गुरुवार, 26 नवंबर 2015

26/11…

बलराम अग्रवाल
जन्मदिन पर बड़ों से आशीष, मित्रों से मंगलकामनाएँ, शुभकामनाएँ और छोटों से प्यार पाकर अभिभूत हूँ। सभी का हृदयतल से आभार। परस्पर प्रेम की यह जोत सदा बनी रहे।

26/11 एकाएक ही आतंक से जुड़कर विशेष अर्थ देने लगा है। उस के बाद तो जन्मदिन की अपनी तारीख तवारीख ही बन गयी है। कई साल पहले कोटकपूरा से श्याम सुन्दर अग्रवाल जी का फोन था। जन्मदिन की बधाई कितने खास अन्दाज़ में दी वह सुनिए। बोले--"यार, ये 26/11 इतनी खतरनाक क्यों है?"
"महान लोगों के पैदा होने की तारीख है भाईसाहब, " उनके ही अन्दाज में मैंने कहा, "सामान्य तो होने से रही।"
बोले, "मुझे तो लगता है, इस तारीख में खुराफात के बीज हैं।"
श्याम सुन्दर अग्रवाल के साथ
"सो तो हैं।" मैंने कहा।
वे गम्भीर स्वर में बोले, "सुबह की सैर लौट रहा था तो गली के कुत्ते ने काट लिया।"
"अरे बाप रे!" मेरे मुँह से निकला।
"असलियत में तो तभी मुझे याद आया कि आज 26 नवम्बर है। इस तारीख को कोई काम सीधा नहीं हो सकता।"

उस समय मुझे मालूम नहीं था कि 26 नवम्बर मेरे जन्म से भी बहुत पहले देश के इतिहास में एक खास जगह बना चुका था।  लेकिन आज, जब मालूम था तब भी मैं 26/11 के जुमले से मुक्त तो नहीं ही हो सकता।

आज इंदौर से डॉ॰ सतीश दुबे का फोन था। बोले, "इस तारीख को सिवा आतंकवादी घटना के, कुछ और याद आता ही नहीं है।"
"हाँ, है तो आतंकवादी घटना ही।" मैंने कहा।
"जो भी हो, जन्मदिन मुबारक हो।" वे बोले, "खूब लिखो, पढ़ो, ऐसे ही सक्रिय बने रहो, स्वस्थ रहो।"
"आपका आशीर्वाद यूँ ही मिलता रहे भाईसाहब। धन्यवाद।" मैंने कहा।
इधर-उधर की दो-चार अन्य बातों के बाद हमने एक-दूसरे से विदा ली।

इधर, मोदी सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस घोषित किया है. आज, 26 नवम्बर 2015 को हमारा संविधान 65 साल का हो गया है. जानिए इससे जुड़ी खास बातें :
1. संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे. पं॰ जवाहरलाल नेहरू, डॉ॰ भीमराव अम्बेडकर, डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे.
2. 11 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को स्थायी अध्यक्ष चुना गया, जो अंत तक इस पद पर बने रहें.
3. संविधान सभा को इसे तैयार करने में 2 साल, 11 महीने और 17 दिन का समय लगा.
4. देश का सर्वोच्‍च कानून हमारा संविधान 26 नवंबर, 1949 को अंगीकार किया गया था.
5. मसौदा लिखने वाली समिति ने संविधान के मसौदे को देवनागरी हिंदी व रोमन अंग्रेजी में हाथ से लिखकर कैलिग्राफ किया था और इसमें कोई टाइपिंग या प्रिंटिंग शामिल नहीं थी.
6. संविधान सभा पर अनुमानित खर्च 1 करोड़ रुपये आया था.
7. इसमें अब 465 अनुच्छेद तथा 12 अनुसूचियां हैं और ये 22 भागों में विभाजित है. इसके निर्माण के समय मूल संविधान में 395 अनुच्छेद थे जो 22 भागों में विभाजित थे; इसमें केवल 8 अनुसूचियां थीं.
8.  संविधान की धारा 74 (1) में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि राष्‍ट्रपति की सहायता को मंत्रिपरिषद् होगी। देश का प्रधानमंत्री उसका प्रमुख  होगा.

9. आज (26 नवम्बर, 2015) से ठीक 66 वर्ष पहले भारतीय संविधान तैयार करने एवं स्वीकारने के बाद से इसमें पूरे 100 संशोधन किए जा चुके हैं. 
10. हमारा संविधान विश्‍व का सबसे लंबा व भारी-भरकम लिखित संविधान है.

आज, 26 नवम्बर 2015 को अपन भी उम्र के 63 साल पूरे करके 64वें साल में प्रविष्ट हो गये। बड़े सवेरे,  भाई राजेश उत्साही ने फेसबुक पर तरोताजा मुस्कान वाली 5 साल पुरानी (युवा) फोटो के साथ जन्मदिन मानाया तो मन उस बालक जैसा प्रफुल्लित हो उठा जिसे खेलने के लिए सुबह-सुबह ही गुब्बारा मिल गया हो।

                           28वां मूर्तिदेवी पुरस्कार ग्रहण करते डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी (मंच पर बायें से:साहू अखिलेश जैन, श्री स्वदेश भूषण जैन,  श्री गोविंद निहलानी, डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी, श्रीमती अपराजिता जैन महाजन और लीलाधर मंडलोई)
आज ही, एक और पर्व भी मनाया गया। साहित्य अकादमी, 35, फिरोज़शाह रोड, नई दिल्ली के सभागार में आदरणीय डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी को उनकी कृति 'व्योमकेश दरवेश' जो कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवनी है, के लिए 28वाँ मूर्तिदेवी पुरस्कार प्रदान किया गया। उस पर्व में उपस्थित होना अपना जन्मदिन अनेक सम्मानित लोगों के बीच मनाने जैसा सुखप्रदायक लगा। यह पुरस्कार उन्हें सार्थक सिनेमा के उत्कृष्ट निर्देशक गोविंद निहलानी के हाथों मिला। मंच का संचालन सुप्रसिद्ध हिन्दी कवि मदन कश्यप ने किया। मूर्तिदेवी पुरस्कार व उससे जुड़े न्यास का परिचय ज्ञानपीठ के निदेशक, कवि व नया ज्ञानोदय के वर्तमान संपादक लीलाधर मंडलोई ने किया। मंच पर उनके साथ थे--भारतीय ज्ञानपीठ के प्रबन्ध न्यासि साहू अखिलेश जैन, आजीवन न्यासि श्रीमती अपराजिता जैन महाजन तथा श्री स्वदेश भूषण जैन।
मंच से नीचे 'दिलशाद गार्डन बतकही मंडल' के सभी सदस्य महत्वपूर्ण हैं। उनमें से मेरे और मदन कश्यप के अतिरिक्त डॉ॰ भारतेन्दु मिश्र भी उपस्थित थे। अन्य विद्वान मित्रों में अजय कुमार (मेधा बुक्स), कवि केदारनाथ सिंह, अमरनाथ अमर, डॉ॰ शेरजंग गर्ग, विष्णु नागर, जितेन्द्र श्रीवास्तव,  राधेश्याम तिवारी (पत्रकार), डॉ॰ अजित कुमार आदि उपस्थित थे।
आ॰ त्रिपाठी जी को इस अवसर पर अनेकानेक बार बधाई। वे यूँ ही हमें आशीर्वाद प्रदान करते, हँसाते, खिलखिलाते रहें। प्रस्तुत हैं उस समय के कुछ चित्र मेरे स्वयं के कैमरे से ।

निर्देशक गोविंद निहलानी के साथ



साहित्यकार अजित कुमार के साथ


परिचय पुस्तिका : 28वां मूर्तिदेवी पुरस्कार
            परिचय पुस्तिका के अन्तिम पृष्ठ पर छपा चित्र (बायें से) श्री रमेश आज़ाद,   श्री राजेश उत्साही, डॉ॰ विश्वनाथ त्रिपाठी (पीछे खड़े) बलराम अग्रवाल



मंगलवार, 5 मई 2015

'आदिम' परम्पराओं के निर्वाह का 'सिद्ध' क्षेत्र/बलराम अग्रवाल


        असुविधाओं से भरी यात्रा की थकान, गैर जिम्मेदार राजनीतिकों और अशिक्षा तथा अंध-परम्पराओं में जकड़े सामाजिकों के प्रति क्षोभ से उत्पन्न आक्रोश, सारी परेशानियाँ और हिचक एक तरफ तथा ताजी हवा और प्रकृति के संसर्ग की बदौलत प्राप्त प्रसन्नता एक तरफ। (बेटी अपेक्षा अपने छोटे बेटे नेहिल के साथ प्रसन्न मुद्रा में) चित्र:बलराम अग्रवाल
कल, 4 मई, 2015 को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर उक्त अहार क्षेत्र के मंदिरों में जाने का अवसर मिला। अवंतिका देवी का रास्ता थोड़ा अलग कटता है इसलिए शिव मंदिर और सिद्ध बाबा मंदिर ही जा पाए। अब इन स्थानों की कुछ विशेषताओं पर दो बातें हो जाएँ। ये स्थान उत्तर प्रदेश में अपने जिला बुलन्दशहर की तहसील जहाँगीराबाद के अंतर्गत आते हैं। ये सभी अहार क्षेत्र में पड़ते हैं। पहला, अवंतिका देवी का मंदिर। दूसरा, भगवान शंकर का मंदिर और तीसरा सिद्ध बाबा का मंदिर। इन सभी जगहों पर भक्तजनों का तांता-सा लगा रहता है। विशेषत: पूर्णिमा आदि को तो दूर-दराज के लोग भी बड़ी संख्या में वहाँ पहुँचते हैं। आसपास के लोग तो शायद रोजाना या हर हफ्ते भी इन स्थानों पर जाते ही होंगे। सिद्ध बाबा मंदिर क्षेत्र से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर गंगा का किनारा है।
गंगा स्नान का आनन्द ।चित्र:बलराम अग्रवाल
छोटे ट्रकों में भरकर आने का चलन।चित्र:बलराम अग्रवाल
गंगा में स्नान करना। किसी पात्र में गंगाजल लेना और सिद्ध बाबा के मंदिर में स्थापित शिवलिंग का उस जल सेअभिषेक करना—यहाँ के लोगों में प्रचलित आम परंपरा है। शिशुओं का मुंडन संस्कार भी गंगा
बच्चे का मुंडन
किनारे कराया जाता है। जन-समुदाय के बीच व्यापक स्तर पर मान्यता प्राप्त यह तीर्थ आज भी कुछ 'आदिम' परम्पराओं का निर्वाह करता है।
स्नान के बाद अगर आप प्रकृति के बीच कपड़े नहीं बदलना चाहते तो जाइए अपने वाहन में यह कार्य पूरा करिए। गंगा-किनारे कोई सुविधा नहीं मिलेगी। चित्र : बलराम अग्रवाल
मसलन, गंगा में स्नान से पहले किसी माँ, बहन, बेटी, बहू को शौच या लघुशंका से निवृत्त होना हो, तो खुले खेत में मर्दों के बीच की निवृत्त होना होता है। मर्दों को शर्म तो बहुत आती होगी, लेकिन मजबूरी में उन बेचारों को
मिट्टी का यह शिवलिंग बता रहा है कि इस जगह पर जल्द ही 'प्रख्यात' शिव मन्दिर का निर्माण हो सकता है।
बैठे रहना पड़ता है।
लोग पैदल भी तीर्थ तक पहुँचते हैंचित्र:बलराम अग्रवाल
ये सभी मंदिर क्षेत्र और इनमें प्रचलित परंपराएँ सैकड़ों साल पुराने हैं। इस क्षेत्र के राजा साहब माने जाने वाले कुंवर सुरेन्द्र पाल सिंह, मैं समझता हूँ कि आजादी के बाद से अपने स्वस्थ रहने तक लगातार कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने जाते रहे और अधिकतर ‘रेलवे राज्य मंत्री’ का पद सुशोभित करते रहे। उनके बाद इस क्षेत्र से सांसद कौन हैं और विधायक कौन—यह जानने की रुचि मुझमें नहीं है। इन सब ने उस क्षेत्र का जो विकास किया-कराया, वह सब वहाँ किसी न किसी 'उद्घाटन शिला' की शक्ल में तो नजर आता है, किसी कार्य की शक्ल में नहीं।
सिद्ध बाबा मन्दिर, मुख्य द्वार का चित्र ।चित्र:बलराम अग्रवाल
(1) मुख्य सड़क (बुलन्दशहर-अनूपशहर मार्ग) के बाद, समूची अहार रोड का हाल यह है कि शरीर की सारी चूलें हिली पड़ी हैं। पेन किलर न लेता तो रात को सो पाना नामुमकिन था।
(2) लोगों में ट्रेफिक सेंस दिल्ली की सड़कों पर नहीं मिलती है तो दूर-दराज के उस ग्रामीण क्षेत्र में क्या मिलती?
अनुशासनहीन वाहन। चित्र:बलराम अग्रवाल
(3) सड़क की चौड़ाई सिर्फ इतनी है कि सामने से आ रही बस को रास्ता देने के लिए इधर वाली बस को पलट जाने के खतरे की सीमा तक किनारे होना पड़ता है।
(4) सिद्ध बाबा क्षेत्र में ‘भण्डारा’ खिलाने का चलन बुरी तरह पनप चुका है। यहाँ पहुँच जाने के बाद यह तो हो सकता है कि कोई श्रद्धालु ‘अफारे’ से मर जाए, भूखा कतई नहीं मर सकता।
'भण्डारा' की तैयारी करता एक परिवार।चित्र:बलराम अग्रवाल
पूड़ियाँ तलता एक हलवाई चित्र:बलराम अग्रवाल
(5) लोग अपने क्षेत्र से ही गैस चूल्हा, सिलैंडर, आटा, आलू, मसाले, चाकू आदि सामान लाते हैं। वहीं बैठकर रसोई बनाते हैं और वहीं पर बाँटना शुरू कर देते हैं।
गुरु गोरक्षनाथ संप्रदाय के संतों की साधना स्थली 'सिद्ध बाबा का मंदिर' का मुख्य द्वार
प्रसाद वितरण करता एक परिवार।चित्र:बलराम अग्रवाल
मोटर-साइकिल की सीट पर रखकर प्रसाद पाते दो मित्र।चित्र:बलराम अग्रवाल
(6) ‘भण्डारा’ खिलाने और खाने—दोनों में ही किसी अनुशासन की जरूरत न तो खिलाने वाले को महसूस होती है और न खाने वाले को। लोगों को अखबार के कागज पर, थर्मोकोल की प्लेट पर या ढाक के पत्तों से बने दोने पर सब्जी-पूड़ी, पुलाव आदि पकड़ा दिया जाता है।
जूठे दोनों-पत्तलों-कागजों के बीच बैठकर प्रसाद ग्रहण करती बहनें।चित्र:बलराम अग्रवाल
उसे लेकर वे अपनी सुविधा के अनुसार आसपास खड़ी किसी साइकिल के कैरियर पर, मोटर साइकिल की गद्दी पर, कार के बोनट पर रखकर खा लेते हैं। रखने को कोई जगह न मिले तो अपनी हथेली तो है ही।
जूठे दोनों-पत्तलों-कागजों के बीच खड़े होकर प्रसाद ग्रहण करता एक पति।  चित्र:बलराम अग्रवाल
खड़े रहकर खाने का माद्दा न हो या खड़े होकर खाने को शुभ मानने का मन न हो तो जमीन पर बैठकर भी लोग खाते ही हैं। जूठी पत्तलों, दोनों या अखबारी कागजों को कहीं भी फेक देने के लिए सब स्वतंत्र हैं। उनके बीच बैठकर खाने से किसी को ‘घिन’ नहीं आती है।
जूठे दोनों-पत्तलों-कागजों के बीच बैठकर प्रसाद ग्रहण करती एक माँ। श्रद्धा या मजबूरी? चित्र:बलराम अग्रवाल

जूठे दोनों-पत्तलों-कागजों के बीच बैठकर प्रसाद ग्रगण करता एक परिवार।चित्र:बलराम अग्रवाल
और अंत में, सिद्ध बाबा का धूनी क्षेत्र । 'नई' और 'पुरानी' दुकान की तर्ज पर, खम्भे पर लिखा 'प्राचीन धूना' आभास दिला रहा है कि चेलों और अनुयायियों सहित चल-अचल संपत्ति का लिखित/अलिखित बँटवारा हो चुका है। इसी प्रांगण में जरा हटकर एक अन्य 'धूना' भी अपने अनुयायियों के साथ नजर आता ही  है। चित्र:बलराम अग्रवाल

रविवार, 22 जून 2014

नया सितारा



NAMAN AGARWAL
हमारे परिवार और अड़ोस-पड़ोस में आइस-पाइस, कबड्डी, कुश्ती, इप्पी-दुप्पी, डंडा फेंक जैसे नुक्कड़ टाइप के खेल खेलने का ही चलन रहा; वह भी मेरी पीढ़ी तक। छोटे भाई-बहनों ने शायद मेरे जितना भी  आउटडोर नहीं खेला।
नई पीढ़ी में, मेरे बड़े बेटे ने जूनियर स्कूल स्तर पर खो-खो में भाग लिया और ट्राफी भी जीती; लेकिन बाद में वह विद्यालय के खेल-शिक्षक की भेदभरी नीति का शिकार होकर टीम से बाहर हो गया। उन्होंने अपने किसी परिचित के बेटे को टीम में रख लिया। उनकी इस कारस्तानी से बेटे का विश्वास खेल में ‘अच्छा करके जगह बनाने’ की सोच से उठ गया। उसके बाद मेरे बहुत उकसाने पर भी उसने किसी खेल में हिस्सा लेने में रुचि नहीं दिखाई। शिक्षक-प्रशिक्षक यदि लालची और संवेदनहीन हों तो अपने शिष्य का तो अंतहीन अहित कर ही देते हैं, खुद भी ‘पैसे का कीड़ा’ ही बनकर रह जाते हैं, गुरु हनुमान या रामकृष्ण परमहंस नहीं बन पाते।
2013 में मेरे छोटे भाई ने उसकी रुचि के अनुरूप अपने बेटे नमन को दिल्ली की एक क्रिकेट अकादमी में दाखिला दिलाया। बेहतर खेल प्रशिक्षण ने उसमें बैठे अच्छे क्रिकेटर को जगा दिया। अकादमी के प्रशिक्षक ने उसके गुणों के आधार पर उसे विकेट कीपर बैट्समैन के रूप में विकसित करना शुरू किया। उसमें अच्छा प्रदर्शन करते हुए उसने विकेट के पीछे कैच लेने, स्टंप आउट करने और बल्लेबाज की हैसियत से बेहतर रन बनाने का सिलसिला शुरु किया और कई आपसी मैच अपनी टीम को जिताए। एक दिन उसने जब यह बताया तो मैंने कहा, “अरे वाह, तू तो फारुख इंजीनियर और धोनी की लाइन पर चल रहा है।”
“लेकिन मैं लेफ्टी हूँ।” उसने कहा।
“यह गिलक्रिस्ट की लाइन पर चल रहा है।” इस पर पास बैठे आकाश ने  मेरे वाक्य को सुधारा।
“यह और भी अच्छा है।” मैंने कहा, “भारत को एक बेहतरीन लेफ्ट हैंडर विकेट कीपर बैट्समैन की बहुत जरूरत है।”
सुनकर वह शरमा-सा गया।
*****

      इस साल नमन ने नवीं कक्षा की परीक्षाएँ दी थीं। बहुत अच्छा रिजल्ट नहीं ले पाया। मन उदास तो हुआ, लेकिन हताश नहीं। हमने उसे ज्यादा डाँटा-फटकारा नहीं। कहा कि—खेल जितना ही ध्यान उसे पढ़ाई में भी लगाना चाहिए। उसने बेहतर मार्क्स लाने की शपथ भीतर ही भीतर ली और पढ़ाई में लग गया। 2015 में वह 10वीं की परीक्षा देगा।
गत 18 जून से 22 जून तक चण्डीगढ़ की स्काईलाइन क्रिकेट अकादमी ने 6ठी आल इण्डिया क्रिकेट लीग का आयोजन किया था। उसमें देशभर की क्रिकेट अकादमियों के 16 वर्ष से कम उम्र वाले क्रिकेटरों की करीब 8 टीमों ने भाग लिया था। नमन के क्रिकेट कोच भी अपनी अकादमी की टीम को लेकर गये थे। दिल्ली से एक अन्य अकादमी की टीम समेत कुल 2 टीमें गई थीं, नमन ने बताया।
20 जून को हुए मैच में नमन की टीम को 222 रनों का लक्ष्य मिला। वह ओपनर बैट्समैन है। मैदान में उतरकर उसने 12 छक्के और 14 चौके लगाते हुए 123 रन बनाए और अंत तक आउट नहीं हुआ। उसकी इस अभूतपूर्व पर्फारमेंस की बदौलत टीम फाइनल में पहुँच गई। उसे ‘मैन ऑफ द मैच’ ट्राफी मिली।
कल 22 जून को फाइनल खेला गया। फील्डिंग करते हुए उसका दायाँ पैर मोच खा गया। शायद इसी वजह से वह मात्र 10 रन ही बना सका; लेकिन उसके एक अन्य साथी ने अच्छी पर्फारमेंस दिखाते हुए मैच को जीत लिया।
इस टूर्नामेंट में नमन में तीन मैचों में सबसे अधिक 161 (28+123+10) रन बनाए।
कल 22 जून को हमारे विवाह की 35वीं सालगिरह थी। नमन ने अपने ताऊ जी-ताई जी को बेहतरीन तोहफा लाकर दिया। 
NAMAN AGARWAL

जिओ मेरे बच्चे! सिर्फ परिवार के या दोस्तों के लिए ही नहीं, अपने देश के लिए इससे भी बेहतर करके दिखाओ।

सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

रह गया ‘हंस’ अकेला / बलराम अग्रवाल

                                                                      चित्र:बलराम अग्रवाल


आप अभी बिस्तर में ही पड़े हों, फोन आये, आप उठायें, इधर से ‘हलो’ करें और उधर से ‘यार, बुरी खबर है’ सुनाई दे तो एक पल के लिए दिमाग का सुन्न और धड़कन का ठहर-सा जाना स्वाभाविक है।
यही हुआ आज सुबह। भाई रूपसिंह चंदेल का फोन था।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा तो बोले, “राजेंद्र जी चले गये, रात बारह बजे।”
“ओह!” गले से अचानक निकला। फिर पूछा, “अन्त्येष्टि कितने बजे है?”
“यह अभी पता नहीं चल पाया, दरअसल किसी को अभी कुछ मालूम नहीं है।” उन्होंने कहा, “मैं मन्नू जी को फोन करके पूछता हूँ, तुम भी किसी से पता करो।” और फोन काट दिया।
मैंने तुरंत ही हरिनारायण जी को फोन मिलाया। अन्त्येष्टि के समय और स्थान के बारे में उन्हें भी कुछ पता नहीं था। समाचार चैनल्स को उलटा-पलटा। राजेंद्र जी के निधन का समाचार तो था; कहीं-कहीं यह स्ट्रिप भी चल रही थी कि अन्त्येष्टि 3 बजे होगी, लेकिन स्थान के बारे में सूचना शायद उन तक भी नहीं पहुँची थी। बहरहाल, कुछ देर बाद चंदेल जी का ही फोन आया, “हलो बलराम, अन्त्येष्टि लोदी रोड श्मशान पर होगी, तीन बजे। बताओ, किस तरह चलोगे?”
“इधर अजय और उमेश जी से बात करके मैं आपको कुछ देर बाद फोन करके बताता हूँ।” मैंने कहा और फोन कट गया।
पिछले कुछ वर्षों से राजेंद्र जी ने अपने-आप को साहित्य की दुनिया का खलनायक बनाया हुआ था। अपने खिलाफ माहौल बनाने और उसका आनंद लेने की कला में उन्होंने पारंगतता हासिल कर ली थी। दो-तीन माह में एकाध बार मैं जब भी उनसे मिलता, वे पूछते—“हंस में आपको क्या ऐसा लगता है जिससे आपकी असहमति बनती हो?”
उन्होंने हमेशा असहमतियों के बारे में जानना चाहा, गोया कि प्रशंसा करने वाले तो उनके पास आते ही रहते होंगे। उनसे पिछली मुलाकात अगस्त 2013 की किसी तारीख को हुई थी। पूछा, “यह बताओ कि ‘हंस’ में हम बेहतर और-क्या कर सकते हैं?”
“मैंने कभी भी इस बारे में नहीं सोचा।” मैंने कहा।
“क्यों?”
“मुझे कभी लगा नहीं कि आप इसे बेहतर बनाने के बारे में कभी सोचते हैं।”
“पूछ तो रहा हूँ।”
“अगली बार आऊँगा तो इस बारे में सोचकर आऊँगा। मैं सच कह रहा हूँ कि मैंने कभी भी यह महसूस नहीं किया कि जिस ढर्रे पर आपने कुछ वर्षों से हंस को डाला हुआ है, उससे हटने के बारे में आप कभी सोचते हैं।”
ये वे दिन थे जब एक महिला का मसला काफी तूल पकड़ चुका था। सुधीश पचौरी ‘हिन्दुस्तान’ के अपने कॉलम में उनकी बखिया उधेड़ चुके थे और उनका अपना स्टाफ अन्दर ही अन्दर उस महिला के खिलाफ उनसे सुलग रहा था। उस जैसे बेहूदा और कन्ट्रोवर्शियल मुकदमों पर बात करना मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगता इसलिए राजेंद्र जी से इस बारे में कोई चर्चा नहीं हुई थी।
पिछले साल, मार्च 2012 में उनका स्वास्थ्य जानने के लिए मैं और चंदेल मयूर विहार स्थित उनके निवास पर गये थे। उनका अटैंडेंट अभी उन्हें तैयार कर ही रहा था, इसलिए हमसे कुछ देर बाहर ही रुकने को कहा गया। हमें जब अंदर बुलाया गया तब वे खिड़की के सहारे छोटे आकार के एक पलंग पर लेटे थे। काफी अस्वस्थ थे। किसी का फोन आने पर वे सुनने लगे तो मैंने अपने कैमरे को क्लिक कर दिया। फ्लश कौंधी तो उन्होंने अनुरोध किया, “फोटो मत खीचिए।” मैंने कैमरा अपने बैग में रख लिया; लेकिन फोटो तो उनकी खिंच ही चुकी थी। ऊपर वही फोटो मैं आज उनके बाद पहली बार सार्वजनिक कर रहा हूँ। मैं जब भी मिला, मुझे यही लगा कि वे करीने से उठने-बैठने वाले व्यक्ति थे। अपने बारे में वे ब्यूटी-सेंसिटिव भी थे। पिछले साल मौत के मुँह में जा ही बैठे थे; लेकिन साफ-सफ्फाक तरीके से जाना उन्हें शायद पसंद नहीं था इसीलिए लौट आये। हंस में अप्रैल 2012 का उनका संपादकीय पढ़कर मैं चौंक-सा गया था—जिस आदमी को मौत ने अपने मज़बूत जबड़ों में जकड़ा हुआ है, वह ‘बुर’ की बातें कर रहा है!! रहा नहीं गया। मई माह में, जब वे ऑफिस जाने लगे तो एक दिन जाकर उनसे मिला। उनकी ओर से वही शाश्वत सवाल आया, “हंस के किस तरह के आर्टिकल से आपकी असहमति बनती है?”
“सबसे पहले तो आपके संपादकीय से ही मेरी असहमति बनती है।” मैंने कहा।
“किस तरह की असहमति?” उन्होंने पूछा।
“यादव जी, पिछले महीने जब मैं और चंदेल आपसे मिलने आपके घर गये थे, तब आप ताबूत में लेटे थे।” मैंने कहा, “बहुत मुमकिन है कि अप्रैल का संपादकीय भी आपने उसी में लेटे-लेटे लिखा हो।…”
वह मेरी ओर देखते रहे।
“ताबूत में लेटकर भी कोई आदमी 'बुर' और 'भग' ही सोचेगा, यह मेरी समझ से बाहर है।” मैने कहा।
“पुराण काल के ॠषि-मुनि, जो नियोग के लिए जाते थे, वे जवान होते थे!!” उन्होंने तर्क दिया।
“ऐसा तो कहीं नहीं लिखा कि वे कब्र में लेटे होते थे।”
“वे जवान होते थे, यह भी तो कहीं नहीं लिखा।”
मैं समझ गया कि वे असहमति के बिंदु मुझसे जरूर पूछते हैं, मेरी असहमतियों से सहमत हो नहीं पाते हैं। मैं उनसे कहता भी था, “यादव जी, दरअसल जिस संस्कार में मैं पला हूँ उसके चलते, आपके स्वच्छंद काम से असहमति के अलावा आप में कुछ-और मुझे मिलता ही नहीं है।”
"फिर आप हंस को पढ़ते क्यों हैं?"
"असहतियों से परिचित रहने के लिए।"
उन्ही दिनों ‘बीमार आदमी के स्वस्थ विचार’ या ‘स्वस्थ आदमी के बीमार विचार’ जैसी कोई पुस्तक भी उनकी विचारधारा पर केंद्रित आई थी, मैं पढ़ नहीं पाया। उन्हें स्वयं बदनाम होकर भी दूसरों को चर्चा में लाने का आत्मघाती रोग लग गया महसूस होता था। मुझे लगता है कि उनके चले जाने के पीछे इसी रोग का हाथ अधिक है। यह रोग न लगता तो चौबीसों घंटे उनकी देखभाल में खटने वाला अटैंडेंट उनसे अलग न हो पाता और उसके रहते वे शायद समय पर इलाज पा जाते। लेकिन यम के दूत अपने ऊपर कोई आँच नहीं आने देते। मौत का बहाना वे किसी न किसी व्यक्ति या हालात के मत्थे मढ़ देने में पारंगत हैं।
कुल मिलाकर राजेंद्र यादव ने अपने युग को अपने तरीके से जिया और वैसे ही जीने वाला समाज बनाने की भरसक कोशिश भी की। हिन्दी कथा समाज को उन्होंने एक अलग विचार से जोड़ने की कोशिश की और हजार विरोध के बावजूद वे अपनी उस विचारधारा पर डटे रहे।
राजेंद्र यादव पर उनके देहांत के बाद अलग-अलग कोणों से उनके अंतरंग पुरुष व महिला मित्रों के द्वारा बहुत-कुछ लिखा जायेगा। बहुत-कुछ ऐसा भी होगा जो कभी भी लिखा नहीं जायेगा। कुछेक को तो तहेदिल से ताउम्र उनका शुक्रगुजार रहना चाहिए कि वे उन्हें ‘महान’ कथाकार बना गये, हालाँकि कथाकार या कलाकार कोई किसी को तब तक नहीं बना सकता जब तक कि स्वयं उसके भीतर ही कुछ दाने न हों। खैर। 
वे शायद ईश्वर और आत्मा में विश्वास नहीं करते थे, इसलिए उनके बारे में वे परम्परागत वाक्य बोलने-लिखने का कोई अर्थ नहीं है। फिर भी, यह वक्त राजेंद्र जी को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करने का है। आमीन।