रकार, सम्पादक-लेखक-आलोचक और नौकरशाह बल्क पुस्तक खरीद केन्द्रों और प्रकाशकों के बीच कमीशन-एजेंट का लाभकारी धन्धा अपनाए हुए हैं। ऐसे माहौल में लेकिन कितने लेखकों, पत्रकारों, प्रकाशकों और पुस्तक व्यवसायियों को आज पता है कि अमृता प्रीतम की ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त कृति रसीदी टिकटकी रूपसज्जा आदि के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित, पराग प्रकाशन को समग्र स्तरीयता प्रदान करने वाले तथा बाल नाटककार के रूप में विभिन्न राज्यों की साहित्यिक संस्थाओं द्वारा अनेक बार पुरस्कृत श्रीकृष्ण आज कहाँ हैं और किस हालत में हैं? गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के स्कूल पाठ्य-पुस्तकों में उनके बाल नाटक संकलित होते रहे हैं।
व्यावसायिक दृष्टि से देखें तो पराग प्रकाशन का डूबना वैसा ही है जैसा व्यावसायिक कूटदृष्टि से हीन किसी भी संस्थान का डूबना होता है। एक व्यवसायी कभी भी दूसरे व्यवसायी की व्यावसायिक मौत पर नहीं रोता। लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा संचालित पराग प्रकाशन का डूबना मेरी दृष्टि में हिन्दी प्रकाशन
अतीत की यादें ही अब इनकी धरोहर हैं
व्यवसाय के एक टाइटेनिक का डूबना है। उसके डूबने पर उसके हर लेखक, संपादक को रोना चाहिए था, परन्तु किसी ने उफ् तक नहीं की। मेधा प्रकाशन ने श्रीकृष्ण जी के कुछ बाल नाटकों का एक संग्रह अभिनेय बाल नाटक शीर्षक से प्रकाशित किया था। तब मुझे साथ लेकर अजय भाई उनके नोएडा स्थित निवास पर गए थे। 2010 में श्रीकृष्ण जी से हम दो बार मिलकर आए थे, उसके बाद जनवरी 2011 में जा पाए; लेकिन अफसोस की बात है कि उसके बाद हम पुन: उनसे मिलने जाने का समय नहीं निकाल पाए जबकि हमें जाते रहना चाहिए था। 11 जनवरी 2011 को हमारे जाने से कुछ ही माह पहले उन्हें पक्षाघात हुआ था और उनके शरीर के बाएँ हाथ-पैर ने काम करना बन्द कर दिया था। सुनने की ताकत तो उनकी काफी समय पहले क्षीण हो गयी थी, अब स्मृति भी क्षीणता की ओर है। शारीरिक रूप से अक्षमता की ऐसी हालत में वे पति-पत्नी समीप ही रह रही अपनी एक बेटी निशा पर आश्रित हैं। अपने पति नीरज व परिवार सहित वही उनकी देखभाल करती है।
श्रीकृष्ण जी पर कथाकार-पत्रकार बलराम और उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल ने अपने-अपने संस्मरण लिखे हैं। इनके अलावा भी कुछ लोगों ने लिखे हो सकते हैं, लेकिन वे मेरी दृष्टि से नहीं गुजरे, क्षमा चाहता हूँ। 15 अक्टूबर, 1934 को जन्मे श्रीकृष्ण जी छ: पुत्रियों के पिता हैं। सभी पुत्रियाँ विवाहित हैं, सुखी हैं। मिलने आने वालों की बात चली तो पति-पत्नी दोनों को मात्र एक नाम याद आयायोगेन्द्र कुमार लल्ला जी। रजनी ने भी कहा कि लल्ला जी अंकल कभी-कभार आते हैं। उनके अलावा तो श्रीकृष्ण जी ने कहा कि—‘जिस-जिस की भी अपने भले दिनों में खूब मदद की थी, उनमें से कोई नहीं मिलने आता है। किसी और की क्या कहूँ, खुद मेरा सगा भाई भी अभी तक मुझे देखने नहीं आया है। ठीक ही कहा है कि जो पेड़ कितने ही परिन्दों को आश्रय और पथिकों को छाया व फल देता है, बुरे वक्त में वे सब उसका साथ छोड़ जाते हैं। आप लोग मिलने आ गये, यह बहुत बड़ी बात है…कौन आता है!…नरेन्द्र कोहली कहते थे कि मेरा नाम पराग प्रकाशन की देन है, लेकिन अब वे भी…।
श्रीकृष्ण जी की धर्मपत्नी                                                      सभी चित्र : बलराम अग्रवाल
प्रकारान्तर से रामकुमार भ्रमर का नाम भी उनकी जुबान पर आया। बहुत तरह से वे पति-पत्नी बहुत लोगों को याद करते हैं। हिमांशु जोशी आदि अनेक प्रतिष्ठित लेखकों के वे प्रथम प्रकाशक रहे हैं। अतीत की बातें सुनाते हुए कभी वे खुश होते हैं, कभी उदास। यहाँ बहुत अधिक न कहकर तभी लिए गए उनके कुछ फोटो दे रहा हूँ। इन्हीं से उनकी स्थिति का किंचित अन्दाज़ा आप लगा सकते हैं।

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

भौंचक है सिर /बलराम अग्रवाल


                                                                                                       चित्र : बलराम अग्रवाल
भौंचक है
सिर
कि रोने के लिए
टिकना चाहता है
जिस पर भी
उसी कंधे से
आने लगती हैं
आवाजें
सिसकने की।









शनिवार, 10 सितंबर 2011

तानाशाह, तलवार और कुत्ते/बलराम अग्रवाल

                                                                                                      चित्र:आदित्य अग्रवाल
तानाशाह
सिर्फ तलवार नहीं रखता
पालता है
कुत्ते भी

विरोधियों का दमन
और
उनका शिकार
कभी भी
तलवार से नहीं करता वह
कुत्तों से करता है
तलवार तो होती है
डराने-धमकाने भर के लिए।
***

शनिवार, 27 अगस्त 2011

कहाँ गये वो लोग?/बलराम अग्रवाल

दोस्तो,
सबसे पहले तो भाई अनिल जनविजय का आभार कि उन्होंने मुझे फैज़ अहमद फैज़ की आंदोलनकारी नज्म हम देखेंगे सुनने का अवसर प्रदान किया। यह 24 की रात की बात है। तब से अब तक मैं बीसों बार उसे सुन चुका हूँ, लेकिन मन है कि भरता ही नहीं है। मैंने उस नज्म की तीन प्रतिलिपियाँ तैयार कीं और अगली सुबह रामलीला मैदान जा पहुँचा। उनमें से दो को मैंने रामलीला मैदान में प्रारम्भ से ही अन्ना हजारे जी के मंच का संचालन सँभाल रहे कुमार विश्वास व नितिन को भेज दिया। उस समय मुझे मालूम नहीं था कि हम इतनी जल्दी वह दिन देख लेंगे जिसका हमसे वादा था। आप सब देशवासियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे आम आदमी की इस जीत पर शतश: बधाइयाँ।

वृद्धाएँ ही नहीं नवजातों को लेकर युवा माँएँ भी आंदोलन में कूद पड़ीं चित्र:बलराम अग्रवाल

इस जज्बे की अनदेखी करना किसी के लिए सम्भव नहीं                चित्र:बलराम अग्रवाल
दोस्तो, आज यह पूछने का दिन आ गया है कि कहाँ गये वो लोग जो कहते थे कि 10-15 हजार लोगों के इकट्ठा होकर गला फाड़ने से क्या होता है? तथा यह कि सौ करोड़ से ऊपर जनसंख्या वाले इस देश में अन्ना के समर्थक कितने होंगे? ज्यादा से ज्यादा एक करोड़! बाकी 99 करोड़ का समर्थन तो उन्हें नहीं प्राप्त है।

उपर्युक्त दो बातों के अलावा और भी बहुत-सी बातें राजनीतिकों और बुद्धिजीवियों की ओर से सुनने-पढ़ने को मिलीं जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि देश का न केवल राजनीतिक बल्कि बौद्धिक क्षेत्र भी धृतराष्ट्रों के हाथ में खेल रहा है।

आज शाम नोएडा से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका पाखी द्वारा आयोजित जे॰ सी॰ जोशी चतुर्थ शब्द साधक सम्मान समारोह था। कल पत्रिका के कार्यकारी संपादक भाई प्रेम भारद्वाज ने फोन करके आमन्त्रित किया था। मैं समय से करीब आधा घंटा पहले हिन्दी भवन पहुँच गया था। चहल-पहल महसूस न होने के कारण मैंने अन्दर जाने की बजाय बाहर ही बैठना उचित समझा और बस स्टॉप की बैंच पर बैठ गया। पाँच मिनट के अन्तराल पर ही भाई प्रेम भारद्वाज अपने परिवार के साथ आ पहुँचे। मुझे बाहर बैठा देखकर चौंक गये। पूछा,यहाँ क्यों बैठे हैं?

अभी-अभी पहुँचा हूँ,मैंने कहा,सोचा, कुछ देर खुली हवा में बैठ लूँ।

आइए, अन्दर चलते हैं। उन्होंने कहा। दरअसल, उन्हें अन्दर की तैयारियों का जायजा भी लेना था। इसलिए मेरी तरह वह बाहर नहीं बैठ सकते थे। मैं उनके साथ हो लिया। समय-पूर्व पहुँचने के कारण उपस्थिति का न होना स्वाभाविक था। फिर भी, हॉल को खाली देखकर भारद्वाज जी ने आशंका जताई—‘अन्ना जी के आंदोलन के चलते उपस्थिति कम रह सकती है।

मुझे अच्छी तरह मालूम था कि दिल्ली के साहित्यकार कहे जाने वाले जीव गुट विशेष द्वारा प्रायोजित आंदोलन में तो उछल-कूद मचा सकते हैं; वे वर्ग और समुदाय तो बन सकते हैं; देश नहीं बन सकते। ऐसा मैं अपने मन से नहीं कह रहा हूँ, इस दौरान विभिन्न बौद्धिकों के चरित्रों के फेसबुक आदि पर आते रहे बयानों के मद्देनजर कह रहा हूँ। खैर, मैंने भारद्वाज जी की आशंका पर कोई टिप्पणी नहीं की। उनके पास से खिसक लिया, बिना कुछ कहे। चला, तो अपूर्व जोशी से भेंट हो गयी। वह हमेशा ही गले और हृदय से मिलते हैं, हाथ के पोरुओं से नहीं। अपनत्व से भिगो देते हैं। शिकायत की कि मैं इतने लम्बे अंतराल के बाद क्यों मिल रहा हूँ? फिर स्वयं ही बोले,नहीं, आप तो एक-दो बार आये थे कार्यालय, मैं ही नहीं मिल पाया, प्रेम जी ने बताया था। उपस्थिति कम रहने की आशंका उन्होंने भी जताई। कहा,कुमार विश्वास को मंच संचालन करना था, लेकिन वह रामलीला मैदान का मंच सँभालने में व्यस्त हैं। सीताराम येचुरी जी को आना था, लेकिन दोनों संदनों में महत्वपूर्ण बहस चल रही है। उन्होंने बताया है कि अभी 22 वक्ता और बाकी हैं, मैं नहीं आ सकता। तात्पर्य यह कि टीम पाखी टीम अन्ना के आंदोलन से खासी चिंतित नजर आ रही थी। लेकिन यह चिंता अपने कार्यक्रम में आने वाले श्रोताओं और वक्ताओं की कम उपस्थिति के मद्देनजर ही थी। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान से हुआ, यह बेहद भला लगा।

तय समय पर चाय-पान शुरू हुआ। मैं अपने हिस्से का डिब्बा लेकर विन्डो के किनारे जा खड़ा हुआ। कुछ देर बाद, साहित्यकारों की आमद शुरू हुई। विन्डो में खड़े मुझको सबसे पहले प्रो॰ नामवर सिंह आते दिखाई दिये। उनके बाद तो अशोक मिश्र, प्रदीप पंत, प्रो॰ निर्मला जैन, प्रेमपाल शर्मा, कुसुम कुमार, सुशील सिद्धार्थ, मन्नू भंडारी, गीताश्री, अशोक गुप्ता, रमणिका गुप्ता, राजेन्द्र यादव, प्रो॰ मैनेजर पाण्डे आदि-आदि  दिखाई देते गये। ये केवल कुछ नाम हैं। सभी को न मैं जानता हूँ, न पहचानता हूँ। लब्बोलुआब यह कि कार्यक्रम शुरु होते-होते हॉल लगभग आधा तो भर ही चुका था। मैंने तुरन्त उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल को व्यंजनापरक एक एस॰एम॰एस॰ भेजा—‘इस समय पाखी के कार्यक्रम में आये होते तो आपका यह सन्देह मिट जाता कि हिन्दी के साहित्यकार घर से बाहर नहीं निकलते हैं। उनका जवाब आया—‘मैं इस समय सी॰पी॰ में हूँ। वहाँ तो लेखक होंगे ही। उन्हें अपनी प्राथमिकताएँ मालूम हैं। भाड़ में जायें अन्ना उनके लिए।

देशभर की जनता के हस्ताक्षरों से युक्त अन्ना-समर्थक एक बैनर                                        चित्र:बलराम अग्रवाल
मज़े की बात यह रही कि अपने-अपने तरीके से अपूर्व जोशी, प्रो॰ निर्मला जैन और प्रो॰ नामवर सिंह ने अन्ना के आंदोलन का जिक्र अपने वक्तव्यों में किया लेकिन तीनों के सरोकार अलग-अलग थे। मुझे याद है कि 7 अगस्त को जन्तर-मन्तर पर सरकारी लोकपाल बिल को जलाए जाने वाले कार्यक्रम में जब जन्तर-मन्तर पर ही प्रदर्शन कर रहे रुचि भट्टल के परिजनों ने टीम अन्ना से यह अनुरोध किया था कि वे उनका साथ दें तो अरविन्द केजरीवाल ने मंच से घोषणा की थी कि आप अपने-आप को हमसे अलग न समझें। हम सब आपके साथ हैं और आपके साथ कैंडिल-मार्च करते हुए इंडिया गेट तक जायेंगे। और वे गये भी। हिन्दी भवन में उपस्थित साहित्यकारों ने उस वक्त जब संसद के दोनों सदनों में एक ऐतिहासिक निर्णायक बहस चल रही थी और पूरे देश को मथ डालने वाला एक 74 वर्षीय योद्धा गत 12 दिनों से रामलीला मैदान में भूखा बैठा था, यह आह्वान करने की आवश्यकता नहीं समझी कि साहित्यकारों की यह बिरादरी हर प्रकार के भ्रष्टाचार का विरोध करती है और यहाँ से निबटकर रामलीला मैदान जायेगी। दरअसल, जैसा कि चन्देल जी ने अपने जवाब में लिखा थायह उनकी प्राथमिकता में नहीं था।

संतोष की बात है दोस्तो, कि संसद के दोनों सदनों ने अन्ना जी की माँगों पर गम्भीरतापूर्वक बहस की और उन्हें लगभग मान लिया। माननीय प्रधानमंत्री ने इस आशय का पत्र लिखकर विलासराव देशमुख और संदीप दीक्षित के हाथों रामलीला मैदान में अनशन पर बैठे अन्ना जी के पास भेजकर अनुरोध किया कि वे कृपया अब अपना अनशन तोड़ दें। विलासराव देशमुख ने स्वयं उस पत्र को पढ़कर सुनाया। उसके जवाब में अन्ना जी ने अनशन तोड़ने की अपनी सहमति दे दी। उन्होंने कहा कि यह वास्तव में भारत की गरीब जनता की जीत है। फिलहाल इतना ही, बाकी कल।