बुधवार, 16 जनवरी 2013

बापू कहे जाने के योग्य नहीं है आसाराम/बलराम अग्रवाल

 आज शब्द साधकआदरणीय अरविंद जी का जन्मदिन है। कल उनका एस॰एम॰एस॰ मिला था। लिखा था—‘बापू आसाराम के कहने का मतलब है कि अपहरण करके लंका ले जाते समय सीता रावण को यदि भैय्या कह देतीं तो लंका का युद्ध टल सकता था।
                                                                                                                   गूगल से साभार
दरअसल दिल्ली गैंगरेप के संदर्भ में टीवी पर आसाराम की टिप्पणी को देखकर उसके लिए सम्मान की भावना मन में रह जाने का कोई सवाल ही नहीं रह जाता। मैं उसके और स्त्रीविरोधी उसके समस्त अनुयायियों के अवलोकनार्थ वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड से यह प्रकरण उद्धृत कर रहा हूँ जो तत्कालीन रावण के चरित्र को अंशत: उद्घाटित करता है। मेरा मानना है कि हर बलात्कारी रावण का ही अंश है और उसके लिए मृत्युदण्ड से कम की सज़ा का प्रावधान भारतीय दण्ड संहिता में नहीं होना चाहिए:
                                                                                                                  गूगल से साभार
स्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित निशाचरों की वह विशाल सेना कुछ ही देर में गहरी नींद में सो गई। परंतु महापराक्रमी रावण उस पर्वत के शिखर पर चुपचाप बैठकर चन्द्रमा की चाँदनी से चमकते उस पर्वत के विभिन्न स्थानों की नैसर्गिक छटा को निहारने लगा। इसी बीच समस्त अप्सराओं में श्रेष्ठ सुन्दरी रम्भा उस मार्ग से आ निकली। वह पूरी तरह सजी हुई थी। वह सेना के बीच से होकर जा रही थी, इसलिए रावण ने उसे देख लिया। देखते ही वह काम के अधीन हो गया और खड़ा होकर उसने जाती हुई रम्भा का हाथ पकड़ लिया। वह लाज से गड़ गई, परन्तु रावण मुस्कराता हुआ बोला—“सुन्दरी! किसके भाग्य के उदय का समय आया है, जो तुम स्वयं चलकर जा रही हो? इन्द्र, उपेन्द्र या अश्विनीकुमार ही क्यों न हों, इस समय कौन पुरुष मुझ रावण से बढ़कर है? इस समय तुम रावण को छोड़कर कहीं और जाओ, यह अच्छी बात नहीं है। 
रावण का नाम सुनने मात्र से रम्भा के रोंगटे खड़े हो गए। वह काँप उठी और हाथ जोड़कर बोली—“प्रभो! मुझ पर कृपा कीजिए। आपको ऐसी बात मुँह से नहीं निकालनी चाहिए क्योंकि आप मेरे पिता के समान हैं। यदि कोई दूसरा पुरुष मेरा तिरस्कार करे तो उससे भी आपको मेरी रक्षा करनी चाहिए। मैं धर्मत: आपकी पुत्रवधू हूँयह आपसे सच्ची बात बता रही हूँ।
उसकी बात सुनकर रावण ने उससे कहा—“यदि यह सिद्ध हो जाय कि तुम मेरे पुत्र की पत्नी हो, तभी मेरी पुत्र-वधू हो सकती हो, अन्यथा नहीं।
इस पर रम्भा ने कहा—“राक्षसशिरोमणि! धर्म के अनुसार मैं आपके पुत्र की ही पत्नी हूँ। आपके बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकूबर मेरे प्रियतम हैं। इस समय मैं उन्हीं से मिलने जा रही हूँ।
रम्भा की इस बात पर रावण ने उससे कहा—“रम्भे! पुत्र-वधू वाला नाता उन स्त्रियों पर लागू होता है, जो किसी एक पुरुष की पत्नी हों। तुम्हारे देवलोक की स्थिति ही दूसरी है। वहाँ सदा से यही नियम चला आ रहा है कि अप्सराओं का कोई पति नहीं होता। वहाँ कोई एक स्त्री के साथ विवाह करके नहीं रहता।
यों कहकर राक्षस ने रम्भा को जबर्दस्ती एक शिला पर बैठा लिया और उसके साथ समागम किया। रम्भा के पुष्पहार टूटकर गिर गए, सारे आभूषण अस्त-व्यस्त हो गए। उपभोग के बाद रावण ने रम्भा को छोड़ दिया। वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी। उसके हाथ काँपने लगे। लज्जा और भय से काँपती हुई वह नलकूबर के पास गई और हाथ जोड़कर उसके पैरों पर गिर पड़ी। उसे इस अवस्था में देखकर नलकूबर ने पूछा—“रम्भे! क्या बात है? तुम इस तरह क्यों मेरे पैरों पर पड़ गयीं?
थर-थर काँपती उस अबला ने लंबी साँस खीचकर पुन: हाथ जोड़ लिए और जो कुछ हुआ था, सब ठीक-ठीक बताना शुरू कर दिया—“देव! बहुत बड़ी सेना साथ लेकर दशमुख रावण देवलोक पर आक्रमण करने के लिए आया है। उसने आज की रात यहीं डेरा डाला है। आपके पास आते हुए उसने मुझे देख लिया और मेरा हाथ पकड़कर पूछने लगातुम किसकी स्त्री हो? मैंने सब-कुछ उसे सच-सच बता दिया, लेकिन उसने मेरी वह बात नहीं सुनी। मैं बार-बार कहती रही कि मैं आपकी पुत्र-वधू हूँ; लेकिन मेरी सारी बातें अनसुनी करके उसने बलपूर्वक मेरे साथ अत्याचार किया।

बुधवार, 7 नवंबर 2012

बुजुर्ग तो ‘बी’ सम्बोधन ही देना चहते होंगे/बलराम अग्रवाल

                                                                                                        चित्र:आदित्य अग्रवाल

दोस्तो, बैठे-बैठे एक चर्चा ऐसी कर ली जाय जिसे खाली दिमाग शैतान का घर भी  कह सकते हैं। उर्दू में बेवा शब्द विधवा स्त्री के लिए प्रयुक्त होता है। मुझे इस शब्द में अभिव्यक्ति लाघव नजर आता है। वह यों कि उर्दू में पत्नी के लिए बीवी और सम्मानित अन्य महिलाओं के लिए बी अथवा बीबी शब्द का प्रयोग होता है। मुस्लिम समाज के विद्वान वैयाकरणों और सहृदय शब्दपुरोधाओं ने उस स्त्री के लिए, जो पति की मृत्यु के बाद बीवी कहलाने की हक़दार नहीं रहती, अन्य महिलाओं जैसा सम्मानजनक सम्बोधन देने पर विचार किया होगा। निश्चित रूप से अलग-अलग मत सामने आये होंगे जिनमें उसे पुन: बी सम्बोधन देने जैसा प्रस्ताव भी अवश्य आया होगा। तब विरोध का स्वर इस रूप में उभरा होगा कि अन्य स्त्रियों से इस स्त्री की वैवाहिक स्थिति के अलगाव का कैसे पता चलेगा? तय हुआ होगा कि इस अलगाव को बनाए रखने के लिए उस स्त्री (बीवी) के वाउ को ‘बे-वाउ कर सम्बोधित किया जाये तो कोई दुविधा नहीं रहेगी। इसलिए ऐसी स्त्री के लिए बीबे-वाउ शब्द तय हुआ लेकिन सम्बोधित करने में यह किंचित असुविधाजनक-सा था। अभिव्यक्ति लाघव के कारण इस शब्द में से पहले 'बी' खत्म होकर 'बेवाउ' सामने आया जो आगे चलकर 'बेवा' रह गया। बुजुर्गों ने तो इज्ज़त देने की भरपूर कोशिश की थी, शॉर्टकट की स्वाभाविक मानवीय आदत को क्या कहें!
 

सोमवार, 5 नवंबर 2012

समीक्षा-यादों की लकीरें



उपन्यासकार रूपसिंह चन्देल के संस्मरणों की पुस्तक 'यादों की लकीरें' की समीक्षा 'अपेक्षा' पत्रिका के अप्रैल-जून २०१२ अंक में प्रकाशित हुई है। समीक्षक हैं कवि अशोक आंद्रे।

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

मेरी हस्कल के नाम जिब्रान के कुछ पत्रों के अंश…



खलील जिब्रान
मेरी, सबसे बड़े अचरज की बात तो यह है कि ग़ज़ब की खूबसूरत इस दुनिया में, जो दूसरे इंसानों के लिए अनजानी है, हाथ में हाथ डाले हम हमेशा साथ घूमते हैं। एक-दूसरे के हाथ को पूरा खींचकर हम जीवन से रस खींचते हैंऔर नि:संदेह जीवन हमें वह देता है।
 (जिब्रान द्वारा 22 अक्टूबर 1912 को लिखे एक पत्र का अंश)
कोई व्यक्ति बिना महान हुए आज़ाद हो सकता है, लेकिन आज़ाद हुए बिना कोई भी महान नहीं हो सकता।
(जिब्रान द्वारा 16 मई 1913 को मेरी को लिखे एक पत्र का अंश)
सच्चा संन्यासी घने जंगल में खोजने के लिए जाता हैन कि स्वयं को खोने के लिए।
(जिब्रान द्वारा 8 अक्टूबर 1913 को मेरी को लिखे एक पत्र का अंश)

मेरी हस्कल का पेंसिल स्केच
तुम्हारे साथ, मेरी, आज उसने कहा,घास की एक पत्ती-सा बर्ताव करना चाहता हूँ जो वैसे ही नाचती है जैसे हवा उसे नचाती है। इस पल की नज़ाकत के मुताबिक बात करनी चाहिए। वही करूँगा। 
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 10 जनवरी 1914 से)
खुली सड़कों पर पैदल चलते रहने-जैसा बड़ा काम करना चाहता हूँ। जरा सोचो, मेरी, ऐसे में तूफान आ जाए तो क्या होगा! निर्द्वंद्व गति के माध्यम से जीवन देने वाले महाभूतों को देखने से बेहतर भी कोई दृश्य हो सकता है क्या?
(दिनांक 24 मई 1914 को लिखे एक पत्र का अंश)
अब मैं अपने-आप को तुम्हें सौंप सकता हूँ। दरअसल, किसी दूसरे के हाथों में अपने-आप को आप तभी सौंप सकते हैं जब वह जानता हो कि आप कर क्या रहे हैं। जब उसके दिल में आपके लिए आदर और प्यार हो। वह आपको आपकी आज़ादी दे सकता हो।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 20 जून 1914 से)
काव्य क्या है?दृष्टि की व्यापकता; और संगीत?श्रवण की व्यापकता।
(मेरी हस्कल के जर्नल 20 जून 1914 से)
कभी-कभी तुमने बोलना भी शुरू नहीं किया होता कि मैं पूरी बात समझ जाता हूँ।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 28 जुलाई 1917 से)
ज्ञान यानी पंखदार जीवन।
(दिनांक 15 नवंबर 1917 के एक पत्र का अंश)
तुमने मेरे काम में और व्यक्तित्व निर्माण में मेरी मदद की। मैंने तुम्हारे काम में और व्यक्तित्व निर्माण में तुम्हारी मदद की। मैं शुक्रगुजार हूँ परमात्मा का कि उसने मुझे और तुम्हें बनाया। 
(मेरी हस्कल के जर्नल 12 मार्च 1922 से)
अगर मुझे धूप और गरमाहट पसंद है तो बिजली और तूफान के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 12 मार्च 1922 से)
हृदय की आवाज़ सुनो। हर बड़े काम में वह सच्चा सलाहकार है। मन सीमित है। क्या करना चाहिएइसका निश्चय वह दिव्यशक्ति करती है जो हम-सब में विद्यमान है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 12 मार्च 1922 से)
 तुम्हारे और मेरे बीच रिश्ता मेरी ज़िंदगी की खूबसूरत घटना है। इससे पहले मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। यह दिव्य है।
(मेरी हस्कल के जर्नल 11 सितम्बर 1922 से)
बिशेरी स्थित खलील जिब्रान म्यूजियम में मूर्तिशिल्प
तुम्हें खुश देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। खुशी तुम्हारे लिए आज़ादी का रूप है। जितने भी लोगों को मैं जानता हूँ, उनमें सबसे अधिक आज़ाद तुम्हें होना चाहिए। यह खुशी और यह आज़ादी तुमने खुद पायी है। ज़िंदगी तुम्हें सुख और सुविधा देने वाली नहीं थी लेकिन तुम स्वयं ज़िंदगी को सुख और सुविधा देने वाली बन गई हो।
(जिब्रान के पत्र दिनांक 24 जनवरी 1923 से)
मुझे तुम्हारी खुशी की वैसी ही चिंता है जैसी तुम्हें मेरी खुशी की। अगर तुम्हारा मन शांत नहीं है तो मेरा कैसे रह सकता है।
(दिनांक 23 अप्रैल 1923 को लिखित जिब्रान की डायरी से)
बुद्धिमान लोगों के बीच विवाह का उपयुक्त आधार मित्रता यानी एक-दूसरे की रुचि का ख्याल रखना है। विचार-विमर्श करने की क्षमता है। एक-दूसरे के विचारों और आकांक्षाओं को समझना है।
(मेरी हस्कल के जर्नल 26 मई 1923 से)

आप किसी गाँव में रहें या महानगर में, क्या फर्क पड़ता है? असली ज़िंदगी तो आपके-अपने भीतर है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 27 मई 1923 से)
विवाह किसी भी व्यक्ति को वह अधिकार नहीं देता जिन्हें वह दूसरे व्यक्ति में नहीं देखना चाहता; और ना ही उससे अलग कोई आज़ादी देता है जितनी वह दूसरे व्यक्ति को देता है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक  27  मई  1923 से)
पेड़ों पर कलियाँ लदी थीं, चिड़ियाँ चहचहा रही थीं, घास पर ओस थी, सारी धरती जगमगा रही थी। और एकाएक मैं पेड़ों में, फूलों में, चिड़ियों में और घास में तब्दील हो गया—‘मैं का नामोनिशान न रहा।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 23 मई 1924 से)
मैं जितना बोल नहीं पाता हूँ, तुम उससे कहीं ज्यादा सुन लेती हो। तुम अपनी चेतना से सुनती हो। मेरे साथ तुम वहाँ उतर जाती हो जहाँ मेरे शब्द तुम्हें नहीं लेजा सकते।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 5 जून 1924 से)


कोई भी मानवीय रिश्ता दूसरे पर अधिकार का द्योतक नहीं है। हर दूसरा व्यक्ति भिन्न है। दोस्ती में या प्यार में, दोनों समान रूप से उस ओर हाथ बढ़ाते हैं जिस ओर दूसरा कमजोर पड़ता है।
(मेरी हस्कल के जर्नल दिनांक 8 जून 1924 से)


बुधवार, 22 अगस्त 2012

श्रीकृष्ण : पूर्ण पटाक्षेप / बलराम अग्रवाल


श्रीमती कमला देवी
अभी, दस मिनट पहले की बात है। राजेन्द्र जैन जी मिल गये थेश्रीकृष्ण जी के दामाद हैं वे। पहले आँखों ही आँखों में अभिवादन किया, फिर स्कूटर रोककर बोले—“वो भी गईं।
मुझे समझने में देर नहीं लगी कि वह किनके बारे में मुझे बता रहे हैं। चौंककर पूछा,कब?
15 अगस्त को…सुबह साढ़े दस बजे।
सूरज पूरा अस्त हो गया… मेरे मुँह से निकला। यह कहते हुए श्रीमती कमला देवी(धर्मपत्नी श्री श्रीकृष्ण) के हवाले से लिखी मेरी एक टिप्पणी के जवाब में उनके प्रति कहे गए हिन्दी के भद्र(?) समझे जाने वाले एक लेखक के वे अभद्र शब्द भी मेरे जेहन में कड़ुआहट घोल गए जो उन्होंने सिर्फ़ इसलिए कहे थे कि श्रीमती श्रीकृष्ण (यानी श्रीमती कमला देवी) ने कभी उनका कृतघ्न चरित्र उन्हें दिखाने की पहल की थी और आत्ममुग्धताजनित अहंकार के चलते जिस कृतघ्नता को वे आज तक भी नहीं पहचान पाए। श्रीमती श्रीकृष्ण के चले जाने के बाद अपनी ही गाली को वे अब उम्रभर अपने सिर और कंधों पर ढोए फिरने को शापित हो गये हैं।
राजेन्द्र मेरे मन के झंझावात को नहीं जान सकते थे। मेरी बात सुनकर वे कुछ न कह सके, चुप खड़े रहे।
श्रीकृष्णजी को नैतिक सम्बल देते रहने वाली शक्ति भी आखिर चली गई। दु:खित स्वर में मैंने  आगे कहा।
हमारे लिए यह एक युग का अन्त है… वह भी शोकभरे स्वर में बोले।
निश्चित रूप से। मैंने उनकी भावना का समर्थन किया,वे कुशलतापूर्वक घर को न सँभाले रखतीं तो श्रीकृष्णजी अपना ध्यान उत्कृष्ट पुस्तक-उत्पादन में इस गहराई तक केन्द्रित न कर पाते।
इसके बाद कुछ पल हम चुप खड़े रहे, बोलने के लिए दोनों के ही पास जैसे कुछ विशेष न हो। फिर बड़ी मायूसी के साथ राजेन्द्र जी ने कहा,उन्हें दरअसल अपनों ने ही मारा।
उन्हें से उनका तात्पर्य श्रीकृष्ण दम्पति से था, अकेली श्रीमती कमला देवी से नहीं। मैं ‘उन्हें अपनों ने ही मारा में छिपा उनका इशारा भी समझ रहा था लेकिन क्या कहता। हर व्यक्ति का अपना-अपना पक्ष होता है। हमारे यानी अजय जी(मेधा बुक्स) और मेरे साथ अन्तिम मुलाकत में अपनों से संवादहीनता का हल्का-सा संकेत गहरी पीड़ा के साथ श्रीकृष्णजी ने भी किया था; लेकिन असलियत तो यह थी कि उन्हें अपनों ने भी मारा और ग़ैरों ने भी।
दोस्तो, गत 07 दिसम्बर 2011 को अपंजीकृत पराग प्रकाशन के सुप्रतिष्ठा-सम्पन्न संस्थापक तथा बालसाहित्यकार श्रीकृष्ण जी ने नश्वर देह को त्यागा था और गत 15 अगस्त, 2012 को उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कमला देवी भी संसार से विदा हो गईं।
शोक-संवेदना व्यक्त करने की इच्छा वाले महानुभावों को मैं उनकी दो पुत्रियों के नाम, पते और फोन नम्बर नीचे लिख रहा हूँ

1॰ Mrs. Nisha Gupta (daughter, Ph. 88oo184598)
Mr. Neeraj Gupta (Son-in-law, Ph. 98103389687)
            G-109, Sector 56,
Near Mother Dairy,
Janta Flats, Noida (UP)

2॰ Mrs. Seema Jain (daughter, Ph. 011-22321612)
Mr. Rajendra Jain (Son-in-law, Ph. 9310962206)
N-10, Gali No. 1, Uldhanpur,
Naveen Shahdara, Delhi-110032

ॐ शान्ति!!!

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

पिज्ज़ा, बर्गर, पास्ता, फ्रेंचफ्राई…


सर्वोत्तम कथन
पिज्ज़ा, पास्ता, बर्गर, फ्रेंच फ्राईज़ के बारे में:

कुछ पल जीभ पर, उम्रभर तोंद और नितम्बों पर…
 
सभी चित्र गूगल इमेज से साभार





सोमवार, 6 अगस्त 2012

पहले से ही ज़ीरो हूँ और आखिर तक ज़ीरो रहूँगा/अन्ना हजारे

दोस्तो, http://news.indiaagainstcorruption.org/annahazaresays लिंक पर अन्ना हजारे के नाम से एक लम्बा लेख प्रकाशित हुआ है। यहाँ प्रस्तुत हैं उस लेख के कुछ अंश:
 इस इंतज़ार में, कि यह मोमबत्ती कब पूरी हो और इन उँगलियों को जलाने लगे आप भी हैं?  फोटो:बलराम अग्रवाल
 ………मैंने संसद में अच्छा उम्मीदवार भेजने का विकल्प देने की बात करते ही कई लोगों ने घोषणा की कि अन्ना ज़ीरो बन गए। मैं तो पहले से ही ज़ीरो हूं, मंदिर में रहता हूं, न धन न दौलत, न कोई पद, अभी भी ज़मीन पर बैठकर सादी सब्जी-रोटी खाता हूं। पहले से ही ज़ीरो हूँ और आखिर तक ज़ीरो रहूँगा। जो पहले से ज़ीरो है उसको ज़ीरो क्या बनाएगे? जिसको कहना है वो कहता रहे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। आजतक 25 साल में मेरी बदनामी करने के लिए कम से कम 5 किताबें लिखी गई। कई अखबार वालों ने बदनामी के लिए अग्रलेख (संपादकीय) लिखे है। लेकिन फक़ीर आदमी की फक़ीरी कम नहीं हुई। इस फक़ीरी का आंनद कितना होता है? यह बदनामी करने वाले लोगों को फक़ीर बनना पड़ेगा तक समझ में आएगा। एक बात अच्छी हुई की जितनी मेरी निंदा हुई। उतनी ही जनता और देश की सेवा करने की शक्ति बढ़ी। आज 75 साल की उम्र में भी उतना ही उत्साह है। जितना 35 साल पहले काम करते वक्त था। देश का भ्रष्टाचार कम करने के लिए जनलोकपाल कानून बनवाने के लिए कई बार आंदोलन हुए। 4 बार अनशन हुए। लेकिन सरकार मानने के लिए तैयार नहीं इसलिए टीम ने निर्णय लिया अनशन रोककर विकल्प देना पड़ेगा।
सरकार से जनलोकपाल की मांग का आंदोलन रुक गया लेकिन आंदोलन समाप्त नहीं हुआ है। पहले सरकार से जनलोकपाल कानून की मांग करते रहे। सरकार नहीं करती इसलिए जनता से ही अच्छे लोग चुनकर संसद में भेजना और जनलोकपाल बनाने का आंदोलन शुरू करने का निर्णय हो गया। अगर जनता ने पीछे डेढ साल से साथ दिया, वह कायम रहा तो जनता के चुने हुए चरित्रशील लोग संसद में भेजेगे। और जनलोकपाल, राइट टू रिजेक्ट, ग्रामसभा को अधिकार, राइट टू रिकॉल जैसे कानून बनवाएंगे। और आने वाले 5 साल में भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण पक्ष और पार्टी से नहीं जन सहभाग से करेंगे। 2014 का चुनाव भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने के लिए जनता के लिए आखिरी मौका है। इस चुनाव के बाद फिर से ऐसा मौका मिलना मुश्किल है। कारण, इस वक्त देश जाग गया है। अभी नहीं तो कभी नहीं। मैंने बार-बार बताया है कि मेरा जीवन समाज और देश सेवा में अर्पण किया है। इस वक्त जनता का साथ नहीं मिला तो नुकसान अन्ना का नहीं जनता का होगा। अन्ना तो एक फक़ीर है और मरते दम तक वो फक़ीर ही रहेगा। मैंने अच्छे लोग चुनकर संसद में भेजने का विकल्प दिया है। लेकिन मैं पक्ष-पार्टी में शामिल नहीं होऊंगा। चुनाव भी नहीं लडूंगा। जनता को जनलोकपाल का कानून देकर मैं महाराष्ट्र में अपने कार्य में फिर से लगूंगा। पार्टी निकालने वाले लोगों को भी मैंने बताया है। पार्टी बनाने के बाद भी यह आंदोलन ही रहे। पहले आंदोलन में सरकार से जनलोकपाल कानून मांग रहे थे। अब आंदोलन जारी रखते हुए जनता के सहयोग से अच्छे लोगों को चुनाव में खड़ा करके संसद में भेजो और कानून बनाओ। दिल और दिमाग में सत्ता न रहे, राज कारण न रहे, यह देश की देशवासियों की सेवा समझकर करो। अगर सत्ता और पैसा दिमाग में आ गया तो दुसरी पक्ष-पार्टी और अपनी पार्टी में कोई फर्क नहीं रहेगा। जिस दिन मुझे दिखाई देगा कि देश की समाज की सेवा दूर गई और सिर्फ सत्ता और पैसा का प्रयास हो रहा है। उसी दिन मैं रुक जाऊंगा। आगे नहीं बढूंगा। क्योंकि मैंने समाज और देश की भलाई के लिए विकल्प देने का सोचा है। मेरा जीवन उन्हीं की भलाई के लिए है।
आज टीम अन्ना का कार्य हम लोगों ने समाप्त किया है। जनलोकपाल के कार्य के लिए टीम अन्ना बनाई गई थी। सरकार से संबंध नहीं रखने का निर्णय लिया है। इस कारण आज से टीम अन्ना नाम से चला हुआ कार्य समाप्त हो गया है और अब टीम अन्ना समिति भी समाप्त हुई है।
भवदीय,
कि. बा. उपनाम अण्णा हज़ारे
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